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क्या नए वाजिद अली शाह हैं मुलायम!

वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने ‘अवध बदर’ कर दिया था . उनका आखिरी वक्त हुगली के किनारे मटिया बुर्ज में बीता.

Madhukar Upadhyay Updated On: Jan 18, 2017 08:27 AM IST

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क्या नए वाजिद अली शाह हैं मुलायम!

लखनऊ में रहने वालों की एक बड़ी दिक्कत ये है कि पूर्ववर्ती नवाबों की आत्मा का परकाया प्रवेश कब हो जाए उन्हें पता नहीं चलता. जब तक इल्म होता है, नवाबियत अपना काम कर चुकी होती है. जो हश्र होना है, हो गुजरता है.

कई बार ऐसा हुआ है कि किसी एक नवाब की आत्मा एक वक्त में एक ही खानदान के दो लोगों में दाखिल हो गई. तस्वीर थोड़ा गड्ड-मड्ड हुई. लोग जिस्म के पीछे भागते रहे लेकिन मामला रूह का था. बहुत बाद में समझ आया कि शरीर वही कर रहा था, जो आत्मा करा रही थी.

अवध का 1743 का वाकया

वाकया 1743 का है. अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद होती थी. नवाब शुजाउद्दौला थे और कामकाज में उनकी बेगम ज़ोहरा बानो का खासा दखल था. बल्कि चलती उन्हीं की थी. वो लोकप्रिय थीं. कुछ मायनों में शुजाउद्दौला से ज्यादा. वो ‘बहू बेगम’ कहलाती थीं.

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अपने पुत्रों के साथ शुजाउद्दौला

बाद शुजाउद्दौला, आसफ़ुद्दौला अवध के चौथे नवाब बने. मां का रसूख और साया उनके काम आया लेकिन साया दिन ब दिन लंबा होता गया. वह आसफ़ुद्दौला को नागवार गुजरने लगा. ये ठीक नहीं हुआ. वो ठीक नहीं हुआ. फलां काम फलां को सौंपते तो ठीक रहता, जैसी हिदायतें उन्हें खलने लगीं.

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आसफ़ुद्दौला ने टोका-टाकी से पिंड छुड़ाने के लिए फ़ैज़ाबाद छोड़ने का फैसला कर लिया और 1775 में लखनऊ को अवध की नई राजधानी मुकर्रर किया गया. बहू बेगम फ़ैज़ाबाद में ही रह गईं. इसके बाद आसफ़ुद्दौला की दो छवियां बनीं जो अंत तक उनके साथ चिपकी रहीं.

परिवार के बड़े-बुजुर्ग के साथ ऐसे व्यवहार के लिए समाज में आसफ़ुद्दौला की खासी किरकिरी हुई. कहा जाने लगा बेहतर होता कि खुदा बेऔलाद रखता.

दूसरी छवि अवध के अकाल के समय बनी जब सबको मदद करने के लिए उनकी तारीफ हुई. मुहावरा बन गया कि ‘जिसको ना दे मौला उसको दे आसफ़ुद्दौला’.

Asuf_ud_Daula

लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा उसी दौर की विरासत है, जिसे भूलभुलैया भी कहा जाता है. ये कम हैरतनाक नहीं है कि आसफ़ुद्दौला को वहीं दफनाया गया जहां आकर लोग अक्सर भटक जाते हैं.

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ये सिलसिला लखनऊ की सियासत की गलियों में अब भी जारी है. पता नहीं चल पा रहा है कि आसफ़ुद्दौला की आत्मा का प्रवेश मुलायम सिंह यादव में हुआ कि अखिलेश यादव में.

बतर्ज आसफ़ुद्दौला मुलायम का सीने पर हाथ रख कर कहना कि ‘मेरा जो कुछ था मैंने सब दे दिया’ तो अखिलेश का बुजुर्गों की दखलंदाजी से मुक्त होने में नाम की पट्टी तक अपने नाम कर लेना.

हालांकि इस लड़ाई में जिस्म हारे हैं, रूह विजयी हुई है. अब अखिलेश पर है कि वो अपने ढंग का लखनऊ बना लें और पिता से आगे निकल जाएं.

अवध के दसवें और आखिरी नवाब वाजिद अली शाह

अवध के दसवें और आखिरी नवाब वाजिद अली शाह हुए. डलहौजी के ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’  में अवध का सूबा अंग्रेजों के कब्जे में गया तो 1856 में उन्हें ‘अवध बदर’ कर दिया गया. उनका आखिरी वक्त हुगली के किनारे मटिया बुर्ज में बीता.

Vajid_Ali_Shah

वाजिद अली शाह शासक से बेहतर शायर थे. अख़्तर तखल्लुस से शेर कहते थे. उनके दो शेर अभी के लिए मौजूं हैं.

मुलायम के लिए

‘दरो दीवार पे हसरत की नज़र करते हैं

खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं.’

एक अखिलेश के लिए

आजकल लखनऊ में ऐ अख़्तर

धूम है तेरी खुश बयानी की’

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