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करोड़ों डॉलर के इस्लामिक फाइनेंस का मौका भुनाए भारत

इंडियन स्टॉक मार्केट दुनिया का सबसे ज्यादा शरिया आधारित एक्सचेंज है...

Updated On: Nov 28, 2016 03:51 PM IST

Zafar Sareshwala

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करोड़ों डॉलर के इस्लामिक फाइनेंस का मौका भुनाए भारत

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के आम बैंकों में ‘इस्लामिक विंडो’ खोलने के प्रस्ताव ने देश में इस्लामिक बैंकिंग की नैतिकता को लेकर बहस छेड़ दी है.

हालांकि, एक वर्ग इंडिया में इस्लामिक शरिया बैंकिंग को सही मान रहा है, लेकिन दूसरा वर्ग आरबीआई के प्रस्ताव को खारिज करता हुआ कह रहा है कि यह भारतीय मुसलमानों को मध्यकालीन युग में धकेल देगा. इस्लामिक बैंकिंग एक शरिया आधारित बैंकिंग सिस्टम होता है जिसमें किसी भी तरह के ब्याज की मनाही है.

लेकिन, इस्लामिक बैंकिंग के नफे-नुकसान पर बहस करने से पहले एक आपत्ति यह है-

मौजूदा वक्त में इंडिया में इस्लामिक बैंकिंग के लिए कोई जगह नहीं है। इसकी सीधी वजह यह है कि ‘बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949’ के मुताबिक, देश में ऐसा कोई समानांतर बैंकिंग सिस्टम नहीं हो सकता है जिसमें ब्याज की इजाजत न हो.

तत्काल जरूरत

ऐसे में, इंडिया में शरिया बैंकिंग हो या न हो, इस पर बहस करने की बजाय फोकस 3 लाख करोड़ डॉलर के बड़े इस्लामिक फाइनेंस मार्केट को भुनाने पर होना चाहिए.

लेकिन, इससे ऐसा करने से पहले नौकरी या काम-धंधा कर पैसा कमा रहे हर मुसलमान का बैंक खाता खोलना जरूरी है. मौजूदा वक्त में बड़े स्तर पर मुस्लिमों की बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच नहीं है.

  • ज्यादा तादाद में मुस्लिमों को रेगुलेटेड बैंकिंग सिस्टम में आना चाहिए. इन्हें खाते खोलने चाहिए, पैन कार्ड होने चाहिए और इन्हें इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने चाहिए.
  • युवा आंत्रप्रेन्योर्स को फायदेमंद कारोबार की प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स तैयार करनी चाहिए और बैंकों से लोन मांगना चाहिए. ऐसे मामले देखे गए हैं जिनमें लोगों को लोन नहीं मिल पाया.
  • इन्हें आरयूडीएसईटीआई (रूरल डिवेलपमेंट एंड सेल्फ एंप्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) के पास जाना चाहिए. स्किल डिवेलपमेंट के लिए 500 से ज्यादा जिलों में इसकी मौजूदगी है.
हमारे सिस्टम में आम आदमी के लिए काफी कुछ है और वक्त की जरूरत इन्हें इसका हिस्सा बनाने की है. इन सबसे मुस्लिम युवाओं को खुद को सशक्त बनाने और ग्लोबल इस्लामिक फाइनेंस मार्केट का हिस्सा बनाने में मदद मिलेगी. इंडिया इसमें एक बड़ा खिलाड़ी क्यों नहीं बन सकता है?

यह भी पढ़ें: इस्लाम विरोधी शरिया बैंक से सावधान रहे भारत सरकार

फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

पश्चिमी जगत ने कैसे बढ़त हासिल की?

इस्लामिक बैंकिंग और फाइनेंस की जब भी बात होती है तो सबसे पहली चीज मुस्लिम देशों की मोनोपॉली की सामने आती है. हालांकि यह एक भ्रम है.

पश्चिमी देशों ने इस्लामिक फाइनेंस की अहमियत और इसकी संभावनाओं को पहचाना है. सबसे पहले सिटीबैंक ने 1980 के दशक में बहरीन में सिटी इस्लामिक यूनिट खोली थी. इसके बाद एचएसबीसी अमाना ने लंदन में अपना हेडक्वॉर्टर खोला और फिर इसे दुबई और बाद में फिर से लंदन शिफ्ट कर दिया. एबीएन एमरो, कॉमर्ज बैंक (जर्मनी) और दूसरों ने भी इस रास्ते पर कदम बढ़ाए.

इतनी बड़ी संभावना होने के बावजूद मुझे इस्लामिक फाइनेंस के बारे में 1990 में तब पता चला जब मुझे फैसल इस्लामिक बैंक, बहरीन ने लंदन में हुई ‘इस्लामिक फाइनेंस कॉन्फ्रेंस’ में आमंत्रित किया. मेरी आंखें तब खुली रह गईं जब मुझे पता चला कि पेश किए गए 75 फीसदी पेपर्स गैर-मुस्लिमों के थे और इस विषय के ज्यादातर एक्सपटर्स गैर-मुस्लिम देशों से थे.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी हर साल तीन दिन का इस्लामिक फाइनेंस प्रोग्राम चलाती है. मैंने गैर-इस्लामी माहौल में इस्लामिक फंड तैयार करने पर पेपर पेश किया. इसमें इस पहलू पर फोकस किया गया था कि इंडिया इनवेस्टमेंट खड़ा करने में हिस्सेदारी नहीं करता है.

