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बीजेपी का कोटे में कोटा मंत्र, दलितों को लुभाने की नई स्ट्रेटजी

बीजेपी कैराना लोकसभा उपचुनाव से पहले होने वाली कई भर्तियां आने वाली अधिसूचना के आधार पर ही करवाएगी, जिससे अतिपिछड़े और महादलितों के भीतर सरकार के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया जा सके

Updated On: May 03, 2018 09:59 AM IST

Aparna Dwivedi

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बीजेपी का कोटे में कोटा मंत्र, दलितों को लुभाने की नई स्ट्रेटजी
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अनुसूचित जाति/जनजाति उत्पीड़न अधिनियम के विषय में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित विरोध बीजेपी को परेशान कर रहा है. देशभर में दलित संगठनों ने सरकार के प्रति अपना रोष जताया. और विपक्ष ने इस मुद्दे को बड़ी तेजी से लपक लिया. आलम ये हो गया कि देशभर में विपक्षी पार्टियां सरकार पर दलित विरोधी का आरोप लगा रही हैं, इससे बचने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बयान देना पड़ा कि उनकी सरकार दलितों के लिए काम कर रही है.

अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव पास आ रहे हैं बीजेपी को दलित वोट साधने की चिन्ता सता रही है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी व एसटी कानून में बदलाव को लेकर बहस छिड़ी हुई है वो बीजेपी के लिए ऐसे गले की फांस बन गयी है, जिससे गठबंधन दलों को भी जवाब देते नहीं बन रहा. बीजेपी की अपनी समस्या ये भी है कि उसके अपने ही दलित सांसद नाराज हो गए हैं. अंदर और बाहर से हमले झेल रही बीजेपी अब इस कोशिश में है कि दलित वोटर और सांसद दोनो को मनाया जाए.

बीजेपी के लिए दलित क्यों जरूरी?

बीजेपी के लिए दलित वोट काफी मायने रखते हैं. खास तौर से 2014 के मतदान की समीक्षा की जाए तो बीजेपी को दलित वोटरों का काफी समर्थन मिला है. 1996 से दलित वोटों में बीजेपी की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत के आसपास ही रुकी हुई थी. लेकिन 2014 में यह लगभग दोगुनी हो गई. भारतीय चुनावी इतिहास में पहली बार लगभग एक-चौथाई दलितों ने बीजेपी के पक्ष में मतदान किया था. बीजेपी को मिले दलित वोटों के बढ़े हुए हिस्से में अधिकतर मतदाता युवा तथा बुद्धिजीवी दलितों से संबंधित थे जो प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक एजेंडे से आकर्षित हुए थे. खास तौर से युवा दलित वोटरों का रुझान बीजेपी की तरफ ज्यादा गया था. अन्य चुनाव की तुलना में ये रुझान छह प्रतिशत अधिक था.

बीजेपी पर दलित अनदेखी का लगातार आरोप

लेकिन 2014 के बाद बीजेपी पर लगातार दलित हितों के अनदेखी का आरोप लगता रहा है. हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, गुजरात के उना जिले में दलित युवक की पिटाई और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पिछले साल हुई जातिगत हिंसा के बाद दलित युवा और खास तौर से दलित बुद्धिजीवी मोदी सरकार से नाराज नजर आया. सरकार के दलित कल्याण की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगने लगे थे. हाल फिलहाल में गुजरात के उना में 450 दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाया. इस पर बीजेपी सांसद उदित राज की अपनी पार्टी के प्रति नाराजगी खुलकर सामने आई. इस तरह की घटना के पीछे सामाजिक अन्याय का कारण बताते हुए उदित राज ने कहा कि अगर आज के भारत में सिर्फ दलित को मूंछ रखने के लिए पीटा जाता है तो उसकी नाराजगी जायज है.

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2014 के बाद बीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बनाना है. सामाजिक अध्ययन करने वाली संस्था सीएसडीएस ने अपने एक अध्ययन में बताया कि 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को दलितों के 12 प्रतिशत वोट मिले थे और 2014 में ये दोगुने होकर 24 प्रतिशत हो गए थे. यही वजह है कि मायावती के हाथ एक भी सीट नहीं लगी. लेकिन उसके बाद राजनैतिक समीकरण तेजी से बदले. खास तौर पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच अनौपचारिक गठबंधन की चलते उत्तर प्रदेश की फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने फूलपुर लोकसभा सीट और गोरखपुर लोकसभा सीट पर जीत हासिल की. गोरखपुर सीट पर पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और फूलपूर पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कब्जा था.

