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आईआईटी मद्रास बीफ विवाद: दक्षिण-वाम विभाजन ने नहीं छोड़ी संवाद की कोई जगह

आईआईटी की चुप्पी की वजह से हालात और बिगड़े हैं

Venkataraman Ganesh Updated On: Jun 02, 2017 06:00 PM IST

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आईआईटी मद्रास बीफ विवाद: दक्षिण-वाम विभाजन ने नहीं छोड़ी संवाद की कोई जगह

शुरू में ही मैं अपनी बात स्पष्ट कर दूं- मैं 30 मई को जो हिंसा हुई उसकी स्पष्ट तौर पर निंदा करता हूं और मेरी इच्छा है कि दोषियों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया जाए.

इस मसले को दो नजरों से देखने की कोई वजह नहीं बनती. इस लेख में हमने कुछ लोगों के साथ बातचीत से निकले निष्कर्ष को पेश करने की कोशिश की है कि हमारे अपने संस्थान इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नोलॉजी के अंदर जो राजनीति चल रही है इसके बारे में लोग क्या सोचते हैं.

एक आदर्श विश्वविद्यालय में राजनीति

आईआईटी मद्रास जैसे राष्ट्रीय महत्व का एक संस्थान प्राकृतिक तौर पर विभिन्न संस्कृतियों का जमावड़ा है जो देश के विभिन्न हिस्सों से आए छात्रों को एक साथ रखता है.

ये छात्र अलग अलग भाषा बोलते हैं, अलग अलग त्योहार मनाते हैं और अलग अलग रीति-रिवाजों का पालन करते हैं लेकिन वे पढ़ाई और आगे बढ़ने के समान लक्ष्य की वजह से एक दूसरे से जुड़े भी होते हैं.

लेकिन यही सबकुछ नहीं है. एक आदर्श विश्वविद्यालय जो राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है उसे ऐसी जगह बनने के लिए कड़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है जहां छात्र एक साथ प्रगति कर सकें और जीवन के सबक सीख सकें.

यह एक ऐसी जगह होती है जहां छात्रों को दुनिया से मिलने वाली चुनौतियों से निबटने का रास्ता तलाशने की स्वतंत्रता दी जाती है. यह एक ऐसी जगह भी है जहां उन्हें इस भय से मुक्त होकर नया कुछ करने का अवसर दिया जाता है कि उन पर कहीं से नजर रखी जा रही है.

आईआईटी जैसे संस्थान ऐसी जगह होते हैं जहां छात्रों को दुनिया भर में हो रही घटनाओं पर विचार करने और उन घटनाओं पर राय बनाने का मौका दिया जाता है.

इस तरह के संस्थान का असली लक्ष्य ऐसा विचारशील नागरिक वर्ग तैयार करना है जो देश को रहने के लिए एक बेहतर जगह बना सकें और जिस किसी क्रियाकलाप से छात्रों में ये गुण विकसित होता है संस्थान को ऐसी गतिविधियों को बढावा देना चाहिए चाहे वो कला, संगीत, खेल और यहां तक कि राजनीति ही क्यों ना हो.

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हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं पर चर्चा के दौरान इसका गैरराजनीतिक रहना संभव नहीं है. विभिन्न समूहों के लोगों के बीच जब तनाव पसरा हुआ हो तो इन तनावों को साधना ही एक तरह से राजनीति है.

राजनीति विभिन्न ‘मैं’ को समेटकर सामूहिक ‘हम’ में परिवर्तित करने की कला है और इस ख्याल से इससे विचारशील नागरिक वर्ग तैयार करने का लक्ष्य भी पूरा हो पाता है. क्या इस तरह की राजनीति को प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए? आईआईटी का जवाब हां में है.

देश भर के कालेजों पर नजर डालें तो आम तौर पर ये धारणा है कि छात्रों को राजनीति की अनुमति देना नुकसानदेह हो सकता है. छात्रों को राजनीति का अनुभव लेने की अनुमति देने के आईआईटी के फैसले पर इस नजरिए का असर दिखने लगा है.

दोनों विचारों के बीच संतुलन बिठाने के लिए आईआईटी प्रशासन ने बहुत पहले 1980 में अपना छात्र संविधान लिखने के लिए प्रोत्साहित किया था और पिछले साल छात्रों ने फिर से इसका प्रारूप तैयार किया. ये दस्तावेज आईआईटी कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों के लिए नीतिनिर्देशक मशाल की तरह है.

Kochi: Youth Congress organised Beef Festivals in front of Ernakulam BJP office in Kochi on Saturday. PTI Photo(PTI5_27_2017_000110B)

बीफ पार्टी में बीफ वास्तव में क्या है?

इन सारे तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमें कैंपस में हाल में आयोजित बीफ पार्टी का आकलन करना चाहिए. हिमालय की वादियों में बीफ खाने और विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के छात्रों के अधिकार को कोई चुनौती नहीं दे सकता है. हांलाकि इस बात पर कोई भी सवाल खड़ा कर सकता है कि विरोध प्रदर्शन के तौर पर बीफ खाने का क्या औचित्य है.

कैंपस के अंदर आयोजित क्रियाकलापों से छात्रों को नयी बातें सीखने-समझने में मदद मिलनी चाहिए और अगर पार्टी का उद्देश्य छात्रों को इस बारे में जागरूक करना था कि नये कानून को भंग क्यों किया गया तो क्या बीफ खाना सही था.

