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स्पेस एक्स की सफलता का फायदा क्या इसरो को मिल सकता है

अंतरिक्ष उद्योग देश में सेवाओं, निर्माण और रोजगार में नए सिरे से दम भरने के लिए अगली क्रांति साबित हो सकता है

Updated On: Feb 16, 2018 06:36 PM IST

Milind Deora Milind Deora

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स्पेस एक्स की सफलता का फायदा क्या इसरो को मिल सकता है

धरती के अलावा किसी दूसरे ग्रहों पर इंसानों के बसने की संभावनाओं का पता लगाने के काम में छह फरवरी को उस वक्‍त एक नया मोड़ आया जब प्राइवेट कंपनी स्‍पेस एक्‍स के फाल्‍कन हैवी राकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया गया. एलन मस्‍क के मालिकाना हक वाली कंपनी स्‍पेस एक्‍स का काम यह पता लगाना है कि अंतरिक्ष के दूसरे ग्रहों पर इंसानों को बसाया जा सकता है या नहीं, खासतौर पर मंगल ग्रह पर. इसके अलावा इस कंपनी का मकसद अंतरिक्ष की खोज और स्‍पेस ट्रेवल के कम लागत मगर प्रभावी तौर तरीकों का पता लगाना है. फाल्‍कन हैवी ने मनुष्‍यों की इस पुरानी ख्‍वाहिश को एक कदम और आगे ला दिया है.

फाल्‍कन हैवी बहुत ता‍कतवर राकेट है और इसमें दोबारा काम में आने लायक बूस्‍टर्स लगे हुये हैं. इनकी क्षमता 141,000 पाउंड का पेलोड ऊपर ले जाने की है. कमाल की बात ये है कि ये बहुत कम लागत पर तैयार किया गया है. पेलोड का खर्चा आया है महज 1300 डालर प्रति किलो जबकि अंतरिक्ष यान पर प्रति किलो 60,000 का खर्चा आता है.

जब से अंतरिक्ष के बारे में पता लगाने के काम की शुरुआत हुई है उसके बाद से, केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) जैसी सरकारी एजेंसियों का ही इसमें बोलबाला रहा है. नासा ने ढेरों सफलताएं हासिल की हैं और तमाम इनोवेंशस करने में कामयाबी पाई है. फाल्कन हैवी का लॉन्च बहुत ही अहम है क्योंकि यह अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र की अगुवाई वाली कोशिशों के लिए भविष्य दिखाने वाले चिराग की तरह है. अंतरिक्ष ही वास्तव में वह जगह रह गई है जहां खोज के काम अभी बाकी है. अमेरिका ने अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र में कम्‍पटीशन बढ़ाने की इजाजत दी है, और हम एलोन मस्क और जेफ बेजोस के बीच अत्याधुनिक प्रतिस्पर्धा देख रहे हैं. वे लोग इस खोज की अंतिम सीमा को पाने और जानने के लिए लागत प्रभावी तौर तरीके खोजने के लिए जूझ रहे हैं.

बंदिशों के बाद भी बेमिसाल इसरो

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) नासा के बाद ग्यारह साल बाद बना. लेकिन देश की वित्तीय सीमाओं के चलते हम नासा जैसा प्रदर्शन हासिल नहीं कर सके. फिर भी, उन बहुत कम सीमाओं के कारण, हम मजबूर हुये कि प्रतिस्पर्धी में बने रहने के लिए हम कम लागत वाले तरीकों को खोजें. मार्स आर्बिटर मिशन से इस बात को समझा जा सकता है. तकनीकी कमियों पर काबू पाने और रिकॉर्ड-कम बजट पर काम करने के लिए, इसरो ने होमैन स्थानांतरण कक्षा के तरीके का इस्तेमाल किया, जिसे "स्लिंगशॉट" विधि के रूप में जाना जाता है. इसके लिए मंगलयान को मंगल की तरफ भेजने में जरूरी स्‍पीड हासिल करने के लिए पहले धरती के चारों ओर कक्षा में छह बार चक्‍कर लगाने पड़े.

