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हिंदू-मुसलमान में अब और फर्क मत कीजिए सरकार!

लोकतंत्र की शर्त है कि उसमें वंचित नागरिकों का ख्याल रखा जाय ना कि समुदायों का

Tufail Ahmad Updated On: Aug 22, 2017 12:45 PM IST

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हिंदू-मुसलमान में अब और फर्क मत कीजिए सरकार!

उत्तर प्रदेश के अपने सफर के दौरान मैं कुछ दिन लखनऊ में रुका, सोचा कि उनकी भी राय ले लूं जो मुस्लिम आबादी का मन-मानस तैयार करते हैं. हैदराबाद और कराची के साथ-साथ लखनऊ उन चंद शहरों में शामिल है जहां शिया मुसलमानों की तादाद अच्छी-खासी है.

मैं इस फैसले पर पहुंचा कि हिंदुस्तानी मुसलमानों के मन में यह ख्याल डेरा जमाए बैठा है कि वे अल्पसंख्यक हैं और यह उनके विकास में बाधक है. लेकिन उन्हीं के बीच में शिया भी हैं, जो तादाद में थोड़े हैं तो भी अपनी जिंदगी में बेहतर कर रहे हैं और उनके मन में खुद को लेकर ना तो अल्पसंख्यक होने का भाव है ना ही उन्हें यह भय है कि ‘अरे हम तो सताये हुए’ हैं.

सुन्नी मुसलमानों में है ये प्रवृत्ति

मेरे मन में यह विचार बना कि हिंदुस्तान में अल्पसंख्यकवाद नाम दरअसल सुन्नी मुसलमानों की चीज है और इस्लाम के शुरुआती वक्त में सत्ता के लिए चले घनघोर मुकाबले का ही एक रूप है जो आज के दिन तक जारी है.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के हालिया चुनावों से एक बार फिर साबित हुआ है कि समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने अपनी तरफ से माइनॉरिटी कार्ड खेला है. चुनावी मकसद से सेक्युलरिज्म के सियासती जुमले उछाले हैं.

दरअसल, चुनाव शुरु होने के बहुत पहले संभल जिले के बहजोई में बीएसपी ने 19 अक्तूबर को एक सियासी रैली की तो उसकी शुरुआत कुरान की आयतों के पाठ से की गई. रैली में बीएसपी के नेता अतार सिंह ने मुस्लिम वोटर को लुभाने के लिए हदीस (हजरत मोहम्मद साहब के कर्म और वचन की पुस्तक) से भी उद्धरण दिए.

अल्पसंख्यक समुदाय के वोट बटोरने के लिए चुनावी महासमर के दौरान मजहबी प्रतीकों का इस्तेमाल सिर्फ बीएसपी करती हो, ऐसी बात नहीं. इससे पहले कांग्रेस के नेता राहुल गांधी लखनऊ के दारुल उलूम नदवातुल उलेमा और दारुल उलूम देवबंद के मदरसे का फेरा लगा चुके थे. ये सारी कवायद भारत में मॉइनॉरिटी पॉलिटिक्स का हिस्सा है.

rahul gandhi

भारत में यों तो कई अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन ‘अल्पसंख्यक’ (माइनॉरिटी) शब्द और इससे जुड़ी राजनीति का खास इस्तेमाल मुसलमानों के लिए किया जाता है. गौर करने वाली बात यह है कि सुन्नी मुसलमानों के विपरीत सिख, पारसी, जैन और शिया अपने को सताया हुआ जाहिर नहीं करते.

अल्पसंख्यक कौन है?

इसे परखने के दो रास्ते हैं. हिंदी का अल्पसंख्यक शब्द अंग्रेजी के माइनॉरिटी का तर्जुमा है और माइनॉरिटी शब्द लैटिन के ‘माइनर’ में ‘इटी’ प्रत्यय जोड़ने से बना है. मतलब किसी एक मुकम्मल चीज के दो हिस्सों में जो छोटा है वह माइनॉरिटी कहलाएगा.

a.मात्रा के आधार पर

मात्रा को आधार मानने वाली इस परिभाषा के मुताबिक कुल आबादी में जो समुदाय शेष समुदाय से तादाद में कम हो वह माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक) कहलाएगा. देखने का एक तरीका तो यह हुआ.

