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क्या राजनीति में अछूत होती जा रही है कांग्रेस?

ऐसा लग रहा है कि फिलहाल कांग्रेस के साथ कोई दल जाने के लिए तैयार नहीं है. क्योकि अभी सभी दलों को लग रहा है कि कांग्रेस के साथ जाना चुनावी तौर पर मुफीद नहीं है

Updated On: Jan 23, 2018 08:36 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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क्या राजनीति में अछूत होती जा रही है कांग्रेस?

कांग्रेस को उम्मीद है कि बीजेपी के विरोध में 2019 के चुनाव से पहले एक बड़ा गठबंधन बनाने में कामयाब हो जाएगी. लेकिन कुछ घटनाक्रम कांग्रेस के पक्ष में नहीं जा रहे हैं. सीपीएम के पोलित ब्यूरों में कांग्रेस से गठबंधन करने वाला प्रस्ताव गिर गया है. जबकि ये प्रस्ताव खुद सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने पेश किया था. लेकिन वोटिंग में पास नहीं हो पाया. कांग्रेस के लिए ये सोच का विषय बन गया है. कांग्रेस के नेताओ को नया गठबंधन बनानें मे काफी मशक्कत करनी पड़ेगी.

इससे पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन न करने का ऐलान किया था. बीएसपी अध्यक्ष मायावती भी कई मौकों पर कांग्रेस के साथ जाने से मना कर चुकी है. कांग्रेस के साथ दिक्कत है कि नॉर्थ इंडिया में बिना चुनाव पूर्व गठबंधन किए नैया पार होना मुश्किल है. कांग्रेस के पास सिर्फ बिहार में लालू प्रसाद की आरजेडी ही साथ दिखाई पड़ रही है.

ऐसा लग रहा है कि फिलहाल कांग्रेस के साथ कोई दल जाने के लिए तैयार नहीं है. क्योकि अभी सभी दलों को लग रहा है कि कांग्रेस के साथ जाना चुनावी तौर पर मुफीद नहीं है. कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते है कि ‘अभी कोई चुनाव नहीं है न कोई गठबंधन की बात है बल्कि मुद्दों के आधार पर कांग्रेस और लेफ्ट साथ है. जिस तरह से संसद में सरकार के खिलाफ दोनो दल मुद्दों के आधार पर समन्वय बना रहे हैं.’

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कांग्रेस की अगुवाई में बनी पहली यूपीए सरकार को लेफ्ट पार्टियों ने बाहर से समर्थन दिया था. लेकिन अमेरिका के साथ परमाणु करार पर लेफ्ट ने यूपीए के साथ रिश्ता तोड़ दिया. सीपीएम के तब के महासचिव प्रकाश करात परमाणु करार के खिलाफ थे. इस वजह से जुलाई 2008 में मनमोहन सिंह सरकार को विश्वास मत हासिल करना पड़ा था. लेकिन अचानक मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी नें पाला बदला और कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई. जिससे प्रकाश करात के सरकार गिराने के मंसूबे पर पानी फिर गया. जिसके बाद सीपीएम और कांग्रेस के बीच तनातनी चलती रही.

India's former Finance Minister Pranab Mukherjee (4th R), who resigned in June to run for president, walks with Samajwadi Party chief Mulayam Singh Yadav (6th L) after their meeting in the northern Indian city of Lucknow July 3, 2012. REUTERS/Pawan Kumar (INDIA - Tags: POLITICS)

मुलायम सिंह यादव ने यूपीए-2 का भी भरपूर साथ दिया था.

लेकिन सीपीएम और कांग्रेस फिर मिले 2016 के बंगाल के विधानसभा चुनाव में जिसमें कांग्रेस को तो गठबंधन का फायदा हुआ लेकिन सीपीएम को नुकसान हो गया. कांग्रेस 44 सीट जीतकर दूसरे नंबर की पार्टी बन गई. सीपीएम को राजनैतिक तौर पर नुकसान हुआ है. इसके अलावा  फरवरी में त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. सीपीएम की 1993 से सरकार है और विरोध में कांग्रेस है.

जाहिर है कि भी कांग्रेस के साथ गठबंधन का ऐलान किया जाता तो इसका नुकसान सीपीएम को त्रिपुरा में उठाना पड़ सकता है. इसके अलावा केरल में सीपीएम और कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन एक दूसरे के सामने है. सीपीएम में प्रकाश करात गुट इस बार हावी दिखाई दे रहा था जिसकी वजह से सीताराम येचुरी का प्रस्ताव पास नहीं हो पाया है. ऐसा लग रहा है कि प्रकाश करात अभी 2008 की बात भूल नहीं पाए हैं.

