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अरुण जेटली का पूरा जवाब: जजों को धमकाने के लिए लाया गया है महाभियोग का प्रस्ताव

क्या ये महाभियोग प्रस्ताव एक ऐसी परंपरा की शुरुआत करेगा जहां पर भारत की राजनीतिक पार्टियां महाभियोग को उन जजों को डराने धमकाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगी जो कि विवादास्पद मुद्दों पर सुनवाई कर रहे होंगे?

Updated On: Apr 20, 2018 09:46 PM IST

Arun Jaitley

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अरुण जेटली का पूरा जवाब: जजों को धमकाने के लिए लाया गया है महाभियोग का प्रस्ताव

कल मैंने जज लोया की मौत के संबंध में जस्टिस डी.वाय. चंद्रचूड़ के द्वारा दिए गए जजमेंट को पढ़ा. 114 पेज के इस जजमेंट को तीन जजों की बेंच की तरफ से जस्टिस चंद्रचूड़ ने लिखा था. जजमेंट को पढ़ने से ये साफ होता है कि किस तरह से साजिश रचकर झूठ तैयार करके लोगों के सामने और राजनीतिक गलियारे में प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है.

इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ जब एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी, कुछ रिटायर्ड जजों और कुछ वरिष्ठ वकीलों को इस तरह से झूठ फैलाते हुए और साजिश रचते हुए इतने करीब से पहचाना गया है. इन सब तथ्यों का विस्तृत विश्लेषण और इस मामले में कुछ गुटों की भूमिका पर प्रकाश डालना इसलिए जरुरी है क्योंकि मुझे लगता है कि इस तरह के हमलों कि कोशिश भविष्य में भी की जा सकती है.

सोहराबुद्दीन केस में अमित शाह की कथित भूमिका

अमित शाह की सोहराबुद्दीन केस में कोई भूमिका नहीं थी. ये एक कथित एनकाउंटर था जिसे कुछ केंद्रीय ऐजेंसियों ने राज्य पुलिस के माध्यम से अंजाम दिया था. इस संबंध में मैंने उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को 27 सितंबर 2013 को एक विस्तृत पत्र लिखा था. उस पत्र में इस मामले की पूरे तथ्यों के साथ पूरी जानकारी डा.सिंह को दी गई थी.

अमित शाह को इस एनकाउंटर से जोड़ने के लिए मुख्य तौर पर दो लोगों को गवाह के तौर पर पेश किया गया था. ये दो व्यक्ति थे रमनभाई पटेल और दशरथभाई पटेल. ये दोनों व्यक्ति जमीनों पर कब्जा करने के लिए कुख्यात रहे हैं. दोनों ने दावा किया कि वो अमित शाह के दफ्तर उनसे मिलने गए थे क्योंकि वो PASA के अंतर्गत अपने खिलाफ जारी किए गए प्रीवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर को समाप्त करवाना चाहते थे. उनके अनुसार इसके एवज में उनसे 75 लाख रूपए की डिमांड रखी गई जिसे उन्होंने एक निश्चित तारीख को अजय पटेल के द्वारा इंस्टालमेंट्स में दे दी थी.

उनके दावे के मुताबिक इस मुलाकात के दौरान ही अमित शाह ने अनौपचारिक रूप से कुछ इस तरह का बयान दे दिया था कि सोहराबुद्दीन को क्यों मारना पड़ा था.

उन दोनों की तरफ से लगाया गया आरोप इतना झूठा था कि वो तथ्यों की पड़ताल से ही सामने आ गया. तथ्यों के अनुसार अमित शाह के यहां मौजूद विजिटर रजिस्टर में उन दोनों के नाम ही नहीं थे, मतलब ये कि वो दोनों कभी अमित शाह से मिलने गए ही नहीं थे. दूसरी अहम बात ये कि उन दोनों पटेलों के खिलाफ कभी भी PASA ऑर्डर जारी ही नहीं किया गया था. तीसरी बात, जिन तारीखों पर दोनों व्यक्ति ये दावा कर रहे हैं कि उन्होंने अजय पटेल को इंस्टालमेंट के रूप में 75 लाख रुपए दिए थे, उन तारीखों पर अपने पासपोर्ट के हिसाब से अजय पटेल देश के बाहर गए हुए थे.