माइनॉरिटी शब्द के चलन ने संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत होने पर जोर पकड़ा क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में किसी समुदाय का संख्या बल सत्ता की कुंजी होता है. लेकिन समाजी सच्चाई की व्याख्या में मात्रा को आधार बनाने वाली यह परिभाषा नाकाफी है. मिसाल के लिए, दक्षिण अफ्रीका में जब रंगभेदी शासन का दौर था तब अश्वेत लोग वहां ज्यादा संख्या में थे लेकिन वहां के गोरे शासक संख्या में बहुत कम (माइनॉरिटी) होने के बावजूद अश्वेत लोगों के साथ भेदभाव करते थे, उनपर अपना डंडा फटकारते थे.

b. संख्या के आधार पर

संख्या को आधार बनाने वाली परिभाषा से यह भी नहीं पता चलता कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में कोई समुदाय प्रभावी है या नहीं. मिसाल के लिए एक स्थिति पर गौर कीजिए:

1952 के चुनावों में 67 फीसद सांसद 50 फीसदी से भी कम वोट हासिल कर विजयी रहे. साल 2004 में केवल 24 फीसद सांसदों को 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल हुए. 2009 में सिर्फ 17 फीसदी सांसदों को 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल हुए, जबकि 2014 में 61 फीसदी सांसद 50 फीसदी से कम वोट हासिल कर विजयी रहे.

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भारतीय लोकतंत्र में हालत यह है कि कोई उम्मीदवार सिर्फ 30 फीसदी वोट हासिल कर चुनाव जीत सकता है. यह बात उम्मीदवारों को पहचान की राजनीति को तूल देने के लिए उकसाती है. नतीजतन, अगर कोई समुदाय किसी निर्वाचन क्षेत्र में 20-30 फीसदी हो तो वह चुनाव के नतीजे तय कर सकता है और इस तरह अपनी सियासी दावेदारी पेश कर सकता है. यही वजह है जो बीएसपी, एसपी तथा कांग्रेस यूपी के चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं.

बंटवारे के वक्त ही देश के नेतृत्व के आगे यह जाहिर हो चुका था कि अल्पसंख्यकवाद की राजनीति कितनी जटिल साबित होती है. इसके बावजूद अगर भारत के लोकतंत्र की यह हालत है तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा.

इन बातों की तरफ माधव गडबोले ने अपनी नई किताब 'सेक्युलरिज्म- इंडिया ऐट क्रॉसरोडस्' में इशारा किया है. 19 जुलाई, 1942 के दिन न्यूयॉर्क टाइम्स में जवाहरलाल नेहरु ने लिखा कि: 'असल समस्या अक्सर मुसलमानों की बताई जाती है. उनकी तादाद 9 करोड़ है सो वे अल्पसंख्यक कहां हैं और यह समझना मुश्किल है कि कोई बहुसंख्यक भी हो तो उनका दमन कैसे कर सकता है.'

24 जनवरी, 1947 के भाषण में गोविंदवल्लभ पंत ने कहा: 'अल्पसंख्यकों के सवाल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया जा सकता. अभी तक इसका इस्तेमाल भारत के विभिन्न तबकों के बीच अविश्वास, दरार और कलह पैदा करने के लिए हुआ है.'

पंत के इस विचार को पढ़ने के बाद यह बात बड़ी उदास करने वाली लगती है कि माइनॉरिटी पॉलिटिक्स अब भी देश में जारी है.

c. गुण के आधार पर

माइनॉरिटी को देखने का दूसरा तरीका है कि मात्रा की जगह गुण को आधार बनाया जाए. इस नजरिए से देखें तो कोई समुदाय तभी अल्पसंख्यक कहलाएगा जब बहुसंख्यक समुदाय या सरकार उसके साथ भेदभाव करे, उसे अलग-थलग रखे और उसे अपना हुक्म मानने पर मजबूर करे.

मिसाल के लिए दलित भारत में सामाजिक रुप से अलग-थलग है. उन्हें गांव के सबसे आखिर के छोर पर रहना होता है, सदियों से यही चलन रहा है. अगड़ी जाति के लोग छुआछूत का बर्ताव कर के उनके साथ भेदभाव करते हैं. तो गुण को आधार बनाने वाली इस परिभाषा के लिहाज से दलित हिंदुस्तान का सबसे पहला अल्पसंख्यक तबका कहलाएगा.

