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गुजरात चुनाव 2017: अहमद पटेल को 'बचाने' की कांग्रेस से कीमत चाहते हैं छोटूभाई वसावा

आदिवासियों पर अपनी पकड़ का दावा करते हुए छोटूभाई वसावा कांग्रेस से सीटों के सौदेबाजी में अपने लिए 25 सीटों की मांग कर रहे हैं

Darshan Desai Updated On: Nov 19, 2017 12:13 PM IST

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गुजरात चुनाव 2017: अहमद पटेल को 'बचाने' की कांग्रेस से कीमत चाहते हैं छोटूभाई वसावा

अहमदाबाद से मुंबई हाईवे पर निकलिए तो एक सड़क दक्षिण गुजरात में रासायनिक उत्पादों के लिए मशहूर अंकेलेश्वर के नजदीक बाएं मुड़ती है. और आगे चलकर इस सड़क पर आप हिचकोले खाते हुए एक आदिवासी इलाके में पहुंचते हैं. यह सड़क आड़ी-टेढ़ी होती हुई मालजीपुरा से निकलती है. भीतर की तरफ दुबली-पतली सड़कों को काटते हुए यह आपको एक महल के विशाल प्रांगण में ला खड़ा करती है जहां हर साईज की कार करीने से खड़ी की गई है.

यहां आम के बगीचे के कुछ आगे टीन के एक विशाल छप्पर के नीचे आपको दिखते हैं आदिवासियों के बेताज बादशाह छोटू भाई वसावा. छोटू वसावा ने ही अपने इकलौते वोट के सहारे 8 अगस्त के दिन राज्यसभा के लिए हुए चुनाव में अहमद पटेल को हार के जबड़ों में जाने से बचाया था.

'मैं तो खुद ही अपना चुनाव चिह्न हूं'

छोटू वसावा पिछली बार जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) के चुनाव चिह्न से जीतकर आए थे. बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ गठबंधन बना लेने पर यह चुनाव चिह्न विवादों के घेरे में आ गया है. हमने यह बात छोटू वसावा को याद दिलाई तो उन्होंने पूरी बेफिक्री के साथ मुस्कुराते हुए और अपनी नजरें कहीं और टिकाए जवाब दिया, 'मैं तो खुद ही अपना चुनाव चिह्न हूं.'

छोटू वसावा ने अपनी बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, 'अब बात चाहे जो हो, लेकिन जेडीयू का रिमोट कंट्रोल तो अमित शाह के हाथ में है लेकिन मुझे इसकी चिंता नहीं क्योंकि मेरी भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) में भीलिस्तान टाइगर सेना को साथ मिलाकर आठ लाख से अधिक सदस्य हैं.'

भीलिस्तान टाइगर सेना नाम के संगठन को छोटू वसावा के बेटे महेश वसावा चलाते हैं. यह संगठन आदिवासी इलाकों को एक अलग राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहा है.

Chhotu Vasava with Sharad Yadav

गुजरात में जेडीयू के अकेले विधायक छोटू भाई वसावा शरद यादव गुट के माने जाते हैं (फोटो: फेसबुक से साभार)

शरद यादव की रहनुमाई में जेडीयू से अलग हुए खेमे के अब छोटू वसावा कार्यकारी अध्यक्ष हैं. उन्होंने अहमद पटेल की भी मदद की है. सो, कांग्रेस के साथ बनने जा रहे गठबंधन के मद्देनजर उन्होंने बिसात पर अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी है.

गुजरात में अनुसूचित जनजाति के लिए 27 सीटें आरक्षित हैं. पिछली दफे इनमें से 16 पर कांग्रेस के प्रत्याशी कामयाब हुए थे, बीजेपी के 10 और जेडीयू की तरफ से एकमात्र विजयी प्रत्याशी के तौर पर छोटू वसावा खुद थे. 2007 में आरक्षित सीटों की संख्या 26 थी, तब भी सीटों के मामले में हिस्सेदारी ऐसी ही थी. कांग्रेस के हिस्से 16 सीटें आई थीं, बीजेपी को 9 और 1 सीट खुद वसावा के कब्जे में थी. लेकिन इस बार अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा छोटू वसावा अपने लिए चाहते हैं.