जाहिर है कि इससे उन दोनों के आरोप तथ्यों के आधार पर झूठ साबित हुए. अब इस तरह के छिछले और झूठे आरोपों पर कोई भी कोर्ट अमित शाह को मामले से बरी कर देती. गुजरात हाईकोर्ट ने भी अमित शाह को जमानत देते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि असल में ये केस बिना किसी ठोस सबूत के आधार पर दायर किया गया था. अब ये कोई मायने नहीं रखता कि अमित शाह के खिलाफ इस कमजोर आधार वाले छिछले मामले को किस जज ने सुना. अमित शाह को इस केस से बरी कर दिया गया.

कुछ लोगों ने अमित शाह को बरी किए जाने के फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. लेकिन ये चुनौती भी कोर्ट ने खारिज कर दी. बहुत सारे लोग जो कि जज लोया की मौत को संदेहास्पद मानते हुए उस केस के जांच की मांग कर रहे हैं वो जज लोया की मौत को अमित शाह और सोहराबुद्दीन केस से जोड़कर देख रहे हैं.

द कारवां पत्रिका की फर्जी खबर

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के मुताबिक पहली दिसबंर, 2014 के शुरुआती घंटों में नागपुर के रवि भवन में ठहरे जज लोया को सीने में दर्द महसूस हुआ. जज लोया के साथ दो और डिस्ट्रिक्ट जज भी मौजूद थे. उन दोनों ने ज्यूडिशियरी के अपने दो अन्य सहयोगियों को फोन किया इसके बाद चार डिस्ट्रिक्ट जज स्तर के अधिकारी जज लोया को अपनी कार में लेकर अस्पताल पहुंचे. उस अस्पताल में ईसीजी किया गया और प्रारंभिक उपचार के बाद उन्हें स्पेशलाइज्ड कार्डियोलॉजी अस्पताल रेफर कर दिया गया. जब तक उन्हें कार्डियोलॉजी अस्पताल ले जाया गया तब तक शायद उनकी स्थिति बिगड़ चुकी थी और उनकी मौत हो गई. उनकी सांस को वापस लाने की पूरी कोशिश की गई लेकिन दुर्भाग्यवश इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली.

जज लोया के कार्डियक प्रॉब्लम के दौरान केवल उनके चार सहयोगी जज और दो अस्पतालों के डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ की पहुंच उन तक थी. चार हाईकोर्ट के जज दूसरे अस्पताल पहुंचे थे जहां के डॉक्टरों ने जज लोया का पोस्टमॉर्टम कराने की सलाह दी. जज लोया का पोस्टमॉर्टम तीसरे अस्पताल में हुआ और वहां भी रिपोर्ट में ये आया कि उनकी मौत की वजह कार्डियक समस्याएं ही रही थीं. उसके बाद उनके शव को उनके गृह नगर ले जाया गया और इस दौरान दो मजिस्ट्रेट जज लोया के शव के साथ साथ मौजूद रहे.

इस मामले से जुड़े सभी लोगों और जज लोया के परिजनों की बात सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया कि जज लोया की मौत की वजह प्राकृतिक थी. जज लोया के परिवार वाले पहले ही ये मान चुके थे कि उनकी मौत प्राकृतिक वजहों से हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने सभी से बात करने और मौजूद तथ्यों पर गौर करने के बाद माना कि जज लोया की मौत के पीछे किसी तरह की संदेहपूर्ण गतिविधियां जिम्मेदार नहीं थी और उनकी मौत की वजह केवल प्राकृतिक थी.

