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'आप' और अरविंद केजरