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कांग्रेस को बदलने के लिए क्या कामराज प्लान लागू करेंगे राहुल गांधी?

जानकार बताते हैं कि राहुल गांधी अब संगठन में धीरे-धीरे फेरबदल करेंगे. ये प्रक्रिया सतत चलती रहेगी. अचानक सबको बदलने का फैसला नहीं लिया जाएगा

Updated On: Mar 21, 2018 01:28 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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कांग्रेस को बदलने के लिए क्या कामराज प्लान लागू करेंगे राहुल गांधी?

कांग्रेस का महाधिवेशन समाप्त हो गया है. राहुल गांधी के सामने दो काम हैं- कर्नाटक में पार्टी की रणनीति तय करना और 2019 के आम चुनाव से पहले पार्टी के लिए एक मजबूत टीम खड़ी करना. नई टीम बनाने के लिए राहुल गांधी मशक्कत कर रहे हैं.

राहुल गांधी ने महाधिवेशन में कहा कि नए लोगों को लिए कांग्रेस का स्टेज खाली है. जिसके लिए पहली बार स्टेज पर कांग्रेस का कोई नेता नहीं बैठा बल्कि सभी स्टेज के सामने कुर्सी पर बैठे रहे. राहुल गांधी ने कहा कि कार्यकर्ता और नेताओं के बीच दीवार है. इस दीवार को राहुल तोड़ना चाहते हैं, जिसके लिए सीनियर नेताओं को तैयार रहना चाहिए.

हालांकि राहुल गांधी कैसे इस दीवार को तोड़ेंगे इसके लिए क्या तरीका अपनाएंगे. ये नहीं बताया है. लेकिन एक खास बात जरूर है कि पुराने नेता अब राहुल गांधी के सिस्टम में मिसफिट हो रहे हैं. क्योंकि राहुल गांधी जिस बदलाव की बात कर रहे हैं, उससे सबसे ज्यादा परेशान पार्टी के सीनियर नेता ही हैं. राहुल गांधी के इस भाषण के बाद गोवा के प्रदेश अध्यक्ष शांता राम नाइक ने इस्तीफा दे दिया है. 71 साल के शांता राम नाइक ने कहा कि वो राहुल गांधी से काफी प्रभावित हैं इसलिए नए लोगों को मौका देने के लिए कुर्सी छोड़ रहे हैं.

लेकिन सवाल ये उठता है कि महाधिवेशन में स्टेज खाली रखने से पूरे देश में सीनियर नेता शांताराम नाईक वाला रास्ता अख्तियार करेंगे. या राहुल गांधी की नई टीम बनने तक इंतजार करेंगे. सवाल ये उठता है कि क्या पुराने नेताओं को दरकिनार करके राहुल गांधी कामराज प्लान को कांग्रेस के भीतर लागू करना चाहते हैं? इस मंशा को लेकर कांग्रेस में सुगबुगाहट है. या फिर बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल की तरह कांग्रेस में भी सीनियर नेताओ की कमेटी बनेगी.

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क्या है इशारा?

शांताराम नाइक का इस्तीफा बहुत कुछ कहता है. शांताराम नाइक 71 साल के हैं. गोवा जैसे महत्वपूर्ण राज्य के अध्यक्ष हैं. लेकिन उनके इस्तीफे के जरिए पार्टी ने ओल्ड गार्ड को सेफ एग्जिट का मौका दिया है, जिससे राहुल गांधी आसानी से अपनी नई टीम बना सकें. कांग्रेस के नेता अंदरखाने इस बात का जिक्र कर रहे हैं लेकिन कोई खुलकर बोलने के लिए तैयार नहीं है.

राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश अध्यक्षों को फिलहाल अपने पद पर बना रहने के लिए कहा है. लेकिन इस महाधिवेशन के बाद तकनीकी तौर पर एआईसीसी की कमेटी भंग हो चुकी है. अब नई वर्किंग कमेटी बनेगी और नए पदाधिकारी भी नियुक्त किए जाएंगे. राहुल गांधी भी पार्टी के सीनियर नेताओं को संगठन के काम-काज में लगाएंगे लेकिन पद देकर या बिना पद देकर, ये संस्पेंस बना हुआ है. कामराज प्लान में सरकार से इस्तीफा देकर संगठन का काम करने का फार्मूला था. लेकिन यहां कांग्रेस सत्ता में नहीं है. हालांकि राहुल गांधी ने आश्वासन दिया है कि युवा और बुजुर्ग नेताओं में सामंजस्य बनाएंगे लेकिन संशय बना हुआ है.

क्या था कामराज प्लान?

तमिलनाडु के कद्दावर नेता कुमारास्वामी कामराज राज्य के मुख्यमंत्री भी थे. 1963 में कामराज ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. कामराज का मानना था कि कांग्रेस चुनाव तो जीत रही है लेकिन जनता से दूर होती जा रही है. इसलिए सभी सीनियर नेताओं को पार्टी के लिए काम करना चाहिए इस प्लान की वजह से कई सीनियर नेताओं को सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था. जिसमें 6 मुख्यमंत्री और 6 केंद्रीय मंत्री शामिल थे. जगजीवन राम, मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक, एस के पाटिल और लाल बहादुर शास्त्री सरकार से अलग होकर संगठन का कामकाज करने लगे थे. इसके बाद कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. हालांकि इंदिरा गांधी से मतभेद की वजह अलग पार्टी का गठन किया लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई.