इस बात को लेकर मजाक बनाने से कि वे गोमाता को खा रहे हैं क्योंकि इसमें उन्हें स्वाद मिल रहा है, क्या बीफ खाने वाले और इसका विरोध करने वालों के बीच संवाद की स्थिति बन सकती है?

बीफ फेस्टिवल के आयोजन का विरोध करने वालों को संघी और दक्षिणपंथी फासिस्ट करार देने से कैंपस में सकारात्मक संवाद की जगह बनाई जा सकती है?

नहीं, और यहीं समस्या की जड़ है

मुझे बीफ पार्टी के आयोजन की वैधता को लेकर कोई संदेह नहीं है. मेरा सवाल बीफ पार्टी आयोजित करने के इरादे को लेकर है। अगर इसका इरादा नये नियमों के गुण दोष से छात्रों को अवगत कराने के लिए था, जैसा कि आयोजकों ने दावा किया है तो भी बीफ पार्टी आयोजित करना उपयुक्त नहीं था.

मैंने बीफ पार्टी के आयोजकों और अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल (एपीएससी) के सदस्यों के साथ-साथ वामपंथी विचारधारा वाले संगठनों को बार-बार चेताया कि उनके क्रियाकलाप कानूनी तौर पर तो वैध हैं लेकिन जिस तरीके से वे गतिविधियां चला रहे हैं उससे कैंपस में संवाद की जगह खत्म हो रही है.

भगवान राम का पुतला जलाने का आह्वान करते पोस्टर चिपकाने और "Mein Calf" के कैप्शन के साथ गाय का सिर हाथ में लिये पुरोहित का पोस्टर लगाने की गतिविधि भड़काने वाली है और धार्मिक भावनाओं के भी खिलाफ है, हालांकि मेरी अपीलों से किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी.

दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच उत्तर- दक्षिण विभाजन

मनीष और सूरज के बीच जब लड़ाई हुई तब जो छात्र मौजूद थे उन्हें मैंने दक्षिणपंथ समर्थक छात्र माना है. एपीएससी के छात्रों को वामपंथी माना जा सकता है लेकिन दक्षिणपंथी छात्रों का कोई औपचारिक संगठन नहीं है जिसके नाम का उल्लेख किया जा सके.

गौरतलब है कि दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारधारा के छात्रों के बीच एक क्षेत्रीय विभाजन भी नजर आता है– ज्यादातर वामपंथी विचारधारा के छात्र दक्षिण के हैं खास तौर पर केरल के, जबकि दक्षिणपंथी विचारधारा के छात्र उत्तर भारत के हैं. उदाहरण के तौर पर देखें तो सूरज केरल का रहने वाला है जबकि मनीष बिहार का है.

India Cattle Crackdown

दक्षिणपंथी विचारधारा के छात्रों ने मेल मिलाप की भावना के प्रति लगातार अनादर दिखाया है- वे बिल्कुल भी सहिष्णु नहीं हैं. वामपंथी विचारधारा के छात्रों को वे डराते धमकाते हैं और इस तरीके से वे उनके प्रति अपनी कुंठा जाहिर करते हैं. इस तरह के आचरण के लिए लगातार चेताए जाने के बावजूद उनके कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया है.

इन छात्रों ने आईआईटी मद्रास के सर्वोच्च छात्र निकाय स्टूडेंट्स लेजिसलेटिव काउंसिल की दो बैठकों को बाधित किया. दूसरी बार जब उन्होंने बाधा डालने की कोशिश की तो वहां वामपंथी और दक्षिणपंथी छात्रों के बीच टकराव शुरू हो गया. उनमें से कई लोगों के साथ बातचीत करने पर ये खुलासा हुआ कि उनमें से कई, जैसे कि मनीष, ग्रामीण इलाके से हैं और उनका लालन पालन इस तरीके से हुआ है कि वे बीफ खाने को अक्षम्य मानते हैं.

अलग-अलग लोगों में मौजूद अंतर्निहित विभिन्नताओं को स्वीकार करने की दक्षिणपंथी छात्रों की अनिच्छा की वजह से मुश्किलें दोहरी हो जाती है जिससे संवाद की जगह खत्म होती है और किसी समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की संभावना बाधित होती है.

आखिर में मैं कहूं तो कैंपस में मौजूद माहौल ऐसा नहीं है जिसमें संवाद संभव हो सके. दोनों गुटों के छात्र एक दूसरे को देखना नहीं चाहते और कैंपस के कुछ छात्रों को ऐसा भी लग रह है कि मीडिया का कवरेज पक्षपातपूर्ण है और इससे भी माहौल पर असर पड़ रहा है.

मौजूदा हालात के मद्देनजर आईआईटी प्रशासन के लिए ये महत्वपूर्ण है कि वो आगे आए और इन छात्रों के साथ खुले दिल से संवाद करके उन्हें इस बात के लिए समझाने की कोशिश करे कि कैंपस में शांति की बहाली कितनी जरूरी है.

पहले तो मामले पर अड़ियल रूख अपनाना और बाद में लीपापोती करना आईआईटी मद्रास प्रशासन की रणनीति अभी तक यही रही है. इस रूख ने समस्या को सिर्फ बढ़ाया ही है और मुझे उम्मीद है कि इस बार प्रशासन वैसा कुछ नहीं करेगा.

(लेखक आईआईटी मद्रास के डिपार्टमेंट आफ ह्यूमनिटिज एंड सोशल साइंसेज में डेवेलपमेंट स्टडीज में एमए फाइनल इयर के छात्र हैं.)

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