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मुसलमानों को महज दिलासा नहीं, बेहतरी का ठोस कार्यक्रम चाहिए

अपने लरजते हाथों वाली बूढ़ी कांग्रेस के युवा अध्यक्ष भी यह तय नहीं कर पा रहे कि देश में फैले वैमनस्य के माहौल में उनकी जिताऊ रणनीति क्या हो सकती है

Updated On: Jul 13, 2018 04:04 PM IST

Anant Mittal

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मुसलमानों को महज दिलासा नहीं, बेहतरी का ठोस कार्यक्रम चाहिए
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राहुल गांधी अब फिर से सेक्युलर कार्ड खेलने का दिखावा करके मुसलमानों को बेवकूफ बनाने के बजाए कांग्रेस के दिशाभ्रम को नमूदार कर रहे हैं. इसका सबूत यह है कि इससे पहले वे मंदिरों में अपना हिंदूवादी और फिर जनेऊधारी ब्राह्मणवादी चेहरा जता चुके हैं और उससे भी पहले दलितों के घर राहुल द्वारा खाना खाने को भी कांग्रेस ने बखूबी प्रचारित किया. उसी तरह अब मुस्लिम बुद्धिजीवियों से अपनी कथित बैठक के बाद कांग्रेस के 'सॉफ्ट हिंदुत्व' पर उनके सवालों को जानबूझ कर प्रचारित करवाया जा रहा है.

ताज्जुब यह है कि आजादी की लंबी लंड़ाई, देश के बंटवारे और आधी-अधूरी आजादी पाने, सेक्युलर संविधान बनाने तथा देश पर 60 साल शासन करने के बाद भी बूढ़ी कांग्रेस के युवा अध्यक्ष को मुसलमानों की समस्याएं समझनी पड़ रही हैं. इसे कांग्रेस और राहुल गांधी का नाटक नहीं तो क्या कहा जाए? पूरे सात साल सच्चर कमेटी की रिपोर्ट बगल में दबाए रही कांग्रेस ने मुसलमानों की बहबूदी ( भलाई ) के लिए अपने शासनकाल में कुछ ठोस उपाय क्यों नहीं किए? सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने देश ही नहीं बल्कि दुनिया के सामने भी कांग्रेस के दोहरे चरित्र को बखूबी उजागर किया था.

क्या राहुल गांधी को 14 साल संसद में रहने के बावजूद सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़ने की भी फुर्सत नहीं मिली? क्योंकि हाल में दिवंगत हुए जस्टिस राजिंदर सच्चर ओर उनके साथियों ने देश मे मुसलमानों की हालत को दलितों और अमेरिकी अश्वेतों से भी बदतर बताया था! और यदि राहुल ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़ी होती तो उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद शायद यह दिखावा नहीं करना पड़ता.

जस्टिस राजिंदर सच्चर

जस्टिस राजिंदर सच्चर

यह शायद संयोग ही है कि दुनिया महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती, नेल्सन मंडेला की जन्म शताब्दि और मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या की पचासवीं वर्षगांठ मनाने को तैयार है. जरा याद कीजिए कि इस देश की आजादी के मौके पर हुए बटवारे के दौरान जब मुसलमानों को बिहार और बंगाल के गांवों से लूट-पीट कर पाकिस्तान खदेड़ा जा रहा था तो उन्हें भारत में ही बने रहने देने के लिए उपवास और मौनव्रत किसने किए थे.

सांप्रदायिक दंगे रुकवाने के लिए नोआखली की गलियां अपने लहुलुहान पांवों से किसने नापी थीं? और फिर भारत में इस्लाम के अनुयायियों के लिए पाकिस्तान नामक देश बन जाने के बावजूद उन्हें बचे-खुचे भारत में बचाए रखने की कीमत गोडसे की गोली खाकर राम के किस सच्चे पुजारी ने अपनी शहादत देकर चुकाई थी? जाहिर है कि वे मोहनदास करमचंद गांधी ही थे जो अपने त्याग-तप और समर्पण की बिनाह पर महात्मा गांधी के रूप में इतिहास के पन्नों पर अमिट रूप में दर्ज हैं.

गांधी की जन्म तिथि पर पूरी दुनिया आज अहिंसा दिवस मनाती है. उन्हीं गांधी ने कांग्रेस को सेक्युलरिजम और लोकतंत्र की राह पर उंगली पकड़ कर चलना सिखाया. अफसोस यह कि उनकी गोद में पली-बढ़ी कांग्रेस को उन्हीं के शिष्य और राजनीतिक उत्तराधिकारी जवाहर लाल नेहरू की चौथी पीढ़ी ने इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया!

जबकि दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने उन्हीं के नक्शेकदम पर चले और पौने तीन दशक जेल में बंद रहे। उन्हीं से प्ररेणा पाकर समूचे अफ्रीकी महाद्वीप के अश्वेतों ने रंगभेद और फिरंगी आधिपत्य के खिलाफ संघर्ष किया और आजादी पाई।

उधर सुदूर संयुक्त राज्य अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग ने भी महात्मा गांधी की राह अपना कर अश्वेतों को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए अब्राहम लिंकन की तरह नफरत की गोली झेलते हुए अपनी शहादत दी थी. दुनिया में बराबरी और संघर्ष के पैरोकार उनकी शहादत की आज 50वीं सालगिरह मना रहे हैं मगर आधे अश्वेत अमेरिकी बराक ओबामा उससे पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके थे. इस तरह नेल्सन मंडेला हों, मार्टिन लूथर किंग हों अथवा हाल में दिवंगत हुईं दक्षिण अफ्रीका की 'राष्ट्रमाता' विनी मदिगा मंडेला हों, उन सभी का संघर्ष फलीभूत हो चुका मगर मुसलमानों को भारत में बराबरी दिलाने का महात्मा गांधी का सपना क्या रंग लाया?

