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एमपी नगरीय निकाय चुनाव: क्या शिवराज के लिए खतरे का संकेत है?

इन चुनाव परिणामों से यह संकेत साफ मिल रहे हैं कि लोगों में राज्य की शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ नाराजगी है

Updated On: Jan 20, 2018 06:10 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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एमपी नगरीय निकाय चुनाव: क्या शिवराज के लिए खतरे का संकेत है?

मध्य प्रदेश में 20 नगरीय निकायों के चुनाव नतीजे भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे का संकेत देने वाले हैं. नगरीय निकायों के 20 अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही 9-9 सीटों पर जीत मिली है. एक सीट पर बीजेपी की बागी उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहीं हैं. जबकि एक स्थान सेमरिया के वोटों की गिनती कोर्ट द्वारा लगाई रोक के कारण नहीं हुई है.

बीजेपी के एक उम्मीदवार र्निविरोध निर्वाचित होने में सफल रहे थे. जिन नगरीय निकायों में चुनाव हुए हैं, उनमें ज्यादतर आदिवासी बाहुल्य इलाके हैं. दिलचस्प यह है कि इन चुनावों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जमकर प्रचार किया था लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कोई दिलचस्पी किसी स्तर पर नहीं दिखाई थी.

दिग्विजय सिंह के गृह नगर राघोगढ़ में सेंध लगाने की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कोशिश भी सफल नहीं हो पाई. दिग्विजय सिंह इन दिनों नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं. इस कारण बीजेपी को उम्मीद थी कि वह राघोगढ़ के किले को भेदने में कामयाब रहेगी. चुनाव प्रचार के दौरान यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सभा के बाद कांग्रेस और बीजेपी के कार्यकर्त्ताओं के बीच विवाद हुआ. प्रशासन को धारा 144 लगाना पड़ी थी. इन चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही अध्यक्ष के पद के लिए 43-43 फीसदी वोट मिले हैं.

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आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में कांग्रेस को नगरीय निकाय चुनावों में अच्छी कामयाबी मिली है

बीजेपी के चुनाव जीतने वाले पार्षदों की संख्या भी ज्यादा है. इस कारण बीजेपी 46 फीसदी वोट हासिल करने में सफल रही है. जबकि कांग्रेस के पार्षद उम्मीदवारों को कुल 42 फीसदी वोट मिले हैं. इन 20 स्थानों पर पार्षदों के कुल 356 पदों का चुनाव हुआ. बीजेपी के 194 और कांग्रेस के 145 पार्षद उम्मीदवारों चुनाव जीते हैं. 13 निर्दलीय पार्षद चुने गए हैं.

क्या दलित-आदिवासी कांग्रेस में लौट रहे हैं

मध्य प्रदेश में इस साल के अंत तक विधानसभा के चुनाव होने हैं. राज्य की कुल 230 सीटों में 47 सीटें आदिवासी और 35 सीटें दलित वर्ग के लिए आरक्षित हैं. वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के कारण कांग्रेस को अपनी परंपरागत सीटों से हाथ धोना पड़ा था. पहली बार बीजेपी को निमाड़-मालवा और महाकौशल के आदिवासी क्षेत्रों में एतिहासिक सफलता हासिल हुई थी.

पिछले कुछ समय से दलित-आदिवासी बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. इसकी वजह पार्टी की आरक्षण को लेकर नीति मानी जा रही है. राज्य में दलित और आदिवासी वोटों को साधने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कई नई योजनाएं भी लागू की हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) संघ भी दलित और आदिवासी वोटों को साधने के लिए एक श्मशान, एक जलाशय और एक देवालय योजना पर तेजी से काम कर रहा है.

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शिवराज सिंह बीते 13 वर्षों से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हुए हैं

ताजा चुनाव नतीजों ने संघ और बीजेपी दोनों की ही चिंता बढ़ा दी है. धार और बड़वानी जैसे आदिवासी बाहुल्य जिलों में कांग्रेस की जीत को बदलाव का संकेत माना जा रहा है. धार और बड़वानी जिले के नगरीय निकाय के चुनाव 6 माह पूर्व होना थे. लेकिन, सरकार ने सरदार सरोवर परियोजना से हो रहे विस्थापन के नाम इन्हें टाल दिया था. धार जिला बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है. जिले में कुल 9 नगरीय निकाय हैं. इनमें 5 पर कांग्रेस उम्मीदवारों ने जीत दर्ज कराई है. जबकि बड़वानी जिले के 7 नगरीय निकायों के चुनाव में बीजेपी को 4 और कांग्रेस को 3 स्थानों पर जीत मिली है.

