S M L

भारत में जॉब्स नहीं बल्कि इनके भरोसेमंद आंकड़ों का संकट है

सेंपल सर्वे के बजाय व्यापक आंकड़ों के आधार पर बनाई गई नीतियों से सटीक आंकलन, प्रभावशीलता बढ़ेगी और साथ वाद-विवाद का स्तर भी

Sreemoy Talukdar Updated On: May 03, 2018 11:10 PM IST

0
भारत में जॉब्स नहीं बल्कि इनके भरोसेमंद आंकड़ों का संकट है

जॉब्स का मुद्दा गर्माया हुआ है और आगामी चुनावी सीजन में इसके और गरम होते जाने की उम्मीद है. लोकतंत्र वाद-विवाद पर फलता फूलता है. खासकर इस वाद-विवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि एक युवा आबादी वाले देश में अच्छे गुणवत्तापरक जॉब से बढ़कर कोई चीज नहीं है. लेकिन एक विश्वसनीय, सामयिक और विस्तृत आंकड़ों के बिना इस पर बहस का कोई खास अर्थ नहीं है. विश्वसनीय संदर्भों के बिना ऐसे वाद-विवाद राजनीतिक पार्टियों का पक्ष लेकर की जाने वाली चीख-चिल्लाहट बन कर रह जाते हैं.

भरोसेमंद आंकड़े और बेहतर विश्लेषणात्मक तरीकों के अभाव में सरकार और नीति निर्धारक भ्रामक सूचनाओं की आड़ लेते हैं और जिसके नतीजे में नीतियां अनदेखी अड़चनों में घिर जाती हैं और अपने मकसद से भटक जाती हैं. अपनी विकास यात्रा के इस मोड़ पर भारत ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं कर सकता. बेरोजगारी पर भ्रामक सूचनाएं चौतरफा इतनी ज्यादा फैली हुई हैं कि कई अनुमान स्वयंसिद्ध सत्य बन गए हैं. ऐसी ही एक धारणा यह है कि 1.2 करोड़ युवा हर साल वर्कफोर्स में शामिल हो रहे हैं और नरेंद्र मोदी सरकार उनके लिए समुचित मात्रा में जॉब पैदा कर पाने में नाकाम रही है, जिससे जॉब संकट और गहरा गया है. इस संकट के संकेत टनों अखबारों के कॉलम में और वेबसाइट्स में बिखरे हुए हैं.

विपक्षी दल इसका सहारा लेकर मोदी सरकार की नाकामी की कहानी गढ़ रहे हैं. ऐसे मुद्दे को सनसनीखेज बनाने और चुनावी मुद्दे में बदल देने की कोशिश में कुछ लोग समस्या के केंद्रीय पहलू को नहीं देख पाते और हवाई दावे कर बैठते हैं, जिनकी विश्वसनीयता बहुत कम होती है.

उदाहरण के लिए बीते साल हिमाचल प्रदेश में एक रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दावा किया, 'चीन सरकार दो दिन की अवधि में एक लाख जॉब्स पैदा करती है, जबकि भारत में एक दिन में सिर्फ 450 जॉब्स पैदा किए गए. क्या यह शर्मनाक नहीं है?'

उन्होंने यही आरोप इस साल कर्नाटक में भी एक रैली में दोहराया, जहां 12 मई को चुनाव होने जा रहे हैं.

राहुल ने कर्नाटक में एक रैली के दौरान कहा- प्रधानमंत्री हर साल कहते हैं कि वह 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देंगे. चीन सरकार 24 घंटे में 50,000 युवाओं को रोजगार देती है. नरेंद्र मोदी 24 घंटे में 450 लोगों को रोजगार देते हैं.

राहुल गांधी के आंकड़े (जिसका उन्होंने कोई स्रोत नहीं बताया) बताते हैं कि मोदी के नेतृत्व में भारत में चार साल में 6,48,000 जॉब्स पैदा किए गए. रोचक बात है कि बीते साल कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने दावा किया कि था कि राज्य ने 'बीते चार साल में 13.91 लाख जॉब्स पैदा किए और सरकार के 2019 तक 15 लाख जॉब सृजित करने के लक्ष्य के करीब पहुंच रहा है.' पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक बड़े और मध्यम उद्योग मंत्री आर.वी. देशपांडे ने नवंबर 2017 में यह बात कही थी.

