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भारत के लिए बुरा दौर है नरेंद्र मोदी का शासनकाल, हिंदुत्व पर भारी 'मोदीत्व': शशि थरूर

शशि थरूर की नई किताब, 'पैराडॉक्टिसकल प्राइम मिनिस्टर' के जरिए हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहस्यमयी किरदार के कुछ अनजान पहलुओं की झलक मिलती है

Updated On: Nov 18, 2018 11:57 AM IST

Rashme Sehgal

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भारत के लिए बुरा दौर है नरेंद्र मोदी का शासनकाल, हिंदुत्व पर भारी 'मोदीत्व': शशि थरूर

डॉक्टर शशि थरूर न केवल शानदार बोलने वाले सांसद, बल्कि विद्वान लेखक के तौर पर भी जाने जाते हैं. उन्होंने बढ़िया रिसर्च के बाद गहरी समझ रखने वाली किताबें लिखी हैं. उनकी ताजा किताब, 'पैराडॉक्टिसकल प्राइम मिनिस्टर' के जरिए हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहस्यमयी किरदार के कुछ अनजान पहलुओं की झलक मिलती है. किताब के जरिए हमें यह भी समझ आता है कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का राज क्या है.

सवाल: आप ने अपनी किताब का नाम 'पैराडॉक्टिसकल प्राइम मिनिस्टर' रखा है. आखिर ये नाम चुनने की क्या वजह है? क्या यह ऑक्सर वाइल्ड की कालजयी रचना 'ए पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे' से प्रेरित है? (हां, ये तो है कि वाइल्ड की किताब का हीरो ज्यादा युवा था). मजाक एक तरफ, पर आप को मोदी के व्यक्तित्व में कौन से अहम विरोधाभास देखने को मिले?

शशि थरूर: 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, तो उस वक्त वो तरक्कीकपसंद, सबको साथ लेकर चलने वाली और हेल-मेल वाली बातें, जैसे कि-सबका साथ, सबका विकास की बातें करते थे. उन्होंने वादा किया कि वो सभी भारतीयों के प्रधानमंत्री होंगे. इससे एक उम्मीद जगी कि शायद हम नरेंद्र मोदी का नया अवतार देखेंगे. नरेंद्र मोदी 2.0. वो ऐसे शख्स होंगे जो 2002 के गुजरात दंगों में अपने विवादित रोल से अलग होंगे.

ऐसा लगा कि शायद वो हिंदुत्व ब्रांड की राजनीति से किनारा करेंगे और काम पर जोर देंगे. ऐसी संभावना जताते हुए मैंने कहा था कि ये मानना जल्दबाजी होगी कि वाकई ऐसा होगा. लेकिन, मोदी के पीएम बनने के कुछ हफ्तों के भीतर ही मेरे अंदर निराशा पैदा हो गई. और, छह महीने के भीतर ही मैंने मोदी के विरोधाभास की मुख्य बातें लिख डाली थीं.

वो विरोधाभास यूं था कि वो खुली सोच वाले, तरक्कीपसंद बयान देते थे. लेकिन, वो अपने राजनीतिक समर्थन को जुटाने के लिए भारत के समाज के सबसे कट्टरपंथी लोगों के भरोसे थे.

शुरुआत में मैं मोदी और उन्हें वोट देने वालों को एक मौका देने को तैयार था. मुझे महसूस होता था कि मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान और नतीजे आने के फौरन बाद, अपने बयानों से जो उम्मीदें जताई थीं, अगर वो उन पर खरे उतरते हैं, तो इससे देश का फायदा होता. बदकिस्मती से उनके बयान और वादे खोखले साबित हुए. मेरी किताब में मेरी इस निराशा की ही झलक मिलती है. किताब में वादों के शोर और हकीकत के बीच फासले का जिक्र है.

मैंने अपनी किताब 'पैराडॉक्टिसकल प्राइम मिनिस्टर' में मोदी को उन्हीं पैमानों पर कस कर मापने की कोशिश की है, जो उन्होंने अपने बयानों और वादों से खुद तय किए थे. अब जबकि उनका प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यकाल खत्म होने को है, तो देश कई मोर्चों पर चुनौतियां झेल रहा है-जनता डरी हुई है.अर्थव्यवस्था उनके बचकाने और जिद भरे फैसलों से जख्मी है, रोजगार की भारी कमी है, किसानों की खुदकुशी लगातार बढ़ती जा रही है, हमारी सीमाएं असुरक्षित हैं, कश्मीर में हालात अस्थिर हैं.

