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अनुच्छेद 35A: जानें क्या है इसकी खासियत?

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने धारा 370 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ के खिलाफ आगाह किया है

FP Staff Updated On: Aug 10, 2017 08:51 PM IST

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अनुच्छेद 35A: जानें क्या है इसकी खासियत?

कश्मीर की आजादी, भारतीय संविधान और देशभक्ति से जुड़ी हर बहस में आजकल अनुच्छेद 35-ए (Article 35-ए) को लेकर खासी चर्चा हो रही है. इस अनुच्छेद को लेकर जम्मू कश्मीर की सभी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होती दिख रही हैं. सभी दलों ने इसे एक सुर में बनाए रखने की बात कही है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला तो यह तक कह चुके हैं कि अगर 35-ए हटाया जाता है तो राज्य में बड़ा विद्रोह होगा. वहीं, सीएम महबूबा मुफ्ती ने पिछले महीने ही बयान दिया था कि अगर राज्य के कानूनों से छेड़छाड़ हुई तो कश्मीर में तिरंगा थामने वाला कोई नहीं होगा.

इस मुद्दे पर मुफ्ती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी करने वाली हैं. इस बीच खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिली है कि घाटी में अलगाववादी सगंठन और सीमा पार की पाकिस्तान खुफिया एजेंसी इस आर्टिकल के बहाने एक बड़ी साजिश रचने की तैयारी में हैं.

सूत्रों का कहना है कि टेरर फडिंग केस में पकड़े गए अलगाववादियों के खेमे के लिए यह एक नया मुद्दा हो सकता है. पाकिस्तान चाहता है कि इस मुद्दे पर कश्मीर में बड़ी हिंसा फैलाई जाए.

आखिर क्या है अनुच्छेद 35 ए में

साल 1954 में 14 मई को राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया था. इस आदेश के जरिए संविधान में एक नया अनुच्छेद 35-ए जोड़ दिया गया. संविधान की धारा 370 के तहत यह अधिकार दिया गया है.

35-ए संविधान का वह अनुच्छेद है जो जम्मू कश्मीर विधानसभा को लेकर प्रावधान करता है कि वह राज्य में स्थायी निवासियों को पारभाषित कर सके. वर्ष 1956 में जम्मू कश्मीर का संविधान बना जिसमें स्थायी नागरिकता को परिभाषित किया गया.

जम्मू कश्मीर के संविधान के मुताबिक, स्थायी नागरिक वह व्यक्ति है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 सालों से राज्य में रह रहा हो, और उसने वहां संपत्ति हासिल की हो.

अनुच्छेद 35-ए की वजह से जम्मू कश्मीर में पिछले कई दशकों से रहने वाले बहुत से लोगों को कोई भी अधिकार नहीं मिला है. 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान को छोड़कर जम्मू में बसे हिंदू परिवार आज तक शरणार्थी हैं.

एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में जम्मू में 5 हज़ार 764 परिवार आकर बसे थे. इन परिवारों को आज तक कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं हैं. अनुच्छेद 35-ए की वजह से ये लोग सरकारी नौकरी भी हासिल नहीं कर सकते. और ना ही इन लोगों के बच्चे यहां व्यावसायिक शिक्षा देने वाले सरकारी संस्थानों में दाखिला ले सकते हैं.

जम्मू-कश्मीर का गैर स्थायी नागरिक लोकसभा चुनावों में तो वोट दे सकता है, लेकिन वो राज्य के स्थानीय निकाय यानी पंचायत चुनावों में वोट नहीं दे सकता.

अनुच्छेद 35-ए के मुताबिक अगर जम्मू कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं. साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं.

साल 2014 में एक एनजीओ ने अर्जी दाखिल कर इसको समाप्त करने की मांग की. यह केस अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 3 न्यायाधीशों की बेंच को ट्रांस्फर कर दिया और इस मामले के निपटारे के लिए 6 हफ्ते की समय सीमा तय कर दी.

अब ये माना जा रहा है कि सितबंर के पहले हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट इस विवादित अनुच्छेद पर फैसला सुना सकता है. इस अनुच्छेद को हटाने के लिए एक दलील ये भी दी जा रही है कि इसे संसद के जरिए लागू नहीं करवाया गया था.

(साभार न्यूज़ 18)

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