हलाल फूड

हलाल ब्रांड फूड इस बात की सबसे बढ़िया मिसाल है कि किस तरह से इस्लाम और गैर-इस्लाम जैसी बहसों में जाए बगैर इनवेस्टमेंट के मौकों को भुनाया जा सकता है. मुसलमानों को छोड़कर हिंदू समेत दूसरों में शायद ही हलाल मीट को लेकर कोई परेशानी है. हर रेस्टोरेंट और खाने-पीने की दुकान में हलाल पॉल्ट्री उत्पादों का इस्तेमाल होता है. मुसलमान पोर्क नहीं खाते हैं और मुसलमानों को उनकी आस्था वाले हलाल उत्पाद मिलें, इससे हलाल ब्रांड आज 6 अरब डॉलर का मार्केट बन गया है.

गुजरात की दो जैन बहनों ने हलाल कॉस्मेटिक्स का वेंचर खड़ा किया है, जो कि एनिमल फैट, गिलेटिन या एक्सट्रैक्ट्स का इस्तेमाल किए बिना कॉस्मेटिक आइटम बनाता है. यही चीज इस्लामिक फाइनेंस के साथ भी है. धार्मिक आस्था में जाए बगैर असली इनवेस्टमेंट मौके को भुनाया जा सकता है.

इसे इस्लामिक बैंकिंग क्यों कहें?

सबसे पहले यहूदियों ने पारंपरिक बैंकिंग की शुरुआत की थी, लेकिन क्या हम इसे यहूदी बैंकिंग कहते हैं?

इस्लामिक बैंकिंग इस्लाम जितनी ही पुरानी है. पैगंबर मुहम्मद को, जो कि शुरुआती जिंदगी में एक आंत्रप्रेन्योर और ट्रेडर थे, सादिक-उल-अमीन (एक भरोसे योग्य व्यक्ति) के तौर पर जाना जाता था, क्योंकि लोग सुरक्षा के लिए उनके पास पैसे जमा करते थे.

मुदरबा इस्लामिक दुनिया का पहला बैंकिंग सिस्टम था. यह एक इस्लामिक कॉन्ट्रैक्ट था जिसमें एक पार्टी पैसे की सप्लाई करती थी और दूसरी किसी खास ट्रेड के लिए स्किल मुहैया कराती थी.

उपनिवेशवाद के पनपने के साथ ही इस्लामिक सिस्टम का अंत हो गया, लेकिन यूके के कॉरपोरेट बैंकों ने इसे फिर से जिंदा किया.

इस्लाम के न्याय और बराबरी के मूल सिद्धांत के मुताबिक, किसी शख्स को दिए गए लोन पर ब्याज नहीं वसूला जा सकता है. साथ ही कर्ज बेचने और पैसे से पैसा बनाने की इजाजत नहीं दी गई है.

ऐसे में, इस्लामिक बैंकिंग पर धर्म का ठप्पा लगाने की बजाय इसे इनक्सूसिव (समावेशी) बैंकिंग के तौर पर देखा जाना चाहिए.

यह भी पढ़ें: इस्‍लामिक बैंकिंग का प्रस्‍ताव परिपक्‍व और सोचा-समझा फैसला

इंडियाः इस्लामिक बैंकिंग का अगला ठिकाना

1998 में डाऊ जोंस ने डाऊ जोंस इस्लामिक इंडेक्स तैयार किया और इसके सीईओ एक यहूदी और एक मुस्लिम थे. इसमें कोई भी इंडियन कंपनी लिस्टेड नहीं थी. मैंने लंदन में डाऊ जोंस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह मुद्दा उठाया था.

हिंदू-मुस्लिम, इस्लामिक-गैरइस्लामिक मसलों पर तर्क देने और मजहब के चश्मे से देखने की बजाय क्यों न हम 3 लाख करोड़ डॉलर के इस्लामिक फाइनेंस मार्केट का खिलाड़ी बनने पर नजरें गड़ाएं, जिसके 2020 में दोगुने होने की उम्मीद है.

Sensex

इंडियन स्टॉक मार्केट दुनिया का सबसे ज्यादा शरिया आधारित एक्सचेंज है, जो कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की और बहरीन से भी अधिक शरिया नियमों के मुताबिक है. बीएसई में इस्लामिक फाइनेंस पर एक ट्रेनिंग सेंटर भी है. इंडिया को अपने इंफ्रा प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े फंड की जरूरत है और इस्लामिक फाइनेंस का इसके लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इंडिया इस्लामिक फाइनेंस एक्सपर्ट मुहैया कराने का हब बन सकता है.

(देबब्रत घोष से बातचीत पर आधारित)

जफर सरेशवाला मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं.

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