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मोदी तो अच्छी नीयत वाली योजनाएं जैसे स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को भी ठीक से लागू करने में नाकाम रहे हैं. कुल मिलाकर, पीएम मोदी का कार्यकाल भारत के लिए बहुत बुरा रहा है. और इसकी जड़ में मोदी के किरदार का विरोधाभास है-वो अपनी संकीर्ण सोच, घटिया और सांप्रदायिक सियासी बुनियाद से ऊपर नहीं उठ सके हैं. वो एक शानदार राजनेता के तौर पर खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं.

जिस तरह के अच्छे प्रशासन की भारत जैसे देश को जरूरत है, मोदी वो देने में नाकाम रहे हैं. जिन्हें उम्मीद थी कि मोदी वो वादे पूरे करेंगे, जो उन्होंने किए हैं, उनकी उम्मीदें टूटी हैं. मुझे नहीं लगता है कि मेरी किताब के टाइटिल की ऑस्कर वाइल्ड की, 'द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे' से तुलना सही होगी. वो तो एक ऐसे शख्स की कहानी थी जो युवा बना रहता है, मगर, सीढ़ियों की दीवार पर लगी उसकी तस्वीर बूढ़ी होती जाती है.

वो तस्वीर उसके पतन की कहानी कहती है. अफसोस की बात है कि मोदी की कड़वाहट और धोखेबाजी अब किसी से छुपी नहीं है. वो सबकी नजर में है. मेरी किताब में आप को यही बात नजर आएगी.

सवाल: आपने मोदी की निजी जिंदगी का बड़ा ही संतुलित तरीके से बखान किया है. इसमें उनके निजी दर्जी बिपिन चौहान से मिली वो जानकारी भी शामिल है कि मोदी तीन बातों से कभी समझौता नहीं करते-अपनी आवाज, अपनी आंखों और अपने कपड़ों से. और ये बात खुद मोदी ने अपने दर्जी से बताई थी.

शशि थरूर: ऐसी ही और भी बातें आप को मेरी किताब में मिलेंगी. इनमें मोदी के करीबी पारिवारिक लोगों और संघ के शुरुआती दिनों के दोस्तों की बताई बातें हैं. मैंने अपनी किताब में पीएम मोदी की निजी बातें और किस्से जिन वजहों से शामिल किए हैं, उनमें से एक ये भी है कि मोदी अभी भी बहुत से लोगों की नजर में रहस्य हैं. खास तौर से उनकी निजी जिंदगी से जुड़ी बातें. मैंने अपनी किताब में ऐसी कुछ बातों का रहस्योद्घाटन या यूं कहें कि जिक्र किया है, जो उनके रहस्यमयी किरदार में नए रंग भरते हैं.

हालांकि मेरी कोशिश पूरी तरह से निरपेक्ष रहने की रही है. समाज के बहुत निचले तबके से सत्ता के शिखर पर पहुंचने का उनका सफर काबिले-तारीफ है. मैं अच्छे रहन-सहन पर उनके जोर का भी कायल हूं. साथ ही मेरी नजर में उनका अपनी पूरी तनख्वाह दान करने का काम भी तारीफ के काबिल है. मैंने इस बात की भी तारीफ की है कि उनमें जबरदस्त ऊर्जा है. वो लगातार पूरी दुनिया का चक्कर लगाते रहते हैं. लेकिन, इसी के साथ मैंने उनकी इन निजी खूबियों पर ये सवाल भी उठाया है कि इससे आखिर देश को क्या फायदा हुआ?

