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राजनीतिक शतरंज में वज़ीर की चाल चलते हैं नीतीश, बिना शह के देते हैं मात..बस देखते जाइए

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय नीतीश बिहार की राजनीति में सबसे स्वीकार्य नेता हैं इसके बावजूद अपने सहयोगी दल के रवैए से वो असहज महसूस कर रहे हैं

Abhishek Tiwari Abhishek Tiwari Updated On: Jul 08, 2018 09:14 AM IST

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राजनीतिक शतरंज में वज़ीर की चाल चलते हैं नीतीश, बिना शह के देते हैं मात..बस देखते जाइए

बात उस समय की है जब नीतीश कुमार दसवीं की परीक्षा दे रहे थे और मैथ्स (गणित) का पेपर चल रहा था. तय समय पूरा हो जाने के कारण परीक्षक ने उनकी कॉपी छीन ली और उस गणित के पेपर में नीतीश कुमार 100 में 98 अंक ही पा सकें. उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहा कि वो 100 अंक हासिल नहीं कर सके.

राजनीति की दुनिया में नीतीश कुमार ने कई मौकों पर ऐसे फैसले लिए जो लोगों को चौंकाने वाले रहे, लेकिन शायद नीतीश को किसी फैसले का मलाल नहीं रहा. आज नीतीश कुमार फिर राजनीति के अपने पेपर में उस मुकाम पर खड़े हैं जिसका तय समय पूरा होना वाला है लेकिन समय के इस पड़ाव पर वो अपने खुद के परीक्षक हैं और कॉपी अपने पास रखनी है या किसी को देनी है, उन्हें खुद तय करना है.

यह समय बिहार की राजनीति, उनकी पार्टी और खुद नीतीश कुमार के लिए काफी निर्णायक होने वाला है. बिहार एनडीए में घमासान मचा हुआ है. लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान और मोल भाव का दौर चालू है. बीजेपी के नेता तरह-तरह के बयान देकर उनपर दबाव बनाने का काम शुरू कर चुके हैं. राजनीतिक हलके में चर्चा हो रही है कि अगर बीजेपी से बात नहीं बनी तो वो फिर कुछ चौंकाने वाला निर्णय ले सकते हैं. नीतीश भी अपने अदांज में एक बार फिर दबाव की राजनीति कर कर रहे हैं.

उनकी पार्टी जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही है. इस बैठक में नीतीश के अध्यक्षीय भाषण पर सबकी निगाहें हैं. इस भाषण से तय हो जाएगा कि बिहार में क्या होने वाला है. इस भाषण का इंतजार बीजेपी के साथ-साथ बिहार की पार्टियों को भी है. बिहार में आरजेडी अभी मजबूत स्थिति में है. नीतीश इस बात को बखूबी जानते हैं. आगे उनका निर्णय जो भी वो इस हकीकत को ध्यान में जरूर रखेंगे.

तमाम अटकलों और चर्चाओं के बीच सबसे बड़ी बात यह है कि नीतीश आज भी बिहार की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी और चेहरा हैं. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता. उनका कद आज भी राज्य के तमाम नेताओं में सबसे बड़ा है. बदलते हुए हालात में अपनी प्रासंगिता को बनाए रखने के लिए नीतीश कुमार कड़े राजनीतिक फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं.

शराबबंदी का साहसिक फैसला

नीतीश कुमार ने जब 2015 बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं के एक समूह को संबोधित करते हुए कहा था कि अगर इस बार हमारी सरकार बनी तो राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करूंगा. उस समय नीतीश बीजेपी का दामन छोड़ आरजेडी के साथ हो लिए थे. लेकिन इस फैसले पर उन्हें अपने सहयोगी आरजेडी का साथ नहीं मिला. नीतीश कुमार चुनाव जीत कर आए और उन्होंने अपने वादे को पूरा किया और राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू हो गई.

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नीतीश के इस फैसले पर बीजेपी ने भी खुली रजामंदी नहीं जताई थी. हालांकि नीतीश पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. उन्होंने 10 करोड़ आबादी वाले राज्य में पूर्ण शराबबंदी कर ही दी. मीडिया में तमाम खबरें चलीं कि शराबबंदी से राज्य के राजस्व पर न जाने कितने करोड़ का असर पड़ेगा, लेकिन इसी मीडिया से किसी ने यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की कि राज्य की एक बड़ी जनसंख्या पर इसका असर क्या हुआ और न जाने कितने घर टूटने से बच गए.

आरजेडी के साथ जाना और फिर साथ छोड़ देना

नीतीश कुमार ने जब बीजेपी से नाता तोड़ा था तब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय फलक पर चमकने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुके थे. ऐसा नहीं था कि नीतीश यह नहीं जानते थे कि जिस बीजेपी नेतृत्व (अटल-आडवाणी) में विश्वास जता कर उन्होंने इस पार्टी का दामन थामा था, अब वह वैसी नहीं रही. लेकिन राजनीतिक भविष्य का अंदाजा उन्हें लग गया था. उन्हें समझ आ गया था कि बिहार जैसे राज्य में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए बीजेपी का साथ छोड़ने का समय आ गया है.4

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जिस लालू का विरोध कर नीतीश ने सत्ता हासिल की थी उसी लालू से गले मिल चुनाव जीतना और फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना नाम लिखवाना. यह नीतीश के राजनीतिक जीवन का सबसे कठीन फैसला था. लालू के साथ गए भी तो वहां भी चेहरा खुद बने रहे. आरजेडी ने 2015 विधानसभा चुनाव में जेडीयू से ज्यादा सीटें हासिल की थी लेकिन लालू और उनकी पार्टी ने चेहरा के तौर पर नीतीश को ही चुना था.