द कारवां पत्रिका की कहानियां और जांच फेक न्यूज का सटीक उदाहरण है. ये केवल गॉसिप या अफवाह फैलाने वाली खबर नहीं थी बल्कि जानबूझ कर इस फेक न्यूज को तैयार किया गया था जिसमें झूठ को एक खबर की शक्ल में गढ़कर लोगों के सामने एक बड़े कंट्रोवर्सी की तरह से पेश करने की साजिश रची गई थी.

संस्थाओं में व्यवधान उत्पन्न करने वाले

देश के बहुत सारे अदालतों में क्रांतिकारी वकील प्रैक्टिस करते हैं जो समय-समय पर जनहित से जुड़े मसलों को उठाते हैं और उसे आगे भी बढ़ाते है. ये बिल्कुल स्वीकार्य और स्वागत योग्य है. लेकिन पिछले कुछ सालों से ऐसा देखा जा रहा है कि लोगों के हितों की आवाज बनने वाले लोग अब संस्थाओं को बाधित करने वाले बनते जा रहे हैं.

ये लोग किसी भी झूठे विषय को उठा कर उस झूठ को फैलाने में गहरे प्रतिबद्धता के साथ जुड़ जाते हैं. ये लोग न केवल उनकी बातों का विरोध कर रहे अपने सहयोगियों के साथ ठीक से पेश नहीं आते हैं बल्कि ये कोर्ट में भी जजों के सामने रुखा व्यवहार करते हैं. ये चाहते हैं और मानते हैं कि उनके द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को शाश्वत सत्य मान लिया जाए. इस काम में उन लोगों को दो मजबूत सहयोगी भी मिल गए हैं.

पहला तो मीडिया का एक वर्ग है जो कि उन्हें और उनके द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को प्रचार देता है और दूसरा है मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस. अब हम लोग कांग्रेस को गिरते हुए देख रहे हैं जो कि एक मुख्यधारा की पार्टी से हट कर किनारे की जगह लेती जा रही है. ये पार्टी खुद या अपने अधिवक्ताओँ के माध्यम से इन संस्थागत व्यवधानियों का पक्ष लेती जा रही है ऐसे में अब अदालतों को धमकाना अब वकालत करने का नया तरीका बनता जा रहा है.

एक बंटी हुई अदालत अपने आप को इस मुश्किल क्षण में खुद को असहाय पाती जा रही है और वो इनकी चालों का जवाब देने में मुश्किलों का सामना कर रही है. जज लोया के केस का जजमेंट इस बात कि ओर इशारा कर रहा है कि उनकी धमकी की चाल इस मामले में तथ्यों के एकतरफा झुकाव की वजह से जाया हो गई है. संस्थाओं में व्यवधान उत्पन्न करने वाले लोग अब जज लोया की मौत का झूठ फैलाने वालों के प्रवक्ता बन गए हैं.

महाभियोग का हथियार

सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ मुख्य रूप से महाभियोग तब लाया जा सकता है जब या तो वो 'नाकाबिल' हों या फिर उन पर 'कदाचार का आरोप' साबित हो चुका हो, लेकिन कांग्रेस पार्टी और उनके दोस्तों ने महाभियोग को राजनीतिक हथियार बना लिया है. महाभियोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आप किसी पद पर बैठे आदमी को इसलिए हटाते हैं जिससे की पद की गरिमा बरकरार रह सके.

हमारे संविधान में महाभियोग की शक्ति इसलिए प्रदान की गई है जिससे कि संस्थागत जवाबदेही बनी रहे. संसद के दोनों सदनों को राजनीतिक सभा मानते हुए महाभियोग लगाने की न्यायिक शक्ति प्रदान की गई है. यानी कि राजनीतिक सभा को एक न्यायिक शक्ति का उपयोग करने का अधिकार दिया गया है. ऐसे में हरेक सदस्य को इस मामले में एक जज की तरह से पेश आना पड़ेगा. उन्हें व्यक्तिगत रूप से तथ्यों और सबूतों की समीक्षा करनी होगी. ये निर्णय केवल पार्टी लाइन या फिर व्हिप के आदेश से नहीं लिया जा सकता है. इस शक्ति का इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब कि कदाचार का आरोप साबित किया जा चुका हो. बिना महत्व के मामलों में इस शक्ति का इस्तेमाल करना घातक साबित हो सकता है.