मैंने लगातार ये कोशिश की है कि बातों को तार्किक तरीके से रखा जाए, सबूतों के साथ पेश किया जाए, भले ही वो निंदा ही क्यों न हो. क्योंकि मुझे लगता है कि विपक्ष का सांसद होने के चलते लोगों की सोच ये होगी कि मैं केवल मोदी की बुराई ही करूंगा. लेकिन, इस किताब में मोदी की आलोचना करते हुए, एक लेखक और विश्लेषक के तौर पर खुद मेरी साख भी दांव पर थी. मेरी किताब एक कोशिश है कि बात को तार्किक और संतुलित तरीके से रखा जाए. मैंने मोदी की आलोचना के लिए उन्हीं पैमानों पर उन्हें कसा है, जो उन्होंने खुद तय किए. जैसे कि चुनाव के दौरान मोदी ने क्या वादे किए, उनमें से कौन से वादे पूरे किए और कौन से नहीं. मैंने सबूतों, तथ्यों और आंकड़ों का विस्तार से विश्लेषण किया है. किस्से कहानियों को दूसरे सबूतों से मेल कराया है.

सवाल: आपकी किताब ने ये बात भी जोर देकर बताई है कि मोदी कितनी ज्यादा मेहनत कर सकते हैं. ये ऐसी खूबी है, जो मोदी को अपने पिता से विरासत में मिली. हालांकि आपने समाजशास्त्री प्रोफेसर आशीष नंदी के हवाले से भी मोदी का किरदार गढ़ने की कोशिश की है.

शशि थरूर: प्रोफेसर नंदी ने मोदी का पीएम बनने से पहले लंबा इंटरव्यू किया था. प्रोफेसर नंदी ने कहा था कि मोदी के व्यक्तित्व में एक कट्टरता है. जज्बातों की भारी कमी है. उनके अंदर कई जुनूनी किरदार वाली गड़बड़ियां भी हैं. यही तो बुनियादी विरोधाभास है! एक तरफ तो मोदी के विरोधी भी मानते हैं कि वो दूसरे देशवासियों के मुकाबले जुनून की हद तक काम करते हैं. लेकिन, दूसरी तरफ वो निजी तौर पर रईसाना शौक रखते हैं. जैसे मो ब्लां की पेन, बुल्गारी के डिजाइनर चश्मे, मोवाडो की लग्जरी घड़ियां और महंगे जैकेट.

मैं साफ कर दूं कि इनमें से कोई भी शौक 'पाप' नहीं है. लेकिन, उनकी जो और ख़ूबियां हैं, जैसे किसी से जज्बाती जुड़ाव न होना,असहिष्णुता का गुण, आत्ममुग्धता, आक्रामक मर्दाना सोच और सब कुछ काबू में रखने वाला बर्ताव, वगैरह. उनके ये गुण ही उन्हें तानाशाह बनाते हैं. और ये मेरा कहना नहीं है. उनके जो गुण हैं, उन्हें मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और मनोविश्लेषकों ने बरसों की रिसर्च और तजुर्बे के बाद किसी तानाशाह के लक्षण बताए हैं. ये वही खूबियां हैं, जिनके बारे में प्रोफेसर नंदी कहते हैं कि वो एक अनजान डर के शिकार तानाशाह की खूबियों वाले शख्स हैं. मैंने अपनी किताब में ये बातें पाठकों के सामने रखी हैं. अब वो इन बातों से जो भी निष्कर्ष निकालना चाहें, निकालने को स्वतंत्र हैं.

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सवाल: आपकी किताब में जिक्र है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए प्रचार के दौरान मोदी ने किस तरह से खुद को सबको साथ लेकर चलने वाले नेता के तौर पर प्रचारित किया. मगर जब वो सत्ता में आए, तो वो समर्थन के लिए सांप्रदायिक दक्षिणपंथियों पर निर्भर हो गए. लेकिन, ये बात तो हम लालकृष्ण आडवाणी के बारे में भी कह सकते हैं. 1990 में आडवाणी की रथयात्रा के दौरान हमने कट्टरपंथी और उग्रवादी सांप्रदायिक राजनीति का शोर बढ़ते देखा था. वो राजनीति आज के सियासी माहौल पर भी हावी है.

शशि थरूर: मैं उन नेताओं, खास तौर से श्री आडवाणी को ऐसा माहौल बनाने के लिए दोष देता हूं, जिसका नतीजा विध्वंस के तौर पर सामने आया. लेकिन, वो नेता ये दावा करते हैं कि ढांचे का ढहाया जाना आंदोलन का गैरइरादतन नतीजा था. हमें पता है कि आडवाणी और वाजपेयी दोनों ने सार्वजनिक रूप से उन घटनाओं पर अफसोस जताया था जिनके चलते बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाए जाने की घटना हुई.

