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इस बार अविश्वास प्रस्ताव पर बोलने का सबसे कम समय दिया गया पार्टियों को

माना जाता है कि वर्ष 1952 में पहली लोकसभा के गठन के बाद से हमेशा लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कम से कम 10 से 12 घंटे चलती थी और आमतौर पर दूसरे दिन जाकर वोटिंग होती थी

FP Staff Updated On: Jul 20, 2018 12:19 PM IST

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इस बार अविश्वास प्रस्ताव पर बोलने का सबसे कम समय दिया गया पार्टियों को

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर स्पीकर ने बहस के लिए जितना समय पार्टियों को दिया है. वो 1990 के दशक के बाद का सबसे कम समय है. इसमें स्पीकर ने सत्ता पक्ष, विपक्ष को महज सात घंटे का समय दिया है.

माना जाता है कि वर्ष 1952 में पहली लोकसभा के गठन के बाद से हमेशा लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कम से कम 10 से 12 घंटे चलती थी और आमतौर पर दूसरे दिन जाकर वोटिंग होती थी.

तब बहस के लिए दिए गए 23 घंटे 

वर्ष 2003 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार केंद्र में सत्तारूढ़ थी, तब लोकसभा में जब सरकार के शक्ति परीक्षण की बात आई तो स्पीकर मनोहर जोशी ने बहस के लिए 23 घंटे का समय दिया था. ये बहस करीब तीन दिनों तक लोकसभा में चलती रही.

राव सरकार के खिलाफ हमेशा 14 घंटे से ज्यादा बहस

90 के दशक में जब केंद्र में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की अगुवाई में कांग्रेस सरकार सत्ता में थी. तब उसे तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था. वर्ष 1992 में ही राव सरकार के खिलाफ दो अविश्वास प्रस्ताव लाए गए. पहला प्रस्ताव जुलाई में आया और दूसरा दिसंबर में.

पहले अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में 14 घंटे बहस चली और दूसरे प्रस्ताव पर 21 घंटे तक. तब लोकसभा देर रात तक बहस से गूंजती रही. राव सरकार के खिलाफ तीसरा अविश्वास प्रस्ताव 1993 में आया, जो 19 घंटे तक चला था.

तब हर दिग्गज नेता लेता था बहस में हिस्सा

'द इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस' के लेख 'नो कांफिडेंस मोशंस इन इंडियन पार्लियामेंट' के अनुसार 1952 से 1970 के दौरान चार लोकसभा में 10 अविश्वास प्रस्ताव आए. इन पर गहन चर्चा लोकसभा में हुई. इन सभी पर लोकसभा में दो दिन से अधिक समय तक बहस चलती रही.

1963 में जब निर्दलीय सांसद के रूप में आचार्य जेबी कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. और इसे मंजूर कर लिया गया तो इस पर लोकसभा में दो दर्जन से ज्यादा सत्ता पक्ष के सदस्यों ने शिरकत की. कृपलानी, मसानी और मेनन ने लंबे भाषण दिए. तब लोकसभा का हर दिग्गज नेता इस बहस में शिरकत जरूर करता था.

शास्त्री के दौर में भी पर्याप्त बहस 

लालबहादुर शास्त्री जिस समय प्रधानमंत्री बने. तब उनके खिलाफ तीन बार अविश्वास प्रस्ताव आया. सिंतबर 1964 में पहला अविश्वास गिरने के बाद अगले साल 1965 में उनके खिलाफ दो प्रस्ताव लाए. ये मार्च और फिर अगस्त में लाए गए. हालांकि दोनों में ही विपक्ष को सफलता नहीं मिली लेकिन इस पर पर्याप्त बहस हुई.

चंद्रशेखर के भाषणों का होता इंतजार 

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में 15 बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया. सभी में लोकसभा में चर्चा दूसरे दिन तक गई और फिर इस पर वोटिंग हुई. 90 के दशक और उसके बाद जब भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तब चंद्रशेखर का भाषण हमेशा आकर्षण का केंद्र होता था. पूरे देश की निगाहें आमतौर पर उनके भाषण पर होती थीं. उनकी बातें पैनी और काफी नपी-तुली होती थीं.

(न्यूज 18 के लिए संजय श्रीवास्तव का लेख)

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