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यूपी निकाय चुनाव: बगैर जवाबदेही के महापौर बनना हो तो बनारस आइए

बीजेपी और संघ इस बार भी मेयर प्रत्याशी की जीत के प्रति आश्वस्त है लेकिन पिछले कार्यकालों की जवाबदेही तय कर पाना हर किसी के लिए असंभव है

Utpal Pathak Updated On: Nov 25, 2017 01:22 PM IST

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यूपी निकाय चुनाव: बगैर जवाबदेही के महापौर बनना हो तो बनारस आइए

उत्तर प्रदेश में नगर निकाय चुनाव के दूसरे चरण के लिए प्रचार शुक्रवार की शाम को थम गया. दूसरे चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी नगर निकाय के चुनाव होने हैं. रविवार को जब नगर के वोटर नए मेयर का चुनाव अपने मताधिकार से करेंगे तो उनके जेहन में एक सवाल जरूर होगा कि आखिर उनके मत का अभिप्राय कितना है और क्या वो फिर से मेयर के रूप में एक रबर स्टैंप तो नहीं चुन रहे हैं.

यह सवाल आना भी वाजिब है क्योंकि जिस तरह पिछले चार बार से लगातार बीजेपी के अलग-अलग मेयर इस पद पर आसीन होते रहे उस प्रकार उनकी जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेही भी कम होती गयी. आज आलम यह है कि बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने के क्रम में सभी शीर्ष नेता नए प्रत्याशी के लिए माहौल बनाने में लगे हैं लेकिन पूर्व के मेयरों के पाप-पुण्य पर न तो कोई सवाल उठता है और न ही कोई जवाब मिलता है.

बहरहाल थोड़ा इतिहास में झांकें तो बीजेपी के पास मेयर की कुर्सी लंबे समय से है. वर्ष 1995 में हुए परिसीमन में यह सीट पिछड़ा वर्ग (महिला) के लिए आरक्षित हुई. बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह की पत्‍‌नी श्रीमती सरोज सिंह समाजवादी पार्टी (एसपी) की विमला ग्वाल को मात देकर महापौर बनी थीं. सरोज सिंह ने विमला ग्वाल को 9 हजार वोटों से मात दी थी. उसके बाद वर्ष 2000 में यह सीट पिछड़ा वर्ग (पुरुष) के खाते में हो गई, जोरदार लड़ाई में बीजेपी के अमरनाथ यादव ने एसपी के विजय जायसवाल को हराया था. वर्ष 2006-07 में आरक्षण पुनः पिछड़ा वर्ग (पुरुष) के पक्ष में हुआ तो बीजेपी के कौशलेंद्र प्रताप सिंह ने एसपी के कन्हैयालाल को हराया. वर्ष 2012 में परिसीमन के अनुसार यह सीट सामान्य के खाते में चली गई और रामगोपाल मोहले आसानी से महापौर बन गये.

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हालांकि पिछले 20 वर्षों में बीजेपी की ओर से मेयर की कुर्सी पर भले ही अलग-अलग लोग बैठे लेकिन किसी ने पति, किसी ने पुत्र और किसी ने पिता के माध्यम से अपना कार्यभार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में चलाया. किसने कितना विकास किया यह तो वाराणसी आने पर साफ जाहिर हो जाता है लेकिन रामगोपाल मोहले ने जो भी किया वो खुद किया और बगैर डर या शक के किया. उनका आत्मविश्वास इतना ज्यादा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री की योजनाओं से भी छेड़छाड़ करने में कोई कसर नहीं रखी.

सिसकता रहा शहर, आनंद लेते रहे मेयर

पांच साल में विकास की लड़ाई का स्टेडियम बन गए वाराणसी शहर में सीवर जाम होने और गंदगी की समस्या से जूझ रहे शहरियों के लिए हल्की बारिश भी आफत बन कर आती है. कई इलाकों में जलभराव से लोग परेशान रहने की आदत डाल चुके हैं. बारिश के बीच सीवर ओवरफ्लो होने से सड़कों-गलियों का लबालब हो जाना आम है. कॉलोनियों, मोहल्लों के कई घरों के अलावा निचली सतह की बस्तियों में पानी 5 साल अनवरत घुसता रहा और बदहाल सड़कों से शहर में और दुश्वारियां फैलीं. गड्ढों में सड़क और सडकों में गड्ढे बनते रहे, सड़कें तेज धमाके के साथ धंसती रही और गड्ढों में जलभराव के बीच वाहन चालक और राहगीर गिरते-फिसलते रहे और चोटिल होते रहे.

नाला और सीवर सफाई में नगर निगम की लापरवाही का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ा. जिले के आला अधिकारी चौपाल लगाकर सफाई और जलनिकासी के मुकम्मल प्रबंध की ताकीद नगर निगम को करते रहे लेकिन जो नगर निगम ढंग से रोजाना कूड़ा तक नहीं उठवा पाता हो उससे सीवर समस्या के लिए कहना बेमानी ही था. महापौर रामगोपाल मोहले सड़कों पर बह रहे सीवर के पानी को निस्तारित करने के निर्देश जलकल के अधिकारियों को देते रहे. साथ ही मीडिया को यह भी कहते रहे कि सीवर में ब्लॉकेज की समस्या को खत्म कर इसका स्थाई समाधान किया जाएगा. मीडिया के कैमरों के सामने उन्होंने निरीक्षण वगैरह में कोई कमी नहीं रखी और उन्होंने ओवरफ्लो सीवर के लिए बाहर से मंगाई गई सुपर सकर मशीनों और जेटिंग मशीनों को भी देखा. लेकिन यह सारा प्रपंच बस मीडिया के सामने होता रहा और नतीजा सिफर ही रहा.

बयानवीर मेयर

लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली जीत के बाद मेयर साहब मीडिया बयानवीर बन बैठे, कभी उन्होंने क्योटो की तर्ज पर काशी के विकास का सपना दिखाया और कभी मोनो रेल और मेट्रो रेल को पुराने शहर में चलवाने की बात कही. उनके लिए कुछ भी कहना काफी आसान था और क्रियान्वयन के बाबत उन्होंने पत्र लिखने के अलावा और कुछ नहीं किया. नाना प्रकार के कार्यक्रमों का उद्घाटन और मुख्य अतिथि बनने की परंपरा का निर्वाह उन्होंने बखूबी किया. विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए संकल्प लेते रहे लेकिन अपनी मूल जिम्मेदारी से चूक गए.

मेयर की उपलब्धियां

वाराणसी के मेयर रामगोपाल मोहले की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वो 5 साल तक सुर्खियों में बने रहे. भले ही वाराणसी और वाराणसी के निवासियों से उन्हें नकार दिया लेकिन उन्होंने खुद के विकास का काम अनवरत जारी रखा. न सिर्फ उन्होंने शहर की कई विवादित संपत्तियों को साफ-सुथरा कर के अपने हिसाब से 'ठीक' किया. बल्कि दूसरी तरफ कुछ खास इलाकों में सड़क, बिजली और पानी की व्यवस्था का विशेष रूप से ध्यान रखा. उनकी शिकायतों का पुलिंदा लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचता रहा और एक दिन उन्हें बाकायदा बुलाकर इस बात से अवगत भी करवाया गया कि उन्हें सुधर जाना चाहिए. लेकिन मेयर साहब बाबा विश्वनाथ का नाम लेकर विकास करते रहे और प्रधानमंत्री के सपनों को धता बताते रहे. उनके खास लोगों की कमाई में दिनों-दिन बढ़ोतरी होती रही.

पल में तोला, पल में माशा

पांच वर्षों में मेयर साहब ने ना ना प्रकार के रूप दिखाए, कभी पूर्व की समाजवादी पार्टी सरकार में अधिकारियों के असहयोग से खिन्न रहने के बहाने जिम्मेदारियों से भागे तो कभी अचानक बीजेपी सरकार आने के बाद वह विकास कार्यो के निरीक्षण के अलावा उनकी प्रगति को लेकर बेहद सजग हो गए. इसी क्रम में उन्होंने कई बार स्वयं विकास कार्यो की समीक्षा की और उनको पूरा करने के लिए समय सीमा भी तय कर दी. हालांकि इस भावनात्मक अतिरेक में वो अक्सर उन योजनाओं पर भी बोलते पाए गये जिनसे उनका या उनके कार्यक्षेत्र से कोई लेना-देना भी नहीं था. मेयर साहब ने नगर निगम कार्यकारिणी की बैठक को भी प्रभावित किया और अपना पूरा कार्यकाल बगैर डिप्टी मेयर के चलाया.

मेयर साहब ने 5 साल तक सिर्फ एसपी, कांग्रेस समर्थित पार्षदों का ही नहीं बल्कि बीजेपी के पार्षदों का कोप भी झेला लेकिन किसी को कुछ नहीं दिया. एसपी के निवर्तमान पार्षद शंकर विश्नानी बताते हैं कि '5 वर्षों तक हमने सदन में बार-बार हर तरीके से शहर की समस्याओं उनका ध्यान आकर्षित करवाने की कोशिश की लेकिन उनका ध्यान कहीं और लगा हुआ था. इस बार बीजेपी अगर कई वार्डों में हार रही है तो उसका कारण मेयर मोहले का नाकारापन है. हमारी पार्टी को इसका फायदा मिल रहा है.'

शीर्ष नेतृत्व की नाराजगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो वर्ष पूर्व जब अस्सी घाट पर फावड़ा चलाकर श्रमदान किया तो उनके ठीक बगल में खड़े मेयर रामगोपाल मोहले हाथ पर हाथ धरे खड़े रहे. बाद में उन्हें एहसास हुआ कि वो कैमरे की नजर में हैं तो वो श्रमदान करने का स्वांग करने लगे. लेकिन तब तक बात बिगड़ चुकी थी और वो नजर में आ चुके थे. शीर्ष बीजेपी सूत्र बताते हैं कि मेयर साहब के क्रियाकलापों से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इस कदर नाराज हुआ कि पिछले एक साल से उनका नाम प्रधानमंत्री के वाराणसी दौरों में स्वागत समिति में भी नहीं रहता था. और न ही मंच पर उनकी उपस्थिति रहती थी. इसके बावजूद उन्होंने अपना विकास जारी रखा लेकिन बाकी समय वो सोते रहे. उनके सोने की आदत इस कदर हावी थी कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) रक्षा बंधन उत्सव में भी नीद में दिखाई दिए. जहां एक तरफ पार्टीजन और संघ के शीर्ष पदाधिकारी रक्षाबंधन के पूर्व संध्या पर कार्यक्रम में अपनी भागीदारी दे रहे थे तो वहीं शहर के प्रथम नागरिक महापौर रामगोपाल मोहले खर्राटे भरते नजर आ रहे थे.

Ramgopal Mohley

एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान वाराणसी के मेयर रामगोपाल मोहले सबके सामने खर्राटे भरते रहे

बीजेपी से जुड़े एक शीर्ष नेता ने नाम नहीं छापने के शर्त पर स्वीकार किया कि 'मेयर साहब पर पैनी नजर काफी दिनों से रखी जा रही थी, ऐसे में उन्हें नई जिम्मेदारी देना तो दूर रहा बल्कि उनसे और कई काम छीन लिए गए. अब चूंकि वो मेयर थे और उनका पद एक सम्मानित पद है लिहाजा सार्वजनिक रूप से उनसे दूरी नहीं बनाई गई लेकिन अंदरखाने में उन्हें कोई पसंद नहीं करता.'

आखिरी दिनों में दिखने लगी बुरे दिनों की सुगबुगाहट

शीर्ष नेतृत्व की नाराजगी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसी साल अगस्त के महीने में ही निवर्तमान नगर आयुक्त डॉक्टर नितिन बंसल ने प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालते ही मेयर रामगोपाल मोहले की सभी सुविधाएं बंद कर दी. इसके तहत मेयर को उपलब्ध कराए गए सीओजी नंबर बंद कराने के साथ ही गाड़ी भी वापस ले ली गई. मेयर के साथ ही पार्षदों के कमरों पर भी ताला जड़ दिया गया. नगर निगम सूत्रों की मानें तो मेयर साहब नगर निगम की पहली कार्यकारिणी की बैठक का वास्ता देते हुए सरकार द्वारा दी गई सुविधाएं ले रहे थे. जबकि इस बाबत नगर आयुक्त ने स्पष्ट किया कि 'चूंकि कार्यकारिणी की पहली बैठक के मुताबिक 16 अगस्त को ही कार्यकाल पूरा हो चुका है लिहाजा शासनादेश के मुताबिक सुविधाएं वापस ले ली गईं.'

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माना जा रहा है कि डॉ नितिन जैसे कर्मठ और बेदाग छवि के अफसर को नगर आयुक्त के रूप में लाकर नेतृत्व ने मोहले के पाप धोने का काम शुरू किया है. इसी कारण प्रशासनिक कार्यभार संभालते ही नितिन बंसल एक्शन में आ गए. उन्होंने न सिर्फ मेयर को दी गई सभी सुविधाएं छीनने का आदेश दिया बल्कि मेयर और पार्षदों के कमरों में ताले लगवाने के साथ मेयर कक्ष के बाहर लगी नेम प्लेट भी हटाने निर्देश दिए जिसका फौरन पालन भी किया गया. वहीं मेयर राम गोपाल मोहले ने प्रशासन के इस कार्य को अधिनियम के विपरीत बताने की कोशिश की. उन्होंने सदन की बैठक तारीख बदले जाने हवाला दिया लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती साबित हुई.

माया महाठगिनी

बहरहाल बदलते परिसीमन के बीच पिछले दिनों यह चर्चा आम थी कि अगर सीट पुनः सामान्य पुरुष हुई तो मेयर साहब दोबारा शहर की 'सेवा' करेंगे. सामान्य महिला हुई तो वो अपनी पत्नी को चुनाव लड़वाकर 'सेवा' जारी रखेंगे. लेकिन भला हो चुनाव आयोग का जो सीट का परिसीमन अति पिछड़ा वर्ग महिला हो गया. मेयर साहब ने पार्षद सीट में अपने परिवार के लिए टिकट मांगने की कोशिश की लेकिन संगठन ने उन्हें खरी-खरी सुनाते हुए शांत कर दिया.

बहरहाल, बीजेपी और संघ इस बार भी मेयर प्रत्याशी की जीत के प्रति आश्वस्त है लेकिन पिछले कार्यकालों की जवाबदेही तय कर पाना हर किसी के लिए असंभव है. ऐसे में रामगोपाल मोहले को भी पूर्व के मेयरों की भांति आसानी से रास्ता मिल गया और शहर फिर से नए मेयर के चुनाव में व्यस्त हो गया है.

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