आडवाणी ने कहा था कि वो सम्मानजनक तरीके से मस्जिद को वहां से हटाकर दूसरी जगह ले जाने के पक्ष में थे. वहीं वाजपेयी ने भी राम मंदिर बनाने के लिए सुलह के तमाम फॉर्मूलों का जिक्र किया था. वो तो ये भी कहते थे कि मंदिर और मस्जिद के बीच एक साझा दीवार हो सकती है. हमें नहीं पता कि वाजपेयी के दिल में क्या था? वो अब अपनी बात बताने के लिए हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन दोनों ही नेताओं ने कभी भी ढांचा ढहाने की बात नहीं की. जब ऐसी घटना हुई तो दोनों ने इसकी निंदा भी की.

मैंने खुलकर कहा था कि मैं जिन ज्यादातर अच्छे हिंदुओं को जानता हूं, वो वहां राम मंदिर बनाना चाहते हैं, जहां उनके मुताबिक भगवान राम जन्मे थे. लेकिन ज्यादातर अच्छे हिंदू इस हक में नहीं हैं कि हिंसा और बर्बरता से, किसी और के पूजा स्थल को ढहाकर श्रीराम का मंदिर बने. कमोबेश यही बात अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी भी कहते थे.

सवाल: यह तो हकीकत है कि मोदी संघ की उपज हैं और अमित शाह भी. लेकिन आप की किताब तो ये कहती है कि अब हिंदुत्व की जगह मोदीत्व ने ले ली है. क्या मोदीत्व के प्रति उनका लगाव दिखावा है या पिर वो उनके किरदार और सिद्धांतों का हिस्सा है?

शशि थरूर: मोदी ने अपना सारा जीवन संघ में बिताया है. वो संघ की विचारधारा में ही पले-बढ़े और पोसे गए हैं. इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि वो हिंदुत्व की विचारधारा और उसकी सोच नहीं रखते. वो उसी नजर से दुनिया देखते हैं. मगर, मोदी हिंदुत्व से भी आगे निकल गए हैं-उनका अपना व्यक्तित्व इतना विशाल हो गया है कि आज मोदी की पूजा तक होने लगी है. उनकी इमेज चमकाने के लिए बाल नरेंद्र की कॉमिक्स किताबें और होलोग्राम बनाए गए हैं. इसी का नतीजा है कि आज मोदीत्व, हिंदुत्व पर भारी पड़ता दिख रहा है.

सवाल: आपने आरएसएस के मोदी से रिश्ते की व्याख्या इस तरह से की है कि मोदी शिवलिंग पर बैठे हुए एक बिच्छू हैं, जिसे संघ न तो हाथ से छू सकता है और न ही चप्पल से मारकर भगा सकता है. लेकिन क्या ये तुलना कुछ ज्यादा ही नहीं है, क्योंकि जब से मोदी सत्ता में आए हैं, तब से संघ हर तरह से अपनी मनमानी करने में कामयाब हो रहा है. इस बारे में आप के क्या विचार हैं?

शशि थरूर: मैं यहां दोबारा साफ कर दूं कि ये बिच्छू और शिवलिंग वाली तुलना मेरी नहीं थी. जब मैंने इसका जिक्र किया था, तब भी साफ तौर पर ये कहा था कि मै संघ के एक अनाम शख्स के हवाले से ये बात कह रहा हूं. संघ के उस नेता ने ये बात कारवां पत्रिका के विनोद के जोस से कही थी और ये बात 2012 में कारवां में प्रकाशित हुई थी. इस तुलना से साफ है कि संघ, मोदी की कुछ बातों से खुश नहीं है. संघ व्यक्ति पूजा के खिलाफ है, लेकिन मोदी का व्यक्तित्व ऐसा गढ़ा जा रहा है, मानो वो सबसे परे हों.