अगर चार साल में मोदी सरकार के कार्यकाल में सिर्फ 6,48,000 जॉब्स सृजित किए गए, तो यह समझ से परे है कि फिर कर्नाटक सरकार ने इसी अवधि में 14 लाख जॉब्स कैसे सृजित किए. कांग्रेस के विद्रोही नेता शहजाद पूनावाला ने एक ट्वीट में इस विसंगति की तरफ ध्यान दिलाया है.

पीटीआई रिपोर्ट के मुताबिक बीते साल कांग्रेस अध्यक्ष ने यूएस दौरे में मोदी की 'लापरवाह और खतरनाक' नीतियों से भारत की अर्थव्यवस्था को 'जबरदस्त नुकसान' पहुंचने के लिए उनकी आलोचना की थी. बर्कले में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में स्टूडेंट्स को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा थाः 'हर रोज जॉब मार्केट में 30,000 नए युवा शामिल हो जाते हैं जबकि सरकार रोजाना सिर्फ 500 जॉब पैदा कर रही है…' उन्होंने ध्यान दिलाया (बिल्कुल सही) कि जॉब्स पैदा करना देश की 'मुख्य चुनौती' है और बताया कि अनुमानतः हर साल 1.2 करोड़ लोग भारतीय जॉब मार्केट में शामिल हो जाते हैं.

एक बार फिर राहुल गांधी के आंकड़े का स्रोत साफ नहीं था, लेकिन अब यह संख्या अब राजनीतिक चर्चा में स्थायी जगह ले चुकी है. अगर भारत में हर महीने 10 लाख रोजगार के योग्य युवा शामिल हो रहे हैं और सरकार उनके लिए समुचित अवसर पैदा करने में नाकाम रहती है तो इससे यह बात साबित होती है कि मोदी सरकार अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी में नाकाम रही और उनके कामकाज पर जायज सवाल पैदा होता है. लेकिन यह आलोचना तभी सही होगी अगर यह विश्वसनीय आंकड़ों पर आधारित हो.

नीति आयोग के पूर्व प्रमुख अरविंद पनगढ़िया का विचार है कि 'जॉब मार्केट में हर साल 1.2 करोड़ युवा शामिल होने' का आंकड़ा भ्रामक हो सकता है और वह ध्यान दिलाते हैं कि अप्रमाणित आंकड़ों के आधार पर वाद-विवाद और विश्लेषण करना समस्या को जन्म देने वाला होगा.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर पनगढ़िया अर्थशास्त्री राहुल अहलूवालिया के अध्ययन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि, 'वास्तविक जॉब आकांक्षियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा 42 से 45 लाख के बीच है ना कि 1.2 करोड़, जिसे लेकर मौजूदा बहस चल रही है.'

टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने कॉलम में वह स्वीकार करते हैं कि यह आंकड़े निश्चित नहीं हैं और लिखते हैं कि 'वर्ष 2016-21 के दौरान एलएफपीआर (लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट) नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) और श्रम मंत्रालय के सर्वे से अलग हो सकता है. लेकिन एलएफपीआर को 2004-05 के एनएसएसओ पर लागू किया जाए तो बीते 25 सालों में इसके उच्चतम स्तर पर भी नए शामिल होने वालों की संख्या सिर्फ 85 लाख है, जो कि 1.2 करोड़ से बहुत दूर है.'

पनगढ़िया का मुख्य तर्क बड़ा सरल है. उनका कहना है कि काम करने की आयु के सभी लोग जो प्रति माह या प्रति वर्ष आबादी में जुड़ते हैं, सभी सक्रिय 'नौकरी के आकांक्षी' नहीं होते, जिसका मतलब है कि नीति निर्माताओं के लिए 1.2 करोड़ की संख्या को निश्चित लक्ष्य मानना जरूरी नहीं है.

पनगढ़िया स्पष्ट करते हैं, 'इस पर कोई बात नहीं कर रहा है कि पहले के मुकाबले वर्कफोर्स में कम लोगों के शामिल होने से हमारी जॉब की समस्या खत्म हो जाएगी. इसके बजाय मुद्दा यह है कि जहां तक मुमकिन हो, ज्यादा सटीक संख्या का इस्तेमाल करके बहस और नीति विश्लेषण किया जाए.'