गांधी और नेहरू की कांग्रेस में उनके नाम पर पल रहा खानदान उनके सबसे अजीज सपने को साकार क्यों नहीं कर पाया? क्यों आजादी के 60 साल बाद किसी सच्चर कमेटी को अपनी रिपोर्ट में भारत के मुसलमानों की दुर्दशा अमेरिकी अश्वेतों से भी बदतर जतानी पड़ी? जस्टिस सच्चर को कांग्रेस को यह बताकर आईना क्यों दिखाना पड़ा कि मुसलमानों की यह बदतरी उसके करीब 60 साल लंबे शासनकाल के बावजूद है?

जस्टिस सच्चर ने उसमें साफ कहा कि मुसलमानों को संविधान की व्यवस्था के अनुसार बराबरी पर लाने के लिए उनकी आबादी के अनुपात में उनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार, सरकारी नौकरियों में भागीदारी आदि देने के लिए सरकार को योजनाबद्ध काम करना होगा.

ManmohanSingh

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुसलमानों को भरमाने के लिए 'देश के संसाधनों पर उनके सबसे पहले हक' का जुमला दागा लेकिन वह साबित टांय-टांय फिस्स ही हुआ. भ्रष्ट नेताओं को चुनाव लड़ने की छूट देने वाले अध्यादेश को सार्वजनिक रूप में फाड़कर ऐतिहासिक काम करने वाले तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू कराने के लिए अपनी सरकार के खिलाफ मैदान में क्यों नहीं डट पाए? और अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी जिन कथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों से तबादला-ए-खयाल कर रहे हैं उनमें भी सच्चर कमेटी के सक्रिय सदस्य जफर महमूद भी शामिल हैं.

इससे आखिर कांग्रेसी साबित क्या करना चाहते हैं? क्या वे मुस्लिम बुद्धिजीवियों को लोगों की निगाह में इतना बोदा साबित करना चाहते हैं कि इरफान हबीब जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान देश की राजनीति का ककहरा भी नहीं समझते? जब इस देश के इतिहास ओर सांस्कृतिक विरासत से अनजान अनेक टीवी पत्रकार गला फाड़-फाड़ कर टीवी पर चिल्लाते हैं कि कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व, बीजेपी-आरएसएस के प्रचंड हिंदुत्व की काट है तो क्या मुस्लिम बुद्विजीवी कांग्रेस अध्यक्ष से ऐसे बचकाना सवाल पूछेंगे?

ताज्जुब यह है कि इस विशुद्ध पीआर एक्सरसाइज को कोई कांग्रेस अध्यक्ष की अक्लियतों के प्रति चिंता तो कोई कांग्रेस के सेक्युलर एजेंडे पर लौटने के रूप में परिभाषित कर रहा है. अरे भाई इतना तो भारत की राजनीति का नौसिखिया भी जानता है कि बुरी तरह चूक जाने के बावजूद कांग्रेस ही एकमात्र ऐसा राजनीतिक दल है जिसके नाम लेवा, पानी देवा आज भी देश के हरेक कोने में मौजूद हैं.

बीजेपी को मोदी-शाह की जुगाड़ू जोड़ी और आरएसएस के समर्थन के बावजूद देश के कोन-कोने में व्याप्त जड़ों वाली पार्टी नहीं कहा जा सकता. यह तथ्य दक्षिणी राज्यों में बीजेपी की दूसरे दलों पर निर्भरता से खुद ब खुद साबित भी हो रहा है. इसलिए कांग्रेस शायद इस मुगालते में है कि देश में फैल रहे नफरत के माहौल में मुसलमानों का कांग्रेस की ओर लौटना स्वाभाविक है! लेकिन मुसलमानों की आज जो हालत है उसमें तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही उसके लिए मुफीद नहीं हैं.

इसके बावजूद राहुल गांधी का मुसलमान बुद्धिजीवियों से उनकी कथित समस्याओं पर चर्चा करना और कांग्रेस का सेक्युलरिजम के मुद्दे पर स्टैंड साफ करने की कवायद को राजनीतिक नाटक से अधिक क्या कहा जाए? इसके बजाए राहुल गांधी को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में वर्णित मुसलमानों की दयनीय हालत पर कांग्रेस या उसके किसी आनुशांगिक संगठन की ओर से कोई गोष्ठी कराने, उसमें उनकी हालत सुधारने का कोई समयबद्ध एजंडा बनवाने की क्यों नहीं सूझी? जाहिर है कि कांग्रेस पिछला आम चुनाव बुरी तरह हारने के चार साल बाद भी दिशाभ्रम की शिकार है.

Rahul Gandhi

अपने लरजते हाथों वाली बूढ़ी कांग्रेस के युवा अध्यक्ष भी यह तय नहीं कर पा रहे कि देश में फैले वैमनस्य के माहौल में उनकी जिताऊ रणनीति क्या हो सकती है? जाहिर है कि दिखावे की ऐसी बैठकों से तो कोई हल नहीं निकलेगा. इसके बजाए कांग्रेस पिछड़ो-वंचितों-दलितों और अल्पसंख्यकों के विकास के लिए कोई ठोस नीति बनाए तो शायद कुछ कारगर साबित हो पाए. उससे, इन तबकों के वोटर और देश में सेक्युलर मिजाज की वो जमातें जो नफरत, फिरकापरस्ती और सियासी शोशेबाजी के माहौल से पीड़ित ही नहीं चिंतित भी हैं, शायद कांग्रेस और राहुल गांधी को अधिक गंभीरता से ले पाएंगी.

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