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इस परिभाषा को आधार बनाकर चलें तो महिलाओं को भी अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है. इस बार के यूपी के विधानसभा के चुनाव में एक चीज यह देखने में आई कि मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के चलन के बारे में नरेंद्र मोदी के इजहार-ए-ख्याल को सुनना-समझना चाहती हैं. आखिर तीन तलाक के चलन से चोट उन्हीं पर पड़ती है.

संख्या के जगह गुण को आधार बनाकर अल्पसंख्यक की परिभाषा दी जानी चाहिए. इसकी एक मिसाल यह भी है कि मुगलों की हुकूमत के दौर में मुसलमानों की संख्या कम थी लेकिन मुस्लिम समुदाय का सियासी रुतबा बड़ा था.

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अल्पसंख्यकवाद समाजवाद के लिए बाधा है

अल्पसंख्यक का दर्जा किसी समाज के सामूहिक जीवन में पूरी तरह भागीदार होने में बाधक है. अल्पसंख्यक के दर्जे से यही जाहिर होता है कि कोई समुदाय किसी दूसरे प्रभावशाली समुदाय की तुलना में दबा-कुचला है और जरुरी नहीं कि वह प्रभावशाली समुदाय संख्या के लिहाज से ज्यादा हो.

चीन के आधिपत्य में रहने को मजबूर तिब्बती हर लिहाज से माइनॉरिटी दर्जे के मुस्तहक हैं. कोई समुदाय नस्ल, भाषा, धर्म या जाति के आधार पर अल्पसंख्यक कहला सकता है, बशर्ते उसके साथ इन्हीं बातों को आधार बनाकर उसे अलग-थलग मानकर भेदभाव किया जाता हो. कोई समुदाय अपनी मर्जी से अल्पसंख्यक हो सकता है और मजबूरी में भी.

hindu-muslim

समाजशास्त्री लुईस विर्थ ने माइनॉरिटी की परिभाषा देते हुए लिखा है: 'लोगों का ऐसा समूह जिन्हें गैर-बराबरी और अलग तरह के बरताव के लिए किसी समाज में चिन्हित किया जा सके.' जहां तक भारतीय मुसलमानों का सवाल है, प्रतीत यही होता है कि वे अपने को मुख्यधारा से अलग बताने की जुगत में लगे रहते हैं.

क्या अल्पसंख्यक कहलाए जाना महज स्वार्थ है?

हाल ही में मैंने जयपुर में एक लॉ स्टुडेंट आमना बेगम का इंटरव्यू किया. आमना बेगम की भारतीय मुसलमानों के बर्ताव पर बड़ी मानीखेज टिप्पणी थी कि 'एक समुदाय के रुप में हम या तो अपने को सताया हुआ देखना चाहते हैं या फिर सबपर अपने हुक्म का डंडा फटकारते हुए.'

मुस्लिम अभिजन भी अपने को मॉइनॉरिटी कहना पसंद करता है क्योंकि ऐसा करना सरकार से कुछ रेवड़ियां हासिल करने में उनके लिए मददगार साबित होता है. बीते कुछ दशकों में मुस्लिम अभिजन ने अल्पसंख्यक के लिए फाइनेंशियल कारपोरेशन (वित्त निगम) तथा उर्दू यूनिवर्सिटी कायम करने की मांग उठाई है.

गौर कीजिए, उन्होंने गरीब कारीगर मुसलमानों के उन बच्चों के शिक्षण-प्रशिक्षण लिए जो दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सड़क किनारे काम करते नजर आते हैं, किसी औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र बनाने की मांग नहीं उठाई.

ऐसे में कहा जा सकता है कि अभिजन मुसलमान अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का इस्तेमाल अपने फायदे में करता है, जबकि यही राजनीति आम मुसलमानों के लिए नुकसानदेह साबित होती है. यूपी के चुनाव में इस बात के भी संकेत मिले हैं कि अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के कारण बीजेपी के पक्ष में जवाबी ध्रुवीकरण (रिवर्स पोलराइजेशन) हुआ है.