महादलित-अतिपिछड़ा कार्ड

उत्तर प्रदेश सरकार जल्दी ही बिहार की तर्ज पर जल्द ही प्रदेश सरकार भी महादलित और अति पिछड़ा कार्ड खेलेगी, जिससे इस गठबंधन के प्रभाव को कम किया जा सके और महादलितों एवं अतिपिछड़ों के भीतर सरकार को लेकर एक सकारात्मक माहौल बनाया जा सके. दरअसल महादलित-अतिपिछड़ा का फॉर्मूला नीतीश कुमार ने बिहार चुनाव में शुरू किया था और इस फॉर्मूले पर बीजेपी को मात देकर सरकार भी बनाई थी. लेकिन बाद में नीतीश कुमार खुद बीजेपी गठबंधन का हिस्सा बन गए. अब बीजेपी उनके महादलित आयोग का मास्टरस्ट्रोक उत्तर प्रदेश में खेलना चाहती है. सोशल इंजिनियरिंग के नाम पर शुरू कर रहे इस प्रयास के पीछे बीजेपी का तर्क है कि वो दलितों के बीच सबसे ज्यादा पिछड़ी जातियों तक विकास की रोशनी पहुंचाना चाहती है. हालांकि कोटे में कोटा का फॉर्मूला बीजेपी को कितना फायदा पहुंचाएगा, ये देखने वाली बात होगी.

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उत्तर प्रदेश में ही क्यों?

बीजेपी में बागी तेवर दिखाने वाले दलित सांसद ज्यादातर उत्तर प्रदेश से हैं. उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए इसलिए भी बेहद अहम है क्‍योंकि पिछली बार यहां की 80 में से 71 सीटें बीजेपी ने अपने दम पर जीती थीं. सिर्फ इतना ही नहीं लोकसभा की 66 आरक्षित सीटों में से 40 यानी करीब 60 फीसद सीटें बीजेपी ने जीती थीं. यही वजह है कि दलित वोटरों को लुभाने का काम भी बीजेपी उत्तर प्रदेश से ही शुरू कर रही है. उत्तर प्रदेश सरकार के इस प्रयास के पीछे सोच बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की है. इसका फायदा ये होगा कि जहां वो अखिलेश और मायावती के गठबंधन के असर को कम करने का प्रयास करेगी वहीं दूसरी तरफ कोटे में कोटा देकर दलित वोटरों बैंक में सेंध लगाएगी.

बीजेपी इसके लिए कैराना लोकसभा उपचुनाव से पहले होने वाली कई भर्तियां आने वाली अधिसूचना के आधार पर ही करवाई जाएंगी, जिससे अतिपिछड़े और महादलितों के भीतर सरकार के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया जा सके. बीजेपी को उम्मीद है कि महादलित और अतिपिछड़ा कार्ड का लोकसभा चुनाव में काफी दूरगामी असर पड़ेगा. इससे उन जातियों को झटका लगेगा, जिनको ओबीसी और अतिपिछड़ा कोटे का लाभ ज्यादा मिलता रहा है. अब उनकी एक निर्धारित सीमा होगी. उससे ज्यादा उन जातियों को कोटे का लाभ नहीं मिलेगा.

बीजेपी उत्तर प्रदेश को एक टेस्ट केस के रूप में पेश करने की तैयारी में है. और इसको दलित उत्थान का एक उदाहरण पेश कर आने वाले लोकसभा चुनाव में वोट मांगना चाहती है. गौरतलब है कि देश में अनुसूचित जाति जनजाति की आबादी करीब 20 करोड़ है. और लोकसभा के 131 सांसद इस आबादी से आते हैं. बीजेपी के सबसे ज्यादा 67 सांसद भी इसी वर्ग से हैं. सिर्फ उत्तर प्रदेश में 23 फीसदी मतदाता दलित हैं. कहना गलत नहीं होगा कि दलितों के धुव्रीकरण पर तमाम राजनीतिक दलों की निगाह रहेगी और जो इसके मजबूत चक्रव्यूह का निर्माण करेगा असल में वही सियासी सिकंदर होगा.

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