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साख तो बीएसपी की दांव पर लगी है

चुनाव प्रचार में बीजेपी और एसपी-कांग्रेस गठबंधन से कहीं पीछे है बीएसपी

Updated On: Feb 11, 2017 03:26 PM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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साख तो बीएसपी की दांव पर लगी है

जब से यूपी की चुनाव आहट शुरू हुई कुछ बातें हवा में तैरना शुरू हो गईं. जैसे ये पीएम नरेंद्र मोदी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है क्योंकि पार्टी दो महत्वपूर्ण चुनाव, दिल्ली और बिहार, बुरी तरह हार चुकी है. ये भी बातें हवा में तैरने लगीं कि चार सालों तक आधे मुख्यमंत्री कहे जाने वाले अखिलेश यादव बुरी तरह चुनाव हारने वाले हैं. फिर ये भी बातें चलीं कि ये मायावती के लिए करो या मरो की लड़ाई है.

कहा जाता है कि यूपी चुनाव दिल्ली का रास्ता है. इस चुनाव में हिस्सा ले रही हर पार्टी के लिए ये चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है. यूपी की चुनावी राजनीति में भिड़ी हर पार्टी इस तिलिस्म से पार पाना चाहती है.

इस बार के यूपी चुनाव में स्पष्ट रूप से ये दिखाई पड़ रहा है कि प्रचार के हर माध्यम में बीजेपी और एसपी-कांग्रेस एक-दूसरे से मुकाबले में लगे हुए हैं. लगभग हर दिन यूपी से जुड़ा कोई न कोई वीडियो दोनों ही पार्टी की तरफ से वायरल हुआ मिल ही जाता है.

चुनावी प्रचार में पीछे छूटती बीएसपी

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एसपी-कांग्रेस गठबंधन की तरफ से रैलियों के मामले में भी सीएम अखिलेश यादव खुद ही मोर्चा संभाले हुए हैं. बीजेपी की ओर से तो लगभग सभी बड़े नेता प्रतिदिन रैली कर रहे हैं. खुद पीएम अभी तीन रैलियां यूपी में कर चुके हैं. लेकिन इन सारे चुनावी प्रचारों के बीच बीएसपी कमजोर नजर आ रही है.

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सोशल मीडिया पर तो बीएसपी की पहुंच लगभग न के बराबर है. खुद बीएसपी सुप्रीमो मायावती का सोशल मीडिया पर कोई आधिकारिक अकाउंट नहीं है. पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्र और नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी फेसबुक और ट्वीटर की दुनिया से लगभग गायब वाली स्थिति में हैं.

लेकिन बात सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है. यूपी में चुनाव कवर कर रहे कई पत्रकारों ने बातचीत में इस बात का जिक्र भी किया कि बीजेपी और एसपी-कांग्रेस की तुलना में बीएसपी की प्रचार गाड़ियां बिल्कुल न के बराबर दिख रही हैं.

समाजवादी पार्टी ने भी अपनाए तरीके 

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राजनीति के कई जानकार इसे बीएसपी का स्टाइल मानते हैं. लेकिन ये भी देखना होगा कि 2012 विधानसभा चुनावों तक समाजवादी पार्टी ने भी प्रचार के नए माध्यमों का इस्तेमाल नहीं किया था. बीते चार महीने से चल रहे समाजवादी परिवार संग्राम के बीच भी अगर अखिलेश यादव अपनी इमेज बना पाने में कामयाब रहे हैं तो इसमें बड़ा हाथ प्रचार माध्यमों का भी है.

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‘काम बोलता है’ जैसे नारे आपको हर जगह मिल जाएंगे. ऐसा लग रहा है जैसे साढ़े चार सालों तक आधे मुख्यमंत्री के तौर पर गिने जाने वाले अखिलेश यादव ने अपनी ब्रांडिंग इतनी मजबूत ढंग से करवाई कि सभी सर्वे में वे यूपी के सबसे लोकप्रिय नेता गिने जाने लगे.

अखिलेश 2014 के लोकसभा चुनावों से सबक ले चुके हैं और उसका फायदा भी दिख रहा है. कुछ इसी तर्ज पर बिहार में नीतीश कुमार फायदा उठा चुके हैं लेकिन जाने क्यों मायावती इससे दूरी बनाए हुए हैं?

कहा जा रहा था कि यूपी में गुंडाराज और अखिलेश की कमजोर होती इमेज का फायदा मायावती को मिलेगा. यूपी में लोगों की यह आम धारणा है कि उनके शासनकाल में प्रशासन चुस्त-दुरुस्त रहता है. लेकिन इन सारी बातों को भुना पाने में मायावती कम से कम चुनावी प्रचार में तो नाकाम रही हैं.

2007 में मायावती की सरकार बनी थी तो पूरा प्रदेश एसपी विरोधी नारों से गूंज रहा था.

जहां तक चुनाव में प्रतिष्ठा दांव पर होने का सवाल है तो एसपी और बीजेपी दोनों ही फायदे की स्थिति में दिख रहे हैं. बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव में 50 से भी कम सीटें मिली थीं. अगर इन चुनावों में वह सरकार बनाने की स्थिति में न भी हो और मुख्य विपक्षी दल भी बन जाए तो भी फायदे वाली स्थिति में रहेगी.

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यही स्थिति अखिलेश के साथ भी है. अगर वे सरकार बनाने में नाकामयाब होने के बाद दूसरे नंबर पर रहेंगे तो भी फायदे वाली स्थिति में रहेंगे. अगर लोकसभा की स्थिति पर भी गौर करें तो एसपी बहुजन समाज पार्टी से बेहतर अवस्था में है. अगर एसपी चुनाव हारती भी है तो भी उसके बचाव के लिए एंटी इंकंबैंसी नाम का कवच तो रखा ही हुआ है.

लेकिन 2007 में 200 से ज्यादा सीटें लाकर सरकार बनाने वाली मायावती अगर इस चुनाव में तीसरे नंबर पर आकर अटकती हैं, तो उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठने जरूर शुरू होंगे.

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