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अल्पसंख्यक की गुणात्मक परिभाषा के साथ बात-व्यवहार की खासियत भी जुड़ी हुई है. भारतीय समाज में अल्पसंख्यकवाद की घटना को एक खास किस्म की समझ के रुप में देखा जा सकता है जो राजनेता, पत्रकार, समुदायों या फिर संगठन जैसे कि राजनीतिक दल, एनजीओ और सरकारी विभागों के व्यवहार तय करती है. हर कोई इस खास किस्म की समझ का भागीदार जान पड़ता है.

अलग-अलग है मुस्लिम समाज की संरचना

यह समझ मुसलमान को पूरे भारत में एकसार या कह लें हर जगह एक-सी दशा में पड़ा हुआ समाज मानकर देखती है. लेकिन मुस्लिम समाज देश में हर जगह एक सा नहीं है. इसलिए गैर-मुसलमानों का मुसलमानों के साथ या मुसलमानों का अपने साथ इस समझ के आधार पर बर्ताव जायज नहीं ठहरता.

गौर कीजिए कि जम्मू-कश्मीर में मुसलमान या फिर पंजाब में सिख को अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता.

यूपी में भी जहां मुसलमानों की अच्छी-खासी तादाद है, वे एक प्रभावशाली समुदाय की तरह बर्ताव करते हैं ना कि वास्तविक अल्पसंख्यक की तरह जो कि हमेशा दबा-कुचला होता है.

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इस सिलसिले की एक बात यह भी है कि मुसलमानों में जिन्हें नीची जाति का माना जाता है उन्हें गैर-मुस्लिम ही नहीं मुस्लिम भी अल्पसंख्यक नहीं मानते. इसलिए अल्पसंख्यकवाद की राजनीति, चाहे वह किसी राजनीतिक दल की हो या फिर किसा पत्रकार या लेखक की, दलित मुस्लिम और मुस्लिम समाज के दायरे के अन्य पिछड़ा वर्ग के कल्याण की बात को दरकिनार कर चलती है.

यह सब तब भी जारी है जबकि इस विषय पर समाजशास्त्री इम्तियाज अहमद की एक महीन सूझ से भरी किताब आ चुकी है, जिसमें ध्यान दिलाया गया है कि भारतीय मुसलमानों में ठीक-ठीक वर्ण-व्यवस्था जैसा ही जाति-भेद मौजूद है.

मीडिया और राजनीति के लिए मुसलमानों को एकसार समुदाय के चश्मे से देखना माफिक बैठता है. ठीक इसी तरह भारत का सुन्नी मुसलमान भी अपने को उम्मत यानी मुसलमानों की कौमी विश्व-बिरादरी का हिस्सा मानता है.

कहने का मतलब यह कि भारत अब उस मुकाम तक पहुंच गया है, जब यहां का मुसलमान दलित या महिला की तरह एक सचमुच के दबे-कुचले समूह के रुप में नहीं बल्कि एक प्रभावशाली समुदाय की तरह बर्ताव कर पा रहा है.

दक्षिण और उत्तर भारतीय मुसलमानों में बहुत फर्क है

इस तरह देखें तो मुसलमानों में मौजूद अल्पसंख्यक होने की भावना एक खास तरह की राजनीति है, जो उन्हें भवानात्मक मुद्दों से कभी उबरने नहीं देती. बड़े हद तक यह उत्तर भारतीय चीज है.

दक्षिण भारत के मुसलमान अल्पसंख्यवाद की भावना से तकरीबन मुक्त हैं और उन्होंने शिक्षा और आर्थिक मामलों में तरक्की की है. जबकि उत्तर भारत के मुसलमान अब भी भावनात्मक मुद्दों के जाल में उलझे हैं जो सियासी ज्यादा हैं, वास्तविक कम.

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इसके अतिरिक्त गौर करने की बात यह भी है कि ईसाई, सिख तथा पारसी संख्या के लिहाज से अल्पसंख्यक ही हैं लेकिन उनमें अल्पसंख्यवाद की भावना नजर नहीं आती. हां, पारसी अपनी घटती संख्या को लेकर चिंतित जरुर हैं.

दलितों के साथ ऐतिहासिक रुप से बहुत ज्यादा भेदभाव हुआ है. उनके बारे में सामाजिक पूर्वाग्रह बहुत समय से चले आ रहे हैं और उन्हें मुख्यधारा की जिंदगी से जबरन बाहर धकेला गया है. इसे देखते हुए दलितों को स्वाभाविक अल्पसंख्यक माना जा सकता है.