कांग्रेस के दिग्गजों ने नहीं ली थी चुनाव में दिलचस्पी

मध्य प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने चुनाव परिणामों के बाद कहा कि पार्टी हार के कारणों की समीक्षा करेगी. लंबे समय बाद ऐसी स्थिति बनी है कि कांग्रेस ने चुनावी मुकाबले में अपने आपको बीजेपी की बराबरी पर ला खड़ा किया है. कांग्रेस के पक्ष में आए परिणाम चौंकाने वाले इसलिए भी हैं क्योंकि पार्टी के दिग्गज नेताओं ने अपने उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करना तो दूर जनता से मतदान करने की अपील भी नहीं की.

सामान्यत: राज्य के कांग्रेसी नेता स्थानीय चुनावों में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं. पिछले 14 साल से बीजेपी इसका फायदा उठाते हुए चुनाव जीत जाती है. आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर घमासान मचा हुआ है. पिछले कई दिनों से अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुकाबले में पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएगी.

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मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की मांग जोर पकड़ रही है

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की पसंद भी सिंधिया ही बताए जाते हैं. सिंधिया के नाम पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेता सहमत नहीं हो रहे हैं. इस कारण सिंधिया के नाम का एलान नहीं हो पा रहा है. पार्टी में चल रहे चेहरे की घमासन के बीच आए इन चुनाव परिणामों से यह संकेत साफ मिल रहे हैं कि लोगों में राज्य की शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ नाराजगी है.

भावातंर भुगतान योजना से जिस लाभ की उम्मीद बीजेपी कर रही थी, वह इन चुनाव परिणामों में देखने को नहीं मिली है. चुनाव परिणामों के बाद मंदसौर में आयोजित एक जनसभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सार्वजनिक मंच से जनता से पूछना पड़ा कि भावातंर योजना को जारी रखा जाए या नहीं? भीड़ से योजना को जारी रखने के बारे में कोई उत्साहजनक जवाब मुख्यमंत्री को नहीं मिला.

कोलारस और मुंगावली से साफ हो जाएगी तस्वीर

विधानसभा चुनाव से पहले फरवरी के अंत में कोलारस और मुंगावली विधानसभा उपचुनावों के नतीजें आ जाएंगे. कांग्रेस के कब्जे वाली इन सीटों को जीतने के लिए बीजेपी और शिवराज सिंह चौहान ने पूरी ताकत झोंक दी है. ये दोनों सीटें ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाली और उनके संसदीय क्षेत्र का हिस्सा हैं.

बीजेपी इन दोनों सीटों को जीतकर कांग्रेस का मनोबल तोड़ने की इच्छा रखती है. नगरीय निकाय के चुनाव परिणामों को कोलारस और मुंगावली जीतने के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है. इन क्षेत्रों के चुनाव परिणाम सिंधिया के भविष्य का फैसला करने वाले भी होंगे. 20 नगरीय निकाय के आम चुनावों के साथ-साथ तीन स्थान पर राईट टू रिकॉल के तहत खाली कुर्सी और भरी कुर्सी का भी फैसला होना था.

Jabalpur: Prime Minister Narendra Modi being welcomed by Madhya Pradesh Chief Minister Shivraj Singh Chouhan on his arrival at the airport in Jabalpur, in Madhya Pradesh on Monday.(PTI5_15_2017_000052B)

मध्य प्रदेश नगरीय निकाय चुनावों में आशा के अनुरुप नहीं आए नतीजों ने बीजेपी और संघ को चिंता में डाल दिया है

रिकॉल वाले क्षेत्रों में भी बीजेपी को झटका लगा है. देवास जिले की नगर परिषद करनावद में राईट टू रिकॉल के तहत बीजेपी अपनी कुर्सी नहीं बचा पाई. मतदाताओं ने कांताबाई पाटीदार को पद से हटाने का फैसला किया है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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