आरएसएस की मोदी से खीझ की एक वजह मोदी के सिद्धांत यानी मोदीत्व और संघ परिवार के बुनियादी सिद्धांतों का टकराव भी है. मिसाल के तौर पर, मोदीत्व में आरएसएस से जुड़े संगठनों जैसे स्वदेशी जागरण मंच की आर्थिक सोच को मानने का धैर्य नहीं है. मोदी चाहते हैं कि भारत बाकी दुनिया से जुड़े. विदेशी निवेश हासिल करे और दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़ने का फायदा उठाए. मोदीत्व की ये सोच उन उद्योगपतियों वाली है, जो ग्लोबलाइज़ेशन के पक्षधर हैं. मोदीत्व के तहत पुराने गौरव का भी जिक्र होता है. मगर, वो भविष्य के हिसाब से अपनी सोच में बदलाव भी लाते हैं. वो हिंदू मंदिरों के साथ नई से नई तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं. प्राचीन गौरव को आधुनिकता से जोड़ते हैं. ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जो भविष्य के भारत के निर्माण के मिशन में सहायक हो.

मैंने एक जगह कहा है कि मोदीत्व एक ऐसे नेता कि छवि गढ़ना है, जिसके एक हाथ में तो त्रिशूल हो, मगर दूसरे हाथ से वो माउस घुमा रहा हो. संघ ऐसी बातों को पसंद नहीं करता. आरएसएस मोदी के जमीनी नेता की छवि छोड़कर अपनी व्यक्ति पूजा कराने में जुट जाने को भी नापसंद करता है. संघ ऐसी सोच को बढ़ावा नहीं देता. मगर, वो न तो मोदी को हटा सकते हैं, न ही मोदी पर हमला बोल सकते हैं. अगर वो ऐसा करते हैं, तो हिंदुत्व का उनका बुनियादी प्रोजेक्ट खतरे में पड़ जाएगा.

सवाल: आप की नजर में आरएसएस, मोदी और अमित शाह की जोड़ी को कैसे देखता है?

शशि थरूर: इस सवाल को तो आप को आरएसएस से पूछना होगा! ये तो साफ है कि वो सब मिलकर काम करते हैं. ये चौंकाने वाली बात है कि बीजेपी के कैबिनेट मिनिस्टर नियमित रूप से संघ मुख्यालय यानी नागपुर जाकर स्कूली बच्चों की तरह हेडमास्टर को अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाते हैं. मुझे लगता है कि इस बात से आरएसएस और मोदी-शाह की जोड़ी के रिश्तों की झलक मिलती है. मोदी और अमित शाह को पता है कि विचारधारा और संगठन की ताकत के लिए वो संघ के ही भरोसे हैं. बीजेपी काडर असल में संघ का कार्यकर्ता ही हैं. लेकिन, बिच्छू वाली मिसाल से ये जाहिर है कि आरएसएस में कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस बात से नाखुश हैं कि वो मोदी-शाह की जोड़ी को पूरी तरह से काबू नहीं कर पा रहे हैं.

सवाल: आप यह कहते हैं कि मोदी आरएसएस की विचारधारा में इस कदर रचे-बसे हैं कि उन्हें अपने मंत्रियों को नियमित रूप से संघ मुख्यालय भेज कर अपने काम का हिसाब देने में भी हिचक नहीं है.

शशि थरूर: मुझे लगता है कि ये मोदी और संघ के बीच के पेचीदा रिश्ते की झलक पेश करता है. एक तरफ तो मोदी ने निजी महत्वाकांक्षा पर लगाम को पूरी तरह से हटा दिया है. उनका विशाल इगो संघ के लिए चुनौती बन गया है. लेकिन, दूसरी तरफ मोदी अपनी कैबिनेट के मंत्रियों को नियमित रूप से नागपुर भेजते हैं, जहां पर उनके मंत्री अपने काम का हिसाब वरिष्ठ स्वयंसेवकों को देते हैं. इस तरह मोदी खुलकर संघ के प्रति अपनी जवाबदेही और जुड़ाव को भी दिखाते हैं.

सवाल: आपकी किताब में इस बात का जिक्र है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ हफ्तों के भीतर ही आप उनसे निराश हो चले थे. आपने अपनी किताब में पुणे में एक मुस्लिम सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या का जिक्र करते हुए लिखा था किस तरह ये उन सिलसिलेवार झटकों की पहली कड़ी थी, जो हमारे समाज ने मोदी के सत्ता में आने के बाद झेले हैं. हम इस बात के गवाह हैं कि किस तरह गोरक्षकों ने उत्पात मचा रखा है. आखिर क्या वजह है कि विपक्ष सरकार को उसकी तमाम नाकामियों के लिए घेरने में नाकाम रहा है.