कभी शासक रहे मुसलमान आज अल्पसंख्यक बने रहना चाहते हैं

दुर्भाग्य कहिए कि भारत में मुसलमान अपनी मर्जी से अल्पसंख्यक हैं किसी मजबूरी में नहीं क्योंकि वे भारत में कभी शासक-वर्ग का हिस्सा रहे हैं. एक बड़ी वजह यह भी है कि वे बड़े साहस और दमखम के साथ अपनी दावेदारी पेश करते हैं.

लखनऊ में मुझे सोशल एंथ्रोपॉलॉजिस्ट नदीम हसनैन ने कहा कि 'मुसलमान अल्पसंख्यक की तरह रहना कब सीखेंगे?' उन्होंने अपनी बात में यह भी जोड़ा, 'मुझे लगता है कि हमारी सबसे बड़ी मनोग्रंथि तो यह सोच है कि हमने भारत पर 800 सालों तक राज किया.'

मुसलमानों में इतिहास और संस्कृति का भी गहरा बोध है और यह बोध आजादख्याली के साथ कदम उठाने के लिए जरुरी माना जाता है. दलितों के उलट मुसलमानों के साथ कोई सामाजिक लांछन नहीं जुड़ा जो, उनकी आर्थिक गतिविधियों के आड़े आए.

मुसलमान कैसे उबर सकते हैं अल्पसंख्यवाद से?

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि असली चुनौती मुसलमानों को अल्पसंख्यवाद की भावना से निकालने की है. बेशक इस दिशा में कोई भी उपाय दशकों तक जारी रहे तभी मुसलमानों के मन में ऐसा बदलाव लाया जा सकता है तो भी कुछ छोटे-छोटे कदमों की शुरुआत अभी से की जा सकती है.

इनमें एक तो यह है कि राजनीतिक दलों को अपनी अल्पसंख्यक इकाई बंद कर देनी चाहिए और उन्हें अपने मुस्लिम सदस्यों के साथ भी बाकी सदस्यों की तरह पेश आना चाहिए. ऐसा करने के लिहाज से बीजेपी बौद्धिक धरातल पर सबसे माफिक जान पड़ती है. इसलिए, उसे इस दिशा में एक नजीर कायम करनी चाहिए.

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दूसरे, सुप्रीम कोर्ट में एक मामला अभी चल रहा है. इसमें कहा गया है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन (अल्पसंख्यकों का संस्थान) का दर्जा वापस लिया जाए. दुर्भाग्य की बात है कि यह यूनिवर्सिटी मुसलमानों में अल्पसंख्यक होने की भावना फैलाती है और लोगों में यह संदेश जाता है कि सिर्फ यही वह विश्वविद्यालय है जहां मुसलमान पढ़ सकते हैं.

अगर सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाता है कि अलीगढ़ माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन नहीं है तो इससे मुस्लिम-मन पर कायम फंदा हटेगा और मुसलमान यह सोचना शुरु करेंगे कि उनके लिए देश में और भी हजार संस्थान पढ़ने के लिए मौजूद हैं.

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अलीगढ़ में दर्शनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर तारिक इस्लाम ने मुझे बताया कि सुप्रीम कोर्ट अगर एएमयू के खिलाफ फैसला सुनाता है तो यह यूनिवर्सिटी भारत की मुख्यधारा की बाकी यूनवर्सिटियों की तरह व्यवहार करने लगेगी.

तीसरी बात यह कि भारत सरकार को अपने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का नाम बदल देना चाहिए और मंत्रालय का कार्यक्षेत्र बदलकर उसमें सभी वंचित भारतीयों के कल्याण के एजेंडे को शामिल किया जाना चाहिए. मिसाल के लिए मंत्रालय का नाम ‘वंचित भारतीय कल्याण मंत्रालय’ रखा जा सकता है.

लोकतंत्र की शर्त है कि उसमें वंचित नागरिकों का ख्याल रखा जाय ना कि समुदायों का. सरकार इस मंत्रालय के काम के दायरे में गरीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों को शामिल कर सकती है. इससे मुसलमानों को कोटा देने के नाम पर चल रही राजनीति का भी खात्मा होगा.

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