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जगन्नाथ: मंदिर के दरवाजे बंद करने से भगवान नहीं मिलते

जगन्नाथ मंदिर के बाहर लगे बोर्ड पर कई भाषाओं में लिखा है कि मंदिर में सिर्फ हिन्दू जन ही प्रवेश कर सकते हैं

Aakar Patel Updated On: Sep 25, 2017 04:18 PM IST

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जगन्नाथ: मंदिर के दरवाजे बंद करने से भगवान नहीं मिलते

उड़िया लोगों में दुर्योधन नाम का आम चलन है, ऐसे ही दुःशासन का है. यह बात मैं बीते हफ्ते तक नहीं जानता था. बीते हफ्ते मैं मशहूर जगन्नाथ मंदिर के दर्शन करने भुवनेश्वर के रास्ते पुरी गया.

मैं ऐसी जगहों पर अक्सर जाता हूं क्योंकि मुझे इनका इतिहास और वास्तुशिल्प बड़ा मनमोहक लगता है. साथ ही यह भी पता चलता है कि भारत बाहर वालों को भले सांस्कृतिक रूप से एक लगे, लेकिन भीतर से वह ऐसा है नहीं.

हमें तो यही पढ़ाया-बताया गया है कि दुर्योधन महाभारत में एक खलनायक है. ऐसे में कोई मां-बाप अपने बेटे का नाम दुर्योधन रखेंगे यह भारत में गुजरात या ऐसी ही किसी और जगह पर रहने वाले लोगों को आश्चर्यजनक लग सकती है.

उड़िया लोग सचमुच बड़े दिलचस्प होते हैं, सांस्कृतिक रूप से खूब गहराई होती है उनमें और मेहनत-मजदूरी के कठोर काम करते ओड़िया लोगों से सामना होने पर हम यह गहराई देख पाने में अक्सर चूक जाते हैं.

जगन्नाथ मंदिर के बाहर लगे बोर्ड में लिखा केवल हिन्दू प्रवेश कर सकते हैं 

इस यात्रा पर मैं अपने साथ सासू-मां और उनके परिवार-जन को साथ ले गया था. वे लोग बंगाली ब्राह्मण हैं और मेरी तुलना में पूजा-पाठ में उनकी कहीं ज्यादा रुचि है. ईश्वर से मुझे कोई खास परेशानी नहीं है लेकिन उसने पहले ही मुझे इतना कुछ दे दिया है कि अब और ज्यादा मांगते संकोच होता है. सो, मैं भगवान से अब नहीं मांगता.

जगन्नाथ मंदिर के बाहर लगे बोर्ड पर कई भाषाओं में लिखा है कि मंदिर में सिर्फ हिन्दू जन ही प्रवेश कर सकते हैं. सच कहूं तो यह तर्क मेरी समझ से परे है. चर्च में यहां तक कि सबसे मशहूर वेटिकन के चर्च में जिसे अपने वास्तुशिल्प पर नाज है, ऐसा नियम लागू नहीं है. हां, सऊदी लोग गैर-मुस्लिम को मक्का में आने की अनुमति नहीं देते हालांकि हमें तो यही बताया गया है कि गुरु नानक ने मक्का की तीर्थयात्रा की थी.

कुछ साल पहले जब मैं लाहौर में था तो कुछ मुकामी दोस्तों के साथ गुरु अरजन के गुरद्वारे में गया था. वहां एक बोर्ड लगा था जिसे शायद सरकार की तरफ से लगाया गया होगा. उसपर लिखा था कि मुसलमानों को गुरद्वारे में प्रवेश की अनुमति नहीं है. हमने इस चेतावनी की अनदेखी की.

जब गुरद्वारे के सिख व्यवस्थापक ने हमारे बारे में पूछताछ की तो मेरे साथियों ने झूठ नहीं बोला. साथी अपने बेटे अर्जुन को भी ले आया था. व्यवस्थापक ने कहा कि बेटे को हमारे पास छोड़ दीजिए और बाकी लोग गुरद्वारा घूम लें.

मंदिरों के अनुभव से दूसरा समुदाय वंचित क्यों  

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भारत में मस्जिद, चर्च और गुरद्वारे सबके लिए खुले रहते हैं. मैं तो कहूंगा कि हिन्दू अपने पास की मस्जिद में जाएं. वहां उनका स्वागत होगा और चाहे इस्लाम में उनकी रुचि हो या ना हो मस्जिद में जाकर उन्हें अच्छा ही लगेगा.

उन लोगों को बाहर ही बाहर क्यों रखना जो हमारे धर्म में रुचि रखते हैं लेकिन हमारे धर्म-समुदाय में पैदा नहीं हुए? जगन्नाथ मंदिर का अनुभव हासिल करने से ऐसे लोगों को वंचित क्यों करना? ऐसा तो है नहीं कि हिन्दू-धर्मशास्त्रों में ऐसा करने पर जोर दिया गया है. अगर यह बात सच होती तो फिर सारे मंदिरों में यह नियम लागू होता.

लेकिन ऐसा नियम हर मंदिर में होता तो नहीं. बहरहाल, एक खास चीज देखने में यह आ रही है कि बड़े मंदिर विदेशियों और गैर-हिन्दुओं का प्रवेश लगातार वर्जित कर रहे हैं. इस साल मैंने मदुरै के मीनाक्षी मंदिर के गर्भगृह के बाहर और नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में भी ऐसा बोर्ड लगा देखा.

