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यूपी में साइकिल पर चढ़े हाथी के सामने होगा कांग्रेसी 'चाणक्य' ?

यूपी में तेजी से बदलती गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस को एक अदद ब्राह्मण चेहरे की आवश्यकता है जो उसके कोर वोट बैंक को फिर से साध सके

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 21, 2018 11:02 PM IST

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यूपी में साइकिल पर चढ़े हाथी के सामने होगा कांग्रेसी 'चाणक्य' ?

कांग्रेस के महाधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने युवा नेतृत्व के आगे आने की बात की थी. जिसके बाद गोवा के कांग्रेस अध्यक्ष शांताराम नाईक ने इस्तीफा भी दे दिया. इसके बाद अचानक राज बब्बर के इस्तीफे की अटकलों से सियासत का बाजार गर्म रहा. ये माना गया कि राज बब्बर की जगह किसी ब्राह्मण चेहरे को अध्यक्ष बनाया जा सकता है. लेकिन शाम तक ये साफ हो गया कि राज बब्बर ने इस्तीफा नहीं दिया है और वो पद पर बने हुए हैं.

लेकिन बड़ा सवाल इस बात को लेकर है कि अगर यूपी में कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन करती है तो उसकी पहली पसंद क्या होगी?

ऐसे में कांग्रेस के इतिहास को देखते हुए लगता है कि कांग्रेस अपने परंपरागत ब्राह्मण वोटरों को ही अपने पाले में लाने के लिए रणनीति पर ध्यान देगी और जरूरत पड़ने पर अध्यक्ष भी किसी ब्राह्मण को बना सकती है. कांग्रेस ये जान चुकी है कि यूपी के 9 फीसदी ब्राह्मण वोटर सत्ता के संघर्ष में निर्णायक भूमिका अदा करते आए हैं. ये वोटर जिस किसी भी दल के साथ रहा उसकी सरकार जरूर बनी है. ब्राह्मण वोटर की बदौलत ही साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की यूपी में सीटे दस की संख्या से 71 तक पहुंची हैं. ब्राह्मण वोटरों ने राज्य में अगर एक बार बीएसपी की सरकार बनाई तो दूसरी बार समाजवादी पार्टी की साइकिल पर भी सवार होकर सत्ता तक पहुंचे.

सत्ता किसी की भी रही हो लेकिन ब्राह्मण कभी हाशिए पर नहीं रहे. इसके पीछे न सिर्फ उनका सियासी इतिहास है बल्कि उनकी ताकत सत्ता में संतुलन का काम करती आई है. ब्राह्मणों को नाराज कर कोई भी दल सत्ता हासिल नहीं कर सका है. यूपी में कांग्रेस शासन के दौर के बाद अब भले ही ब्राह्मण वोट बीजेपी, बीएसपी और एसपी के बीच बंटते आए हों लेकिन साल 2009 में बीएसपी से नाराज ब्राह्मण वोटर ने कांग्रेस को लोकसभा की 21 सीटें भी दिला दी थीं. इस बार अखिलेश सरकार से नाराज हुए तो बीजेपी की पूर्ण बहुमत से सरकार बनवा दी.

Sheila Dixit

शीला दीक्षित (फोटो: रॉयटर्स)

यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोटरों के दबदबे को देखते हुए ही कांग्रेस की रणनीति रूठे ब्राह्मणों की घर-वापसी कराने की हो सकती है. हालांकि इसकी कवायद उसने साल 2017 के विधानसभा चुनाव से ही शुरू कर दी थी. उस वक्त कांग्रेस ने ब्राह्मण-कार्ड खेलते हुए दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश की थी लेकिन वो दांव कारगर नहीं रहा.

लेकिन कांग्रेस के पास ब्राह्मण मुख्यमंत्री का पुराना इतिहास है. कांग्रेस की ही तरफ से नारायण दत्त तिवारी यूपी के आखिरी ब्राह्मण सीएम थे जो कि बाद में उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री बने. आजादी के बाद से अब तक यूपी में 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री रह चुके हैं और खास बात ये रही कि 23 साल तक ब्राम्हण मुख्यमंत्री सत्ता में रहे. लेकिन नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राम्हण सीएम नहीं बन सका.

दरअसल मंडल-कमंडल की राजनीति के बाद यूपी में दलित-ओबीसी गठजोड़ ने कांग्रेस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ कर रख दिया. जो ब्राह्मण बाबरी विध्वंस से पहले तक यूपी में कांग्रेस का कोर वोटर हुआ करता था वो राम मंदिर आंदोलन की लहर में बीजेपी के साथ मजबूती से आ खड़ा हुआ जबकि दलित-ओबीसी वोटर ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को अपना भरोसा बना लिया.

1989 के बाद से ही कांग्रेस यूपी की सियासत में उबर नहीं सकी. 25 साल बाद 2014 के लोकसभा चुनाव तक यूपी में कांग्रेस केवल गांधी परिवार की 2 सीटों तक ही सीमित रह गई. जबकि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन भी सत्ता नहीं दिला सका. विधानसभा चुनाव में केवल सात सीटों पर ही कांग्रेस जीत सकी.

अब चूंकि एसपी-बीएसपी गठबंधन जहां दलित-ओबीसी वोट बैंक को साधने की ताकत रखता है तो बीजेपी को कमजोर करने के लिए कांग्रेस के पास  ब्राह्मण  वोटरों को लुभाने का ही विकल्प बचा है. कांग्रेस अब मायावती के सोशल इंजीनियरिंग से नसीहत लेते हुए ब्राह्मण वोटरों पर फोकस कर सकती है.

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साल 2007 में मायावती ने 89 ब्राह्मण को टिकट दिया था. इस दांव के जरिए मायावती न सिर्फ बीजेपी के पाले से ब्राह्मण वोटरों को खींचने में कामयाब हुई बल्कि सरकार भी बनाई. लेकिन बीजेपी ने भी पैंतरा बदलते हुए साल 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में मायावती के सोशल इंजीनियरिंग को पूरी तरह हाईजैक कर लिया. बीजेपी के पास अब सवर्ण वोटरों के साथ साथ दलित-ओबीसी का भी जनाधार है. लेकिन उपचुनावों की हार ने एसपी-बीएसपी के हौसले बुलंद किए तो कांग्रेस की उम्मीदें भी जगा दीं. तभी सियासी गलियारों में हल्ला है कि कांग्रेस को अब यूपी में अपने परंपरागत ब्राह्मण वोटरों की याद सता रही है.

ऐसे में अगर भविष्य में कांग्रेस यूपी में नेतृत्व परिवर्तन करती है तो बहुत संभावना है कि वो किसी ब्राह्मण चेहरे पर ही साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दांव खेलना चाहेगी. वो चेहरा कोई अनुभवी कांग्रेसी भी हो सकता है तो कोई युवा तुर्क भी.

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