महागठबंधन में आरजेडी और कांग्रेस नीतीश के मुख्य सहयोगी थे. सरकार बनी तो लालू के छोटे बेटे तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री का पद मिला. नीतीश की राजनीति और काम करने के तरीके को समझने वाले लोग कहने लगे थे कि यह साथ लंबा नहीं चलेगा, लेकिन नीतीश ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं कहा. वो बीजेपी के सहयोगी से बीजेपी के कट्टर विरोधी बन गए. मौका मिलने पर संघ मुक्त भारत के निर्माण की कल्पना भी की.

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सरकार बनने के बाद प्रशासनिक स्तर पर नीतीश का वो जोर नहीं दिखा जो बीजेपी के साथ सरकार में रहने पर 10 साल तक था. राज्य में अराजकता बढ़ने लगी. हत्या, अपहरण और अपराध का दौर फिर से अपने पुराने रूप में लौटने को तैयार दिखने लगा. यह सब तो ठीक था, लेकिन जिस प्रकार से लालू परिवार पर एक-एक कर भ्रष्टाचार के आरोप लगते गए और रोज नए-नए घोटालों में लालू परिवार के सदस्यों का नाम आने लगा, इससे नीतीश असहज हो गए.

हद तो तब हो गई तब बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव का नाम भी ऐसे ही मामलों में आने लगा. नीतीश ने दूसरे तरफ से सफाई की उम्मीद की. उन्होंने सोचा की जनता के बीच जाकर बिहार के युवा नेता तेजस्वी सफाई देंगे, लेकिन लालू के नेतृत्व में ताकत का प्रदर्शन का खेल चलने लगा और सफाई तो दूर कोई बयान तक नहीं दिया गया.

नीतीश मजबूर हुए और राजनीति के शतरंज में बिना शह दिए सरकार के सबसे बड़े सहयोगी को मात दे दी और बीजेपी का दामन थाम लिया. नीतीश के इस फैसले की मीडिया में जमकर आलोचना हुई. मीडिया से लेकर विरोधी पार्टी के नेताओं ने उन्हें पलटूराम तक कह दिया. नीतीश को क्या लालू और उनके परिवार के भ्रष्टाचार को एंडोर्स करना चाहिए था, शायद इसका जवाब किसी के पास न हो. यह सिर्फ बातें नहीं हैं सीबीआई से लेकर ईडी तक मामला पहुंचा हुआ है. जब स्थिति ऐसी हो तो फैसले पर विचार हर कोई करता है. नीतीश ने भी वही किया.

बिहार में किसी भी पार्टी के पास नीतीश के कद का नेता नहीं

इतनी बातें कहने के बाद और राजनीतिक हालात पर चर्चा करने के पश्चात एक बात कहना बेहद जरूरी सा जान पड़ता है. फिलहाल नीतीश की सहयोगी वह पार्टी है जिसका दामन उन्होंने दो दशक से भी ज्यादा समय पहले थामा था. वह पार्टी कोई और नहीं बल्कि आज केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी ही है. बीजेपी को यह हर हाल में समझ लेना चाहिए कि नीतीश कुमार कोई जीतन राम मांझी, रमई राम, राम विलास पासवान और सुशील कुमार मोदी नहीं हैं.

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अगर बीजेपी को यह लगता है कि नीतीश कुमार कमजोर हो गए हैं तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ समय पहले ही आरजेडी के साथ जाने के बाद और फिर आरजेडी का दामन छोड़ के बीजेपी में आने के बाद भी नीतीश ही बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. अगर इन विपरित परिस्थितियों में एक सर्वमान्य नेता के तौर पर नीतीश कुमार किसी भी पार्टी में जाकर राज्य के मुखिया रह सकते हैं तो बीजेपी को अपनी सोच पर काम करना होगा और नीतीश के स्तर का नेता बिहार में तैयार करना होगा, जो एक दो साल में संभव नहीं है. वर्तमान में जिस तरह से बीजेपी की कार्यशैली चल रही है आने वाले कुछ सालों में भी यह पार्टी शायद ही इस कद का नेता दे पाए.

बीजेपी के चाणक्य भी जानते हैं नीतीश की स्थिति

बीजेपी के 'चाणक्य' अमित शाह को यह जरूर आभास होगा कि हालात 2014 जैसे नहीं हैं, ऐसे में नीतीश कुमार जैसे सर्वमान्य चेहरे को खोने की कीमत भी वो बखूबी लगा लिए होंगे. बिहार की सत्ता संभालने के बाद जो तमाम काम नीतीश कुमार ने किए उनमें से कई को केंद्र की सरकार ने भी आदर्श माना. विपरित परिस्थितियों और बदले हुए नेतृत्व को यह जरूर पता को होगा कि नीतीश की एक 'सात निश्चय योजना' बिहार की दशा बदल रही है.

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तमाम कार्य और राज्य को उन्नति की दिशा में लगातार अग्रसर करने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक बात पर लोगों ने बहुत कम गौर किया और वो था/है की नीतीश ने कभी भ्रष्टाचार से समझौता और धर्म की राजनीति करने वालों से कभी कोई उम्मीद नहीं रखी और न ही ऐसे लोगों को कोई मौका दिया.

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