बनिया, ब्राह्मण और क्षत्रिय पार्टियां कब तक आदिवासियों पर अपना हुक्म चलाती रहेंगी?

वसावा ने बताया कि 'हमने कांग्रेस से 25 सीटें मांगी हैं. हमारी भीलिस्तान टाइगर सेना और बीटीपी का प्रभाव गुजरात में फैल गया है. आखिर बनिया, ब्राह्मण और क्षत्रिय की पार्टियां कब तक आदिवासियों पर अपना हुक्म चलाती रहेंगी?'

वसावा पर बन रही एक फीचर फिल्म के निर्देशक और संगीतकार टकटकी बांधकर उनकी तरफ देख रहे हैं और वसावा अपनी बात जारी रखते हैं, 'आदर्श स्थिति तो यही कहलाएगी कि आदिवासियों के लिए जो सीटें आरक्षित हैं उनके बारे में फैसला आदिवासी करें. और सिर्फ आदिवासी पार्टियों को ही इन सीटों पर अपना उम्मीदवार खड़ा करने की इजाजत हो. लेकिन यहां आदिवासी उम्मीदवारों के लिए फैसला गैर-आदिवासी कर रहे हैं.'

छोटू भाई के करीबी सूत्र बताते हैं कि उन्हें (छोटू भाई को) लग रहा है कि इस बार कांग्रेस के जीतने के आसार बहुत ज्यादा हैं. सो, वो अधिक से अधिक सीटें अपने हिस्से में करने के लिए जोर लगा रहे हैं. छोटू भाई ने कांग्रेस से 19 सीटें मांगी हैं और 15 से कम सीटों पर तो वो जरा भी नहीं मानने वाले.

कांग्रेस भी ठीक इसी कारण से किसी हड़बड़ी में अपने घुटने नहीं टेकना चाहती. वसावा के साथ चल रही बातचीत में शामिल रहे कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि 'आदिवासी इलाका हमारा सबसे मजबूत गढ़ रहा है. जबकि छोटू भाई का प्रभाव बहुत थोड़ी सी सीटों पर है. हम वो सीटें उन्हें दे सकते हैं लेकिन 19 या फिर 15 सीटें तो कतई नहीं देने जा रहे.'

'छोटू भाई के अपनी झगड़िया सीट के अलावा हम उन्हें हद से हद 4 से 5 सीटें देंगे,' कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया.

gujrat assembly

गुजरात विधानसभा के 182 सीटों के लिए 9 और 14 दिसंबर को चुनाव होना है. नतीजों का ऐलान 18 दिसंबर को होगा

सिर्फ चंद सीटों पर है छोटू भाई वासवा का प्रभाव

कांग्रेस के नेता का आकलन गलत नहीं है. झगड़िया के अतिरिक्त छोटू भाई का असर सूरत जिले के मंगरोल और मांडवी, नर्मदा के डेडियापाड़ा और ननडोड और एक हद तक दाहोद की सीट पर है. फिर एक बात यह भी है कि वर्ष 2012 के चुनाव में जेडीयू ने अपने 15 उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन विजय सिर्फ एक सीट पर हासिल हुई थी जहां से छोटू वसावा खुद जीते थे.

'आदिवासियों का एक बड़ा तबका परंपरागत रुप से कांग्रेस का वोट बैंक रहा है. आरएसएस और वीएचपी के जरिए बीजेपी आदिवासी पट्टी में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रही है. लेकिन इसमें पार्टी को बड़ी कामयाबी नहीं मिली है', यह कहना था व्यारा में अखबार संदेश गुजरात से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार अशोक गमित का.

व्यारा सूरत से तकरीबन 65 किलोमीटर दूर है. अशोक का कहना है कि अगर कांग्रेस वसावा की बात मान लेती है और उन्हें 4-5 सीटों से ज्यादा सीटें दे देती है तो इससे खुद कांग्रेस के ही कार्यकर्ताओं और ओहदेदारों के नाराज होने का खतरा है. कांग्रेस का यह फैसला आगे चलकर नुकसानदेह साबित होगा.

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