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पीएम मोदी का इंटरव्यू प्रोपेगेंडा है, ऐसा सिर्फ चीन और रूस में होता है: शिवसेना

बीजेपी की पुरानी साथी और एनडीए का हिस्सा शिवसेना ने एक बार फिर मोदी सरकार पर निशाना साधा है. शिवसेना ने हाल ही में हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक इंटरव्यू को लेकर उनपर हमला बोला है

Updated On: Aug 13, 2018 04:08 PM IST

FP Staff

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पीएम मोदी का इंटरव्यू प्रोपेगेंडा है, ऐसा सिर्फ चीन और रूस में होता है: शिवसेना

बीजेपी की पुरानी साथी और एनडीए का हिस्सा शिवसेना ने एक बार फिर मोदी सरकार पर निशाना साधा है. शिवसेना ने हाल ही में हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक इंटरव्यू को लेकर उनपर हमला बोला है. शिवसेना ने पीएम के इस इंटरव्यू को सरासर खुद का प्रचार करना कहा है. अपने मुखपत्र 'सामना' और 'दोपहर का सामना' में कहा, 'रिपोर्टर्स ने पीएमओ को सवाल भेजे, जहां से उन्हें लिखित में सवाल मिले. बहुत से लोगों ने इसे इंटरव्यू माना. लेकिन दूसरों शब्दों में ये प्रोपेगेंडा था.'

पत्रकारों को मिलनी चाहिए आजादी

सामना में कहा गया कि ऐसा चीन, रूस और कम्यूनिस्ट देशों में होता है, जहां बातचीत एक तरफा होती है. शिवसेना ने कहा कि एक डायरेक्ट इंटरव्यू में कई सवाल पूछे जा सकते हैं और इंटरव्यू लेने वाला झूठे बयानों को भी पकड़ सकता है. पत्रकारों को कम से कम इतनी आजादी मिलनी चाहिए. लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री ने इस प्रथा को खत्म कर दिया है. वो सिर्फ उसी का जवाब देते हैं जो उन्हें ठीक लगता है और इसी हिसाब से इंटरव्यू भी छपते हैं.

क्यों बेरोजगार युवाओं को सड़कों पर उतरना पड़ रहा

सामना में छपे लेख में नौकरियों को लेकर इंटरव्यू में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए जवाब का भी उल्लेख भी किया गया. इसमें कहा गया कि पीएम मोदी ने बताया था कि एक साल में 70 लाख नौकरियां पैदा की गईं, जिनमें से करीब 45 लाख नौकरियां सितंबर, 2017 से अप्रैल, 2018 के बीच दी गई. शिवसेना ने कहा कि ऐसा दर्शाया जा रहा है कि 2019 तक दोगुनी या फिर तीन गुनी नौकरियां पैदा कर दी जाएंगी. अगर इतनी सारी नौकरियां हैं तो फिर क्यों बेरोजगार युवाओं को सड़कों पर उतरना पड़ रहा है और जॉब रिजरवेशन की मांग को लेकर प्रदर्शन करना पड़ रहा है.

पत्रकारों को खोनी पड़ सकती है नौकरी

पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए शिवसेना ने कहा कि पिछले चार सालों में पीएम मोदी ने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. रेडियो प्रोग्राम 'मन की बात' के जरिए अपनी सोच रखी. पर इससे पीएम मोदी की कोई प्रतिष्ठा नहीं बढ़ी. 2014 से पहले मोदी मीडिया के दोस्त थे, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने खुद को पिंजड़े में बंद कर लिया. अगर ऐसा ही चलता रहा तो बहुत से पत्रकारों को अपनी नौकरी खोनी पड़ सकती है.

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