यूपीए के साथी नहीं हैं साथ 

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़े. लेकिन फायदा बीजेपी को हुआ. बीजेपी ने ऐतिहासिक 325 सीटों पर कामयाबी हासिल की. जिसका बहाना बना कर कांग्रेस से सपा ने गठंबधन न करने का फैसला किया है. हालांकि दोनों दल निकाय चुनाव में अलग होकर चुनाव लड़े लेकिन न ही सपा को न ही कांग्रेस को शहरो में कामयाबी मिली. बीएसपी फिर से ताकतवर बनकर उभरी और दो नगर निगमों में कामयाबी मिली, ये दोनो दल 2004 से लेकर 2014 तक यूपीए को बाहर से समर्थन देते रहे.

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2008 के विश्वास मत के बाद मुलायम सिंह को उम्मीद थी कि सरकार में शामिल होंगें लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. सोनिया गांधी नें मुलायम सिंह को सरकार से दूर ही रखा. लेकिन समाजवादी पार्टी मजबूरी में सरकार के साथ रही. यूपीए में शामिल रहे राम विलास पासवान इस वक्त एनडीए के साथ हैं. एनसीपी और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूट चुका है. ममता बनर्जी  चुनाव के पूर्व कांग्रेस के साथ जाएगी. इसकी संभावना कम है. बंगाल की प्रदेश कांग्रेस ममता के साथ गठबंधन के खिलाफ है.

a raja

नॉर्थ ईस्ट में कमोवेश यही हाल है. ज्यादातर क्षेत्रीय दल या तो बीजेपी के साथ हैं या फिर कांग्रेस के साथ नहीं हैं. जो कभी यूपीए के साथ थे अब अपनी अलग रास्ता अख्तियार कर रहे हैं. तमिलनाडु की राजनीति में पीएमके भी अब कांग्रेस के साथ नहीं है. पीएमके के नेता अबुमनि रॉमदास यूपीए -1 में मंत्री भी रह चुके है. वहीं डीएमके बारें में कांग्रेस को लोग कुछ भी कहने से परहेज़ कर रहे हैं.

डीएमके को लेकर संशय

तमिलनाडु में रंजनीकांत के राजनीति में पर्दापण से हलचल ज़रूर है. लेकिन कितना असर होगा ये अभी कहना मुश्किल है. वहीं एआईएडीएमके अंदरूनी तौर बीजेपी के साथ है. लेकिन बड़ा सवाल डीएमके का है. टू जी केस में बरी होने के बाद डीएमके कांग्रेस के साथ रहेगी. इस सवाल का उत्तर खुद कांग्रेस ढूंढ रही है. हालांकि राहुल गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नें कनिमोड़ी को फोन करके हालचाल लिया था.

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लेकिन पूर्व संचार मंत्री ए राजा जिस तरह मनमोहन सिंह पर हमला कर रहे हैं उससे आसार कुछ और लग रहे हैं. डीएमके के साथ प्रधानमंत्री के रिश्ते भी बेहतर हुए है. चेन्नई दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने करूणानिधि से मुलाकात की थी. जिसके कई मायने निकाले जा रहे हैं. डीएमके एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली सरकार में शामिल थी.

Naveen Patnaik

गैर एनडीए दल कहां हैं

ओडीशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक एनडीए के साथ नहीं हैं. लेकिन कांग्रेस के साथ भी नहीं जा सकते हैं. नवीन पटनाय़क का कांग्रेस विरोध जग जाहिर है. वहीं तेलांगना में टीआरएस के सामने कांग्रेस मुख्य विरोधी दल है. आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस भी एनडीए में नहीं है. लेकिन कांग्रेस के साथ जाने में गुरेज है. सत्ताधारी टीडीपी एनडीए के साथ है. कर्नाटक में जेडीएस पर कांग्रेस ज्यादा भरोसा नहीं कर सकती क्योंकिं एच डी कुमारास्वामी बीजेपी के समर्थन से कर्नाटक में सरकार बना चुके है.

राहुल गांधी को करनी होगी पहल

कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी नें 2004 के आम चुनाव से पहले गठबंधन की पहल की थी. सोनिया गांधी पैदल ही राम विलास पासवान के घर बिना बताए पहुंच गई थी. जिसके बाद यूपीए बनने का आगाज़ हुआ था. राहुल गांधी को भी इस तरह की पहल करनी पड़ेगी. खासकर ऐसे दलों को साथ लाना होगा जो कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो. कांग्रेस को समझना होगा कि किस दल को साथ गठबंधन करना है. किस दल का वोट ट्रांसफर हो सकता है. किसका नहीं हो सकता है.

यूपी में सपा के साथ जाने पर कांग्रेस को नुकसान हुआ. राहुल गांधी की गोरखपुर से गाजियाबाद तक की यात्रा का फायदा कांग्रेस को नहीं मिला. यूपीए के पुराने सहयोगिंयों को साथ लाना राहुल गांधी के लिए कम चुनौती नहीं है. खासकर शरद पवार, करूणानिधि प्रकाश करात जैसे लोगों को मनाना काफी मुश्किल काम है. हालांकि कांग्रेस के पास पुरानी टीम है. जिसकी मदद राहुल गांधी ले सकते है. लेकिन मिलने जुलने की शुरूआत राहुल गांधी को ही करनी होगी.

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