इसरो ने ऐसे कई मिशनों की सफलतापूर्वक पूरा करके कई बार वैश्विक सुर्खियां हासिल की हैं, और इसमें हमारे इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की एक प्रतिभाशाली टीम ने अहम योगदान दिया है. मुझे इसकी कोई वजह नहीं लगती कि भारत में स्‍पेस एक्‍स जैसी कंपनियों को खड़ा नहीं किया जा सकता. इसकी मदद से देश को रिसर्च हब के रूप में ढाला जा सकता है.

स्पेस एक्स केवल शुरुआत है, और हम अगले कुछ दशकों में अंतरिक्ष में खोज के लिए बड़े पैमाने पर उद्योगों को आगे आता देख सकते हैं. हम देखेगें कि किस तरह ग्रहों को उपनिवेश बनाने से लेकर एस्‍टेरॉयड या क्षुद्रग्रहों पर ड्रिलिंग का काम होने लगा है. अब वक्‍त आ गया है कि भारत इन कुछ इनोवेंशस की अगुवाई करके अंतरिक्ष उद्योग में अहम खिलाड़ी बन कर उभरे.

क्या हैं भारत के लिए मौके

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यह तर्क कि अंतरिक्ष में खोज या उसमें ट्रैवल, भारत के लिए एक उम्‍दा बाजार नहीं है, क्योंकि यह एक वास्तविक वैश्विक बाजार है जो भौगोलिक और राष्ट्रीय सीमाओं से आगे है. इस उद्योग में इनोवेशंस को फेसबुक, अमेज़ॅन, नेटफ्लिक्स या ऊबर से नहीं समझा जा सकता है. यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि सिलिकॉन वैली में ही क्यों ये कंपनियां खड़ी हो सकीं. दरअसल इन उत्पादों को अमेरिकी उपभोक्ता के लिए विकसित किया गया और फिर अन्य बाजारों के हिसाब से उन्‍हें मोड़ देना पड़ा.

अंतरिक्ष में इनोवेशंस स्‍टैण्‍डर्ड बिजनेस रूल्‍स के अधीन नहीं है. आप एक ऐसे उत्पाद का निर्माण कर रहे हैं, जो कि किसी व्यक्तिगत बाजार के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिये होता है. यह जरूरी है क्योंकि इनोवेशंस दुनिया के किसी भी हिस्से से हो सकते हैं. ये भारत के भीतर ही हो सकते हैं. हमारे एयरोनॉटिकल और एयरोस्पेस इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की प्रतिभावान टीम में वैश्विक पूंजी को आकर्षित करने की क्षमता है और उसमें सिलिकॉन वैली के साथ प्रतिस्पर्धा किए बिना इनोवेंशस को बढ़ावा देने की क्षमता है, क्योंकि उन्हें वैश्विक मांग को पूरा करना होगा, न कि महज भारतीय बाजार को.

इस बढ़ते बाजार का लाभ लेने के लिए कुछ पहले भारत में हो चुकी हैं. इसरो एक बेहतरीन अंतरिक्ष कार्यक्रम चला रहा है. कई भारतीय स्टार्ट-अप इस बाजार में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हैं और पहली बार, निजी क्षेत्र स्‍पेस में खोज और स्‍पेस ट्रेवल के काम में आगे आने का तैयार है. भारत को इस अंतिम सीमा पर जीत हासिल करने और अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा करने और यहां तक कि चीन और रूस को धकियाने की क्षमता है क्योंकि हमारे पास इन दोनों से ज्यादा मजबूत निजी क्षेत्र है.

अब कोडर्स और आईटी के लोगों की जगह धीरे-धीरे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस रही है. ऐसे में अंतरिक्ष उद्योग देश में सेवाओं, निर्माण और रोजगार में नए सिरे से दम भरने के लिए अगली क्रांति साबित हो सकता है.

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