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इंदुलाल याज्ञिक: जिन्होंने अपनी पूरी जमा पूंजी गुजरात के नाम कर दी

महागुजरात आंदोलन के नेता और गुजरात के निर्माताओं में प्रमुख इंदुलाल याज्ञिक ने अपनी पूरी संपत्ति महागुजरात सेवा ट्रस्ट को दान कर दी थी.

Updated On: Feb 22, 2018 08:30 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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इंदुलाल याज्ञिक: जिन्होंने अपनी पूरी जमा पूंजी गुजरात के नाम कर दी

महागुजरात आंदोलन के नेता और गुजरात के निर्माताओं में प्रमुख इंदुलाल याज्ञिक ने अपनी पूरी संपत्ति महागुजरात सेवा ट्रस्ट को दान कर दी थी. 17 जुलाई 1972 को उनके निधन के बाद सहकरिता बैंक के सेफ डिपॉजिट में मिले वसीयतनामे के अनुसार उनके पास तब बैंक में कुल जमा 17 हजार 614 रुपए थे.

याज्ञिक ने अपनी पुस्तकों की राॅयल्टी, दफ्तर का फर्नीचर तथा समस्त चल और अचल संपत्ति ट्रस्ट को दे देने का फैसला कर लिया था. उनके निधन के बाद वसीयतनामे के अनुसार उनकी सारी संपत्ति ट्रस्ट को चली गई. आज कई कारणों से गुजरात चर्चा में रहता है. पर उसके निर्माता को कम ही लोग याद करते हैं.

उनके निधन के ठीक पहले वाले कुछ महीने उनके लिए कष्टदायी रहे. उन्हें 25 अप्रैल, 1972 को मस्तिष्क रक्तस्त्राव हुआ. कुल 82 दिनों तक वह अस्पताल में मौत से जूझते रहे. अंततः 17 जुलाई को वे मौत से हार गए. कुछ डॉक्टरों को यह आश्चर्य हो रहा था कि मस्तिष्क रक्तस्त्राव वाला मरीज आखिर इतने अधिक दिनों तक जिंदा कैसे रह सका.

शायद उनकी जीवनी शक्ति मजबूत थी. इस आंतरिक शक्ति का उन्होंने अपने पूरे जीवन में परिचय दिया. वे दूसरों के लिए ही जिए.

चौदह साल की अल्पायु में ही उन्होंने मैट्रिक पास कर लिया था. मुंबई के संत जेवियर कालेज से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली. गुजराती दैनिक ‘मुम्बई समाचार’ में सह संपादक नियुक्त हुए. कानून की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक वकालत की. वह नागपुर से प्रकाशित ‘हितवाद’ में भी रहे.

Mahatma Gandhi

गांधी जी जब 1915 में अफ्रीका से लौटे तो ज्ञानिक उनके निकटतम सहयोगी बन गए. उस वक्त याज्ञिक को गुजरात कांग्रेस का सर्वेसर्वा नियुक्त किया गया. उनका ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ से भी संबंध रहा.

याज्ञिक जी 1930-31 में बर्लिन,लंदन और आयरलैंड गए. वहां उन्होंने भारत की आजादी के लिए दिलोजान से काम किया. आयरलैंड में तो उन्होंने अपने जीवन निर्वाह के लिए सिगरेट बेचने तक का काम किया.

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सन 1956 में महागुजरात जनता परिषद की स्थापना हुई थी. इस परिषद का उद्देश्य बॉम्बे प्रांत को विभाजित करके गुजराती भाषी आबादी के लिए अलग प्रदेश बनाना था.

यह आंदोलन अंततः सफल रहा और 1960 में गुजरात बन गया. उसके बाद इंदुलाल याज्ञिक ने नूतन गुजरात जनता परिषद बनाया.

इंदुलाल जी महागुजरात जनता परिषद के उम्मीदवार के रूप में ही 1957 में अहमदाबाद से लोक सभा के सदस्य चुने गए थे. वे 1962 में नूतन गुजरात जनता परिषद के उम्मीदवार के रूप में लोक सभा के लिए चुने गए. वह 1967 और 1971 में भी लोक सभा के सदस्य चुने गये थे.

22 फरवरी 1892 को गुजरात के खेडा जिले के नांदियाड नगर में इंदुलाल याज्ञिक का जन्म हुआ था. उनका निधन 17 जुलाई 1972 को हुआ. उनके निधन के बाद अखबारों ने लिखा कि 50 वर्षों का ‘याज्ञिक युग’ समाप्त हो गया. याज्ञिक उन थोड़े से नेताओं में थे जिनके नाम के साथ ‘युग’ शब्द जुड़ा.

अलग गुजरात का निर्माण कोई आसान काम नहीं था. फिर भी यह काम हुआ तो उन नेताओं के कारण जिनमें याज्ञिक प्रमुख थे.  याद रहे कि अविभाजित  बॉम्बे के कई दिग्गज नेता बॉम्बे प्रांत के गठन के सख्त विरोधी थे.

याज्ञिक के विचारों में निर्भीकता थी. वे स्वतंत्र विचारों के थे. वह कभी किसी नेता के अंध भक्त नहीं बने. न तो महात्मा गांधी के और न ही जवाहर लाल नेहरू के. समय-समय पर उन्होंने शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ भी विरोध का झंडा खड़ा किया.

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www.narendramodi.in से साभार ( इंदुलाल याज्ञिक की तस्वीर)

उनके जीवन में 1958-59 की एक घटना का जिक्र मीडिया में आया था, ‘अलग गुजरात प्रदेश की मांग को लेकर जोरदार आंदोलन चल रहा था. उस आंदोलन के सूत्रधार याज्ञिक थे. केंद्र और बॉम्बे सरकारों ने इस आंदोलन को दबाने की काफी कोशिश की, पर इंदुलाल याज्ञिक ने अपनी लोकप्रियता के बल पर अहमदाबाद में ‘जनता कर्फ्यू’ लगवा दिया.

उसी समय अहमदाबाद में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और बॉम्बे के मुख्य मंत्री मोरार जी देसाई की सभाएं होनी थीं. उन सभाओं में जाने के लिए जनता कर्फ्यू के कारण लोग अपने घरों से नहीं निकले. उनकी सभाओं में सन्नाटा ही रहा. अंततः 1960 में अलग गुजरात की मांग मान ली गई.’

इंदुलाल याज्ञिक 1952 के लोक सभा चुनाव में सफल नहीं हो सके थे, पर 1957 में याज्ञिक ने तब के केंद्रीय श्रममंत्री खंडु भाई देसाई को भारी मतों से पराजित किया. बाद के चुनावों में भी उन्होंने प्रसिद्ध मजदूर नेता एस.आर.बसावड़ा को हराया.

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ज्ञानिक अखिल भारतीय किसान सभा के शीर्ष नेताओं में से भी एक थे. उनके निधन के बाद गुजरात के आम लोगों में विह्वलता उनकी लोकप्रियता का प्रमाण थी. गुजरात के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उनका विशिष्ट स्थान था. कई लोगों का कहना है कि गुजराती जनजीवन में महात्मा गांधी और सरदार पटेल के बाद याज्ञिक जितने अधिक लोकप्रिय थे,उतने दूसरे कोई नेता नहीं. वे इंदु चाचा के नाम से जाने जाते थे.

उनके निधन के बाद जब उनका वसीयतनामा सामने आया तो गुजरात के लोग उनके प्रति कृतज्ञता से कुछ अधिक ही भर उठे. आज के धनलोलुप नेतागण याज्ञिक जैसे नेताओं के जीवन से अब भी कुछ सीखेंगे ?

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