महान गायक यसुदास जन्म से ईसाई हैं और वे गुरुवायूर के मंदिर में भजन गाने के ख्वाहिशमंद हैं लेकिन मंदिर की तरफ से उनके प्रवेश को लगातार नामंजूर किया गया है. 30 सितंबर के दिन उन्हें पद्मनाभस्वामी मंदिर में प्रवेश दिया जाएगा लेकिन इसके लिए उन्हें एक शपथ-पत्र देना होगा कि वे हिन्दू रीति-रिवाजों मे विश्वास करते हैं.

इंदिरा गांधी को भी नहीं मिला था प्रवेश 

इस चीज की एक व्याख्या यह हो सकती है: चूंकि हिन्दू किसी का धर्म-परिवर्तन नहीं करते इसलिए जो धार्मिक समुदाय धर्म-परिवर्तन कराते हैं, उन्हें हिन्दू लोग बाहर रखते हैं. लेकिन इसे साबित करना मुश्किल है. यह तथ्य फिर भी अपनी जगह कायम रहेगा कि मंदिर कुछ लोगों का प्रवेश वर्जित करते हैं, खासकर हिन्दुओं का.

महात्मा गांधी ने 1930 के दशक में अनशन किया था क्योंकि स्वामी नारायण मंदिर (इसे मेरे समुदाय पाटीदार द्वारा संचालित किया जाता है) निचली जातियों को प्रवेश नहीं देना चाहता था.

दरअसल स्वामी नारायण मंदिर ने निचली जाति के लोगों को प्रवेश देने की जगह कोर्ट में अपने को अल्पसंख्यक और गैर-हिन्दू समुदाय बताया. तो क्या जातिगत शुद्धता के पूर्वाग्रह के कारण कुछ लोगों को पराया मानकर मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता? मैं दिल से चाहता हूं कि यह कारण ना हो.

जगन्नाथ मंदिर के पंडों के बारे में मशहूर है कि उन्होंने इंदिरा गांधी को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया था हालांकि वे जन्म से हिन्दू थीं और उनका अंतिम संस्कार भी हिन्दू-रीति से हुआ.

2012 में यह खबर आई थी कि पंडों ने मंदिर के बाहर एक बड़ा सा बोर्ड लगवाया है जिसपर लिखा है कि सिर्फ सनातनी हिन्दुओं को ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति है. मुझे तो यह बोर्ड नहीं दिखा लेकिन पंडों का बर्ताव निश्चय ही परेशान करने वाला है.

संविधान के अनुच्छेद 14-17 में वर्णवादी व्यवस्था पर है रोक 

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सनातनी हिन्दू-धर्म शुद्ध रूप से वर्ण-व्यवस्था का समर्थक है और संविधान के अनुच्छेद 14-17 तक इस वर्णवादी व्यवस्था पर खास तौर से रोक लगाई गई है. अगर कोई वर्ण-व्यवस्था( छुआछूत का बर्ताव करना और यह मानना कि शूद्र वेदपाठ का अधिकारी नहीं है) को मानता है तो ही वह सनातनी हो सकता है. तो फिर पंडे किन लोगों को मंदिर में प्रवेश देना चाहते हैं ?

यह बोर्ड उस समय लगा जब एक अमेरिकी पुरुष ने एक ओड़िया स्त्री से ब्याह करके रथयात्रा में भागीदारी करने की कोशिश की और पंडों ने उसकी पिटाई कर दी. खबरों के मुताबिक पत्नी शिल्पी बोराल ने कहा था कि: 'यह अन्याय है, जब भगवान जगन्नाथ सारी दुनिया के मालिक हैं तो फिर कोई मेरे पति को प्रवेश करने से कैसे रोक सकता है?'  शिल्पी की बात में दम है. मैं चाहता हूं कि पुरी सहित बाकी जगहों के मंदिर यह साफ-साफ बतायें कि वे लोगों को भागीदारी करने से क्यों रोक रहे हैं?

जगन्नाथ मंदिर सुंदर है. इस मंदिर का वास्तुशिल्प और यहां प्रतिष्ठित देवमूर्ति दोनों अद्भुत हैं-उन्हें मनुष्य-रूप में नहीं रचा गया. दोनों अनूठे हैं. हमलोग अंतिम आरती के समय पहुंचे. कुछ ही लोग तब आस-पास मौजूद थे. मूर्ति को देखने के बाद मैं आस-पास मौजूद लोगों की तरफ मुड़ा.

हिन्दुओं को एक फायदा हासिल है, वे पूजा करने के मामले में बाकी धर्म के लोगों की तुलना में ज्यादा प्रदर्शन-प्रिय होते हैं. हम अपने हाथ जोड़कर ऊपर उठाते हैं, दंडवत झुक जाते हैं और इसी क्रम में एकदम से जमीन पर लेट जाते हैं.

सभी हो हासिल होना चाहिए यह अनुभव 

आखिर ऐसा क्यों है? शायद चर्च, मस्जिद या गुरद्वारे के उलट हमारी प्रार्थना पूरे समूह के लिए नहीं बल्कि किसी एक व्यक्ति के लिए होती हैं. हमें यह सुनिश्चित करना होता है कि हम मूर्ति की नजरों में रहें और शायद इसलिए हम शेष भीड़ से अपने को अलगाने के लिए कुछ खास करना चाहते हैं. क्या यही वह वजह है जो कुछ लोगों को मंदिर में प्रवेश करने से वर्जित किया जाता है?

पूजा करने वालों के चेहरे देखकर मैं भाव-विह्वल हो गया. उनमें से कई गरीब थे लेकिन सच्ची श्रद्धा और आस्था से भरे हुए. मैं चाहता हूं, ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह अनुभव हासिल करने का मौका मिले—हिन्दुओं की भक्ति-भावना का आवेग और आनंदातिरेक तथा उसे साक्षी-भाव से देखने का आनंद ज्यादा से ज्यादा लोगों को हासिल हो.

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