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भारत सांस से संबंधित बीमारियों का 32 फीसदी वैश्विक बोझ उठाता हैः रिपोर्ट

नेशनल हेल्थ पॉलिसी ऑफ 2017 के अनुसार क्रॉनिक रेसपिरेटरी बीमारियां साल 2025 तक 25 फीसदी कम हो जाएंगी

Updated On: Sep 13, 2018 04:57 PM IST

FP Staff

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भारत सांस से संबंधित बीमारियों का 32 फीसदी वैश्विक बोझ उठाता हैः रिपोर्ट

भारत की आबादी दुनिया में केवल 18 फीसदी है लेकिन भारत सांस से संबंधित बीमारियों का 32 प्रतिशत वैश्विक बोझ उठा रहा है. ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीस डेटा के विश्लेषण के बाद यह सामने आया है कि हृदय संबंधित रोगों के बाद सांस की बीमारियों के मामले में भारत का दुनिया में दूसरा स्थान है. अध्ययन के अनुसार साल 2016 में कुल मौतों में 10.9 फीसदी मौत क्रोनिक रेसपिरेटरी बीमारियों के चलते हुई थी जबकि साल 1990 में यह आंकड़ा 9.6 प्रतिशत था. सांस से संबंधित बीमारियों के पीछे का मुख्य कारण प्रदूषण की बढ़ती मात्रा है. सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पलमोनरी डिसीस) का 33.6 फीसदी भाग परिवेश वायु प्रदूषण, 25.8 फीसदी घरेलू वायु प्रदूषण और 21 फीसदी स्मोकिंग के लिए जिम्मेदार है.

क्रॉनिक रेसपिरेटरी बीमारियां 2025 तक 25%  होंगी कम

नेशनल हेल्थ पॉलिसी ऑफ 2017 के अनुसार क्रॉनिक रेसपिरेटरी बीमारियां साल 2025 तक 25 फीसदी कम हो जाएंगी. वहीं दूसरी तरफ कुल मौतों में 28.1 फीसदी मौत हृदय संबंधित बीमारियों की वजह से होती है जबकि साल 1990 में यह केवल 15.2 फीसदी था. साल 2016 में केरल में सबसे ज्यादा लोग हृदय संबंधित बीमारियों से पीड़ित थे. केरल के बाद दूसरा स्थान पंजाब, तीसरा तमिलनाडु और चौथा स्थान महाराष्ट्र का था. साल 2016 में भारत में हृदय संबंधित बीमारियों से मरने वालों की संख्या 28 लाख थी जो कि 1990 में 13 लाख थी. सांस और हृदय संबंधित दोनों बीमारियों का अध्ययन लेनसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित हुआ है.

देश के कम विकसित राज्यों में ज्यादा समस्या

आईसीएमआर के हेल्थ रिसर्च एंड डीजी विभाग के सचिव प्रोफेसर बलराम भार्गव ने बताया कि इस अध्ययन में दोनों बीमारियों के बारे में जो विश्लेषण दिया गया है वह बिल्कुल सही है. उन्होंने बताया कि भारत में एनसीडी बढ़ती जा रही है जिसके चलते भारत के कम विकसित राज्यों में हृदय रोग और डायबेटिज की बीमारी बढ़ती जा रही है. इन राज्यों में पहले से ही सांस संबंधित बीमारियों की समस्याओं से लोग जूझ रहे हैं. कुछ बीमारियां तो बचपन से ही हो जा रही हैं. पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन के डायरेक्टर डॉ. संदीप साल्वी ने बताया कि देश में क्रॉनिक रेसपिरेटरी डीसीस को रोकने एवं उन पर कंट्रोल रखने के लिए कई प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं.

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