शशि थरूर: मुझे नहीं लगता कि ये पिछले चार सालों में विपक्ष के काम-काज का सही हिसाब-किताब है. बल्क, मुझे तो लगता है कि हमने देश की अंतरात्मा को जगाने का काम किया है (संसद के भीतर भी और दूसरी जगहों पर भी). फिर चाहे मौजूदा सरकार की गलतियों को उजागर करना हो. या इस सरकार से देश को खतरे की बाते हों. हमने जनता को बताया है कि किस तरह इस सरकार ने फसादी सांप्रदायिक तत्वों को खुली छूट दे रखी है. रामजादे-हरामजादे विवाद हो, मॉब लिंचिंग हो, नोटबंदी हो, जीएसटी को लागू करने का घटिया तरीका हो, व्यापम और रफाल घोटाले हों. विपक्ष ने तमाम मुद्दों पर मौजूदा सरकार की नाकामियों की आलोचना की है. हमने विदेश नीति, अर्थव्यवस्था के मोर्चों पर नाकामी से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों को भी उठाया है. हमें लगता है कि हमने आने वाले चुनाव में इस सरकार को दोबारा मौका देने के खतरों के प्रति जनता को काफी हद तक आगाह किया है.

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सवाल: हकीकत ये है कि विपक्ष, आरएसस-बीजेपी की चुनावी मशीनरी का मुकाबला करने में नाकाम रहा है. आखिर इसकी क्या वजह है?

शशि थरूर: मुझे लगता है कि विधानसभा चुनाव में विपक्ष का प्रदर्शन आपको अलग ही कहानी सुनाएगा. हमने कर्नाटक में बीजेपी-आरएसएस मशीनरी की हार होते देखी है. गुजरात में भी हालांकि हम पूरी तरह तो कामयाब नहीं रहे, पर हमने सत्ताधारी पार्टी को कड़ी टक्कर दी. साफ है कि मौजूदा निजाम के सामने भरोसे का संकट है. मुझे भरोसा है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में विपक्ष सत्ता में वापसी करेगा. छत्तीसगढ़ में भी हम सत्ताधारी दल को तगड़ी टक्कर दे रहे हैं. ये सब इसीलिए मुमकिन हुआ है क्योंकि हम जनता का भरोसा फिर से जीतने में कामयाब रहे हैं. हम मौजूदा सरकार की तानाशाही और ध्रुवीकरण की राजनीति के बरक्स लोगों को भरोसेमंद विकल्प देने में कामयाब रहे हैं.

सवाल: आपने मोदी की आर्थिक नीतियों को खास तवज्जो दी है. अपनी किताब में आपने बताया है कि पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू करने में लापरवाही से तबाही आई. आपने अपनी किताब में मोदी की घरेलू और विदेश नीति की भी विस्तार से समीक्षा की है. आपने लिखा है कि भरपूर विदेशी दौरों और नेताओं को गले लगाने की मोदी की नीति के बावजूद भारत के अपने सभी पड़ोसी देशों से रिश्ते खराब हो गए हैं. आखिर इसकी क्या वजह है?

शशि थरूर: इस किताब का मकसद मोदी सरकार के चार सालों पर विस्तार से चर्चा और जो भी घटनाएं हुईं उन पर विमर्श रहा है. यही वजह है कि तमाम मुद्दों पर व्यापक रूप से तर्कपूर्ण बातें कहने के लिए मोदी सरकार के हर पहलू की चर्चा जरूरी थी. हम खुद को केवल मौजूदा निजाम से विचारधारा के मतभेदों के दायरे में नहीं बांध सकते थे. विदेश नीति के मसले पर, मैं मानता हूं कि मोदी ने भारत की विदेश नीति में नई जान फूंकी है. उन्होंने तमाम देशों के लगातार दौरे किए हैं.