यह वाद-विवाद का केंद्रीय बिंदु है. अगर संख्या गलत होगी, तो अर्थशास्त्र और राजनीतिक टिप्पणी के बीच कोई फर्क नहीं रह जाएगा कि क्योंकि दोनों व्यक्तिपरक हैं और नतीजतन पक्षपात का शिकार हो सकती हैं. अगर राजनीतिक व्याख्या को निष्पक्ष विश्लेषण के रूप में प्रचारित किया जाता है तो इससे तर्कपूर्ण बहस की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है.

जैसा कि स्वराजमैग में आर. जगन्नाथन पनगढ़िया के तर्कों का सार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, 'सरल संख्या जिस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए वह यह हैः मौजूदा एलएफपीआर दर पर 20 या 30 लाख जॉब्स का अंतर हो सकता है, और सृजित किए गए जॉब्स की गुणवत्ता निम्न स्तर की हो सकती है. एक और चुनौती महिला कामगारों की भागीदारी बढ़ाने की है, जो कि सीएमआईई के अनुसार इस समय बहुत ही कम मामूली 13.6 फीसद है. यह वास्तव में भारत की असल जॉब चुनौती है.'

आंकड़ों पर ध्यान देने की जरूरत है. कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन (ईपीएफओ) द्वारा जारी वेतनभोगियों के आंकड़े और नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) के रेकॉर्ड बताते हैं कि छह माह की अवधि में फरवरी तक, 30.1 लाख नए सदस्य जुड़े, 'जिनमें से 18-25 साल की आयु वर्ग के लोगों को नए जॉब्स का संकेतक माना जा रहा है, जो कि 18.5 लाख है… इस अवधि के दौरान एनपीएस के मामले में केंद्र और सरकारी सेक्टर में नए एकाउंट की संख्या 3,50,000 है और दोनों मिलाकर कुल 22 लाख बैठता है.' यह बात इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताई गई है.

ये आंकड़े स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर पुलक घोष द्वारा इस साल के शुरू में प्रकाशित एक अध्ययन की पुष्टि करते हैं, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि वित्त वर्ष 2018 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 70 लाख जॉब के अवसर सृजित हो सकते हैं.

बाद में टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक कॉलम में लेखकों ने अपनी मेथॉडोलॉजी (कार्य प्रणाली) के बारे में बताया और किसी गलती की संभावना से बचने के लिए अपने नतीजे में 'डाउनवर्ड बायस' पर जोर दिया. उन्होंने लिखा किः 'इन (ईपीएफओ, ईएसआईसी, एनपीएस और जीपीएफ) पर आधारित हमारा कुल वेतनभोगियों की कुल संख्या 9.2 करोड़ (शून्य अंशदान वालों को भी मिला लें तो यह करीब 10 करोड़ है) बैठती है और एनएसएसओ के आकलन से काफी कम है. सभी आंकड़ों को देखने के बाद हमें लगता है कि हर साल 70 लाख वेतनभोगी औपचारिक जॉब में शामिल हो रहे हैं.'

लेखकों का यह भी दावा है कि अगर आईसीएआई, आईसीएसआई, नेशनल बार काउंसिल, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और आयकरदाताओं के आंकड़े को भी शामिल कर लिया जाए तो 'सेक्टर में औपचारिक वेतनभोगियों की संख्या आगे और भी बढ़ सकती है.'

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

उनका इस बात पर जोर है कि नीति निर्माण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए व्यापक आंकड़ों के विश्लेषण पर भरोसा करना चाहिए.

आलोचकों का कहना है कि घोष और घोष के नतीजे त्रुटिपूर्ण हैं, क्योंकि सरकार द्वारा चलाई जा रही सामाजिक सुरक्षा स्कीम में बढ़ोत्तरी का अर्थ जरूरी नहीं कि रोजगार में वृद्धि ही हो. कांग्रेस नेता जयराम रमेश और कांग्रेस के डाटा एनालिटिक्स विभाग के प्रभारी प्रवीण चक्रवर्ती ने द हिंदू में प्रकाशित एक लेख में ऊपर किए गए दावों को खारिज करते हुए कहा कि, “अपनी पसंद के सुविधाजनक आंकड़े (ईपीएफओ के आंकड़े) और समय अवधि (वित्त वर्ष-2017 व वित्त वर्ष-2018) का चुनाव करना भ्रामक नतीजे निकालने की पुरानी, आजमाई हुई तरकीब है.'