ये कोई मुश्किल काम नहीं है कि किसी भी तुच्छ और छोटे से मसले पर भी लोकसभा के सौ सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर एकत्रित न किए जा सकें. लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल किसी को धमकाने के लिए उस समय करना, जब न तो आप के पास किसी तरह का कदाचार को साबित करता हुआ कोई सबूत है, और न ही आपके पास पर्याप्त संख्या बल हो, बहुत गलत है. ये न्यायिक स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा है.

मेरी पहली प्रतिक्रिया आज दाखिल किए गए महाभियोग प्रस्ताव पर बिल्कुल साफ है. ये एक बदला लेने वाली याचिका है जिसे कि जज लोया के मौत के मामले में झूठ फैलाने में कांग्रेस का हाथ साबित हो जाने के बाद लाया गया है. इस महाभियोग प्रस्ताव के माध्यम से जजों को डराने और धमकाने की कोशिश की जा रही है और साथ में दूसरे जजों को भी ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि अगर आप हमारी बातों से सहमत नहीं हो तो फिर हमारे पचास सांसद आपसे बदला लेने के लिए काफी है.

महाभियोग लगाने को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं वो ऐसे मामले हैं जिनको अदालत ने पहले ही आदेश देकर या फिर परंपरागत उदाहरणों के माध्यम से निपटा दिया है. कुछ मुद्दे ऐसे है जो कि नीरस और तुच्छ मामले हैं और उनका किसी भी न्यायिक क्रियाकलापों से लेना-देना नहीं है.

एक बंटी हुई अदालत

संस्था व्यवधानियों की अगर डराने-धमकाने की रणनीति और महाभियोग प्रस्ताव अगर न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है तो उससे भी बड़ा खतरा खुद कोर्ट का बंट जाना भी है. अब जबकि जज लोया की मौत से जुड़े झूठ और साजिश का पर्दाफाश हो गया है तो मेरे भी दिमाग में कुछ विचार आ रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के वो चार जज जिन्होंने कुछ दिनों पहले एक विवादास्पद प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, वो सभी जज अनुभवी हैं और मेरे विचार में उच्च रूप से सत्यनिष्ठ और कर्तव्यनिष्ठ भी हैं, लेकिन क्या उन्होंने जज लोया के मौत के मामले पर टिप्पणी करने से पहले इससे संबंधित सुबूतों पर नजर डाली थी या ये केवल लिस्टिंग से जुड़ी शिकायत थी? क्या केवल किसी को भी एक पेंडिग केस पर केवल इसलिए टिप्पणी करनी चाहिए क्योंकि बहुत सारी झूठी बातें एक ऐसे वातावारण का निर्माण कर रही हैं जहां से पक्षपात होने की संभावना हो? क्या आज दाखिल किया गया महाभियोग प्रस्ताव उस दिन के प्रेस कॉन्फ्रेंस का सीधा प्रभाव है? क्या ये महाभियोग प्रस्ताव एक ऐसी परंपरा की शुरुआत करेगा जहां पर भारत की राजनीतिक पार्टियां महाभियोग को उन जजों को डराने धमकाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगी जो कि विवादास्पद मुद्दों पर सुनवाई कर रहे होंगे?

आज जो कुछ भी हुआ है, कई लोगों के गलत कार्यों की वजह से उसका भुगतान भारतीय न्याय व्यवस्था को आगे भी करना पड़ेगा. ऐसे में इससे अच्छा ज्यूडिशियल स्टेट्समैनशिप और राजनीतिक दूरदर्शिता दिखाने का मौका नहीं मिलेगा.

(अरुण जेटली के फेसबुक पोस्ट से साभार)

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