मोदी ने अपने चार साल के कार्यकाल में करीब एक साल के बराबर वक्त विदेश में गुजारा है. कुछ खास नीतियों को लेकर मैंने उनकी तारीफ भी की है. मेरा मानना है कि इंटरनेशनल योग दिवस का आयोजन भारत की सॉफ्ट पॉवर का बेहतरीन और चतुराई भरा इस्तेमाल था. लेकिन, मोदी के तमाम विदेश दौरों का फायदा क्या हुआ? मोदी ने जितने विदेशी दौरे किए, वो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिहाज से ऐतिहासिक है. अच्छा होता कि उनके विदेशी दौरों का देश को भी फायदा होता. लेकिन अफसोस की बात है कि ये नहीं हो सका. पाकिस्तान से हमारे रिश्ते बुरे हाल में हैं.

चीन हमें धमका रहा है. अमेरिका से रिश्ते भी बिगड़ गए हैं. नेपाल हम पर भरोसा नहीं करता और चीन के पाले में खिसक रहा है. मालदीव ने तो भारतीयों को वीजा जारी करने से ही इनकार कर दिया. ऐसी कितनी ही मिसालें हैं. ऐसा क्यों हुआ?

कुल मिलाकर कहें तो (मेरी किताब में इसका विस्तार से जिक्र है) पिछले चार सालों में, भारत के पास ऐसा प्रधानमंत्री रहा, जो ऊर्जावान सेल्समैन की तरह पूरी दुनिया में घूमकर अपनी भाषण कला और शानदार मार्केटिंग से दुनिया को लुभाने में जुटा रहा. लेकिन, जो पैकेज वो बेच रहे थे, वो तो खाली था. विदेश नीति को एक सीरियल के एपिसोड की तरह चलाया गया. इसमें नियमितता की भारी कमी थी.

यूं लग रहा था कि एक भाषण और तस्वीरें खिंचवाने के बाद दूसरी जगह पहुंचने की होड़ सी लगी थी. किसी भी दौरे के बाद उसकी समीक्षा की कोशिश नहीं दिखी. हम में से बहुत से लोगों को ये डर था कि मोदी के तमाम विदेश दौरे 'फील गुड' कराने के लिए हैं. ये सरकार की दूसरी परेशानियों पर पर्दा डालने की कोशिश थी. देश के पास एक ठोस विदेश नीति का अभाव साफ तौर पर दिखता है.

सवाल: मेरे लिए सबसे बड़ा विरोधाभास तो ये है कि अभी भी भारतीय वोटर का भरोसा मोदी पर बना हुआ है. आप ने इशारों में ये तो बताया है कि हमारा देश संसदीय लोकतंत्र से चलता है. ऐसे में राहुल गांधी को मोदी के मुक़ाबले उम्मीदवार के तौर पर उतारने का प्रेसिडेंशियल चुनाव सही नहीं है. लेकिन, ये बात जनता को कैसे और कब समझ में आएगी?

शशि थरूर: मुझे भरोसा है कि नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे झटके की मार से परेशान भारतीय वोटरों को, रोजगार की कमी, कमजोर रुपए और रिकॉर्ड रूप से महंगे ईंधन जैसे हालात देख कर ये समझ में आने लगा है कि पिछले चार साल जुमलेबाजी के खेल का मैदान रहे हैं. इस दौरान झूठे वादे कर के 2014 में इस सरकार को मिले मजबूत जनादेश को यूं ही बर्बाद हो जाने दिया गया. अब जिस युवा वोटर ने 2014 में मोदी जी को इस उम्मीद में वोट दिया था कि वो उसे नौकरी दिलाएंगे, वो अब भी बेरोजगार है, तो फिर से मोदी जी को वोट क्यों देगा?

जैसा कि मैंने बताया कि हालिया उप-चुनावों और राज्य के चुनावों में विपक्ष के प्रदर्शन ने दिखाया है कि मौजूदा निजाम के खिलाफ जनता के बीच माहौल बन रहा है. ये बात हाल ही में हुए लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे से भी सही साबित हुई है. इस सर्वे ने भविष्यवाणी की है कि 2019 के आम चुनावों में बीजेपी को 2014 के मुक़ाबले 100 सीटों का नुकसान होगा. ये बात देश के जनमानस को समझ में आने लगी है. इसकी बड़ी वजह संयुक्त विपक्ष की पुरजोर कोशिश रही है. विपक्ष लगातार इस सरकार को उसकी नाकामियों के लिए जवाबदेह बनाने का काम कर रहा है.

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