अर्थशास्त्री वी. अनंथा नागेश्वरन ने चक्रवर्ती और रमेश के दावे का खंडन करते हुए कहा कि घोष एवं घोष के नतीजों को 'राजनीतिक व्याख्या' का निशाना बना दिया गया, जिन्होंने अपने निष्कर्षों में परंपरागत पक्षपात की उपेक्षा की.

लाइवमिंट के लिए लिखे अपने लेख में नागेश्वरन कहते हैं कि 'बड़ी कंपनियों द्वारा जॉब सृजन में उल्लेखनीय वृद्धि, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों का आरबीआई सर्वेक्षण, कारोबार और असंगठित क्षेत्र के लिए फंडिंग की कमी' पर ध्यान दिए जाने से लगता है कि 'घोष ने बिल्कुल सही तरीके से शुरुआत की है.” वह एक उदाहरण देते हुए कि किस तरह अधूरी जानकारी हमारी बाजार की शक्तियों को समझ पर असर डालते हैं, बताते हैं कि यह दावा करना स्थिति का बहुत सरलीकरण करना होगा कि निजी निवेश आगे नहीं बढ़ रहा है क्योंकि बैंक कॉरपोरेट्स को कर्ज नहीं दे रहे हैं. आईएमएफ को उद्धृत करते हुए वह लिखते हैं, “कॉरपोरेट्स ने प्राइवेट ऋण प्लेसमेंट बढ़ाया है और बैंकों के बजाय मार्केट सोर्सेज से कॉमर्शियल पेपर जारी किए गए हैं' जो कि भारतीय वित्तीय व्यवस्था के विविधिकरण का एक सुबूत है.

एक बार फिर हम पाते हैं कि पूरे परिप्रेक्ष्य में नहीं देख पाने की क्षमता के कारण हमारे निर्णय प्रभावित हो रहे हैं, जो कि तब तक दुरुस्त नहीं किए जा सकते, जब तक हम नीति निर्माण के लिए व्यापक आंकड़ों का इस्तेमाल नहीं करेंगे. वेतनभोगियों के आंकड़े का इस्तेमाल सही दिशा में उठाया गया एक कदम है.

जैसा कि लाइवमिंट ने एक संपादकीय में सही कहा है कि, 'जिस तरह का विश्वसनीय मासिक आंकड़ा विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उपलब्ध है, वैसे आंकड़े यहां मिल पाना बहुत मुश्किल है. फिर भी यह अच्छा है कि रोजगार के आंकड़ों की पड़ताल वेतनभोगियों के आंकड़े जारी करके की जा रही है… बीते दशक में सभी किस्मों के जॉब में बढ़ता वेतन इस बात का ठोस सुबूत है कि रोजगारविहीन विकास के दावे कतई सच नहीं हैं. '

एक अन्य रिपोर्ट में निरंजन राजाध्यक्ष कहते हैं कि आरबीआई अंततः व्यापक आंकड़ों की दुनिया में प्रवेश कर रहा है. बताया जाता है कि भारत का केंद्रीय बैंक 'डाटा साइंस लैब तैयार करने की योजना बना रहा है, जिसमें कंप्यूटर साइंस, डाटा एनालिस्ट, स्टेटिस्टिक्स, एकोनॉमिक्स और फाइनेंस में महारत रखने वाले प्रोफेशनल नियुक्त किए जाएंगे. इस यूनिट के दिसंबर में काम शुरू कर देने की उम्मीद है.' लेखक का कहना है कि 'ऐसी यूनिट से वित्तीय नीति निर्माता बेहतर तरीके से समझ सकेंगे कि मौजूदा हालात में कीमतें किस तरह चल रही हैं. '

सेंपल सर्वे के बजाय व्यापक आंकड़ों के आधार पर बनाई गई नीतियों से सटीक आंकलन, प्रभावशीलता बढ़ेगी और साथ वाद-विवाद का स्तर भी.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi