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नोटबंदी : केजरीवाल के रास्ते चले राहुल गांधी

राहुल गांधी कुछ ऐसा कहना चाह रहे हैं जिससे उन्हें लोकप्रियता मिल जाय.

Updated On: Dec 14, 2016 02:28 PM IST

FP Staff

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नोटबंदी :  केजरीवाल के रास्ते चले राहुल गांधी

लोकसभा चुनाव से कुछ दिन पहले 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के तुरंत बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘इस चुनाव के माध्यम से जनता ने हमें एक मैसेज दिया है. इस मैसेज को मैंने और पार्टी ने सिर्फ दिमाग से नहीं, दिल से लिया है.'

राहुल गांधी ने आगे कहा था, 'कांग्रेस पार्टी में खुद को बदलने की क्षमता है. हम और हमारे नेता कांग्रेस के संगठन में बदलाव करके एक ऐसी पार्टी आपके सामने लाएंगे जिस पर आपको गर्व होगा.'

वे बोले, 'मुझे लगता है आम आदमी पार्टी अपने साथ लोगों को जोड़ने में सफल रही है, जो हम लोग नहीं कर पाए हैं. हम उनसे सीख लेते हुए अपने आप में बेहतर बदलाव करेंगे.’

पिछले करीब एक महीने से चल रही नोटबंदी के दौरान राहुल गांधी जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं, उससे यह कहा जा सकता है कि उनकी पार्टी कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से सबक लिया हो या ना लिया हो, लेकिन कांग्रेस के युवराज ने जरूर 'आप' संयोजक अरविंद केजरीवाल से सीख ले ली है...और यह सीख है मीडिया में किसी न किसी बहाने खुद को चर्चा में बनाए रखने की.

बुधवार को भी कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद विपक्ष के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस दौरान उनके निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे.

उन्‍होंने कहा,'मेरे पास प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार की निजी जानकारी है. प्रधानमंत्री मेरे खुलासे से डरकर मुझे बोलने नहीं दे रहे हैं. इसकी जानकारी मुझे लोकसभा में देनी है. प्रधानमंत्री मुझसे घबराए हुए हैं.'

कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने कहा, 'यह पहली बार देखा जा रहा है कि संसद में सत्ता पक्ष के लोग ही सदन नहीं चलने दे रहे हैं. सदन में हमें बोलने दिया जाना चाहिए, यह हमारा हक है.'

उन्होंने आगे कहा, 'अमेठी की जनता ने हमें संसद में भेजा है. पिछले एक महीने से पूरा विपक्ष लोकसभा में चर्चा करना चाहता है. लेकिन प्रधानमंत्री और सरकार यह होने देना नहीं चाहते.'

वैसे, किसी भी प्रधानमंत्री पर लगाए गए निजी भ्रष्टाचार के आरोप पर एकबारगी विश्वास करना मुश्किल होता है लेकिन राहुल गांधी यह बयान पहली बार नहीं दे रहे हैं.

नोटबंदी के बाद से कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी लगातार प्रधानमंंत्री पर हमला करते रहे हैं.

इस दौरान वह दिल्ली से लेकर भिवंडी तक पैसे निकालने के लिए लगी लंबी-लंबी कतारों में पहुंच गए. एटीएम और बैंकों के चक्कर काटे.

मंगलवार को भी उन्होंने दादरी की अनाज मंडी पहुंच कर किसानों से मुलाकात की.

वह प्रधानमंत्री के खिलाफ हर दिन नया जुमला गढ़ने में लगे रहे. इस दौरान इस बात का भी ख्याल नहीं रखा गया कि, आरोप किस आधार पर लगाए जा रहे हैं और यह जनता के बीच कितने समय तक टिक पाएगा.

दरअसल अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर राहुल गांधी ने यह सीख लिया है कि टीआरपी के इस दौर में इस तरह के आरोप पर लोग चर्चा तो करते हैं, लेकिन बाद में वह भूल जाते हैं कि सच्चाई में आरोप का क्या हुआ.

राहुल गांधी और उनकी पार्टी का काम बस इतने से बन जाता है.

दरअसल आजादी के बाद से सबसे लंबे समय तक देश की अगुआई कर चुकी पार्टी अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है.

आज लोकसभा में वह दहाई के आंकड़ों में सिमट गई है. दस से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से लोकसभा में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है.

लोकसभा में हार के बाद से कई नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है. उसके एक के बाद एक करके पार्टी के कई गढ़ ढह रहे हैं.

जिन राज्यों में उनकी सरकार हैं, वहां असंतोष की खबरें आ रही हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता के आरोप लग रहे हैं. नेतृत्व के स्तर पर भी असमंजस की स्थिति है.

बूढ़े हो चुके नेताओं और नए चेहरों के बीच गुटबाजी चल रही है. विपक्ष के रूप में उसकी भूमिका भी बेहतरीन नहीं रही है. भ्रष्टाचार का आरोप अब भी पार्टी को परेशान कर रहा है. ऐसे में राहुल गांधी कुछ ऐसा कहना चाह रहे हैं जिससे उन्हें लोकप्रियता मिल जाय.

दिक्कत यह है कि राहुल अब भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें किस तरह का नेता बनना है.

जिस तरह से उनका कद है उस हिसाब से उनके समर्थक और आलोचक दोनों उन्हें गंभीर नेता के तौर पर देखना चाहते हैं.

पर, राहुल गांधी जिस तरह का ड्रामा कर रहे हैं उससे उन्हें लोग गंभीरता से लेंगे इसमें संदेह है.

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