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वर्किंग कमेटी के नहीं हुए चुनाव

राहुल गांधी पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की वकालत करते रहें हैं, जिसके तहत यूथ कांग्रेस और एनएसआईयू के संगठन के चुनाव में कराए जा रहें हैं. लेकिन कांग्रेस ने वर्किंग कमेटी बनाने के लिए राहुल गांधी को बतौर अध्यक्ष अधिकृत कर दिया है. वर्किंग कमेटी में चुनाव नहीं कराया गया. इसके मतलब अब पुराने चेहरों में से कुछ लोग ही नई वर्किंग कमेटी में रह जाएंगे क्योंकि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद पहली मीटिंग में सोनिया गांधी ने कहा था कि यहां सब पुराने चेहरे मौजूद हैं. इशारा साफ है कि अब पुराने लोगों को नए के लिए जगह छोड़नी होगी.

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कांग्रेस की वर्किंग कमेटी सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवार संस्था है जो पार्टी में कोई भी बदलाव कर सकती है. वर्किंग कमेटी बहुमत से किसी भी व्यक्ति को अध्यक्ष पद से हटा सकती है. इस तरीके से ही सीताराम केसरी को हटाकर सोनिय गांधी को अध्यक्ष मनोनीत किया गया था. सोनिया गांधी बाद में संगठन के चुनाव में जीत कर अध्यक्ष निर्वाचित हुई थी.

धीरे-धीरे बनेगी नई टीम

कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने अपनी टीम में कोई भारी भरकम फेरबदल नहीं किया है. जानकार बताते हैं कि राहुल गांधी को महाधिवेशन का इंतजार था. उससे पहले वो सोनिया गांधी के बनाए निजाम को खत्म नहीं करना चाहते थे. इसलिए अब संगठन में धीरे-धीरे फेरबदल होगा. ये प्रक्रिया सतत चलती रहेगी. अचानक सबको बदलने का फैसला नहीं लिया जाएगा. राहुल गांधी ने अपनी नई टीम बनाने की तैयारी पूरी कर ली है. जिसमें माना जा रहा है कि युवा नेताओं की भरमार होगी. जिस तरह से कर्नाटक और झारखंड के प्रभारी युवा नेताओं को बनाया गया है. वैसे ही हर राज्य का प्रभारी बदलने की तैयारी हो रही है. राहुल गांधी अत्यंत ताकतवर पार्टी के महासचिव के पद की ताकत घटाने जा रहे हैं, जिसमें हर प्रभारी के पास एक राज्य होगा और उसको सहयोग करने के लिए कई सचिव काम करेंगे. जिससे पूरी जवाबदेही प्रभारी की होने वाली है.

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इससे पहले एक महासचिव कई राज्य का प्रभारी हुआ करता था जिससे वो कई साल तक उस राज्य में नहीं जा पाता था. कांग्रेस के सगंठन में ये दस्तूर है कि पार्टी का अध्यक्ष राज्य के प्रभारी के बिना प्रदेश अध्यक्ष या बड़े नेताओं से नहीं मिलता था. ये परंपरा राहुल गांधी समाप्त करने जा रहे हैं. राहुल गांधी का ऑफिस जिसकी कमान के राजू के पास है. उससे सीधे संपर्क किया जा सकेगा. जिस तरह गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी ने प्रयोग किया था. वहां के नेताओं से राहुल गांधी ने अपने दफ्तर से संपर्क में रहने के लिए कहा था. हालांकि ये किताबी बातें कितनी अमल में आएगी ये कहना मुश्किल है.

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राहुल के टीम में विरासत वाले नेता ज्यादा

हालांकि राहुल गांधी ने जो नियुक्तियां की हैं, उसमें ज्यादातर ऐसे हैं जो खानदानी नेता हैं. ऐसे में नए लोगों को जगह कैसे देंगे, ये सवाल सामने है. महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव असम से कांग्रेस के नेता संतोष मोहन देव की बेटी हैं. इस तरह जितेंद्र सिंह पूर्व रजवाड़ा परिवार से आते हैं. मिलिंद देवड़ा के पिता मुरली देवड़ा यूपीए में कई साल तक मंत्री भी थे. ये नाम सिर्फ बानगी हैं. ऐसे नामों की फेहरिस्त लंबी है. हालांकि राहुल गांधी ने कई बार विरासत की राजनीति के आरोप का जवाब दिया है. राहुल ने कहा है कि विरासत की राजनीति कांग्रेस में ही नहीं हर पार्टी में है. ये जवाब मौजूदा राजनीतिक हालात में सामान्य लग रहा है क्योंकि कोई राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं है. खासकर क्षेत्रीय दल, जहां विरासत की राजनीति ही चल रही है. लेकिन अपनी नई टीम में राहुल गांधी को ये दिखाना होगा कि युवा मतलब ब्लू ब्लड नहीं है. बल्कि आम जनमानस आया नेता भी कांग्रेस में बढ़ सकता है. हाल के राज्यसभा चुनाव में राहुल गांधी ने कोशिश की है, जिसमें सामान्य कार्यकर्ता को भी पार्टी का टिकट दिया गया है.

बीजेपी का मार्गदर्शक मंडल

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह को कमान मिली. अमित शाह ने लालकृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जोशी सरीखे सीनियर नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया, जिसके पास कोई अधिकार नहीं है. इसके सदस्य यशवंत सिन्हा सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं लेकिन मोदी शाह की जोड़ी ऐसा इसलिए कर पाई क्योंकि मोदी की अगुवाई में बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में है. राहुल गांधी के लिए ये समस्या है पार्टी सत्ता से दूर है. प्रदेशों में बीजेपी चुनाव जीत रही है. कर्नाटक के चुनाव राहुल गांधी के लिए एक बड़े यज्ञ की तरह है, जिसमें सफल होने पर पार्टी के भीतर और बाहर उनकी स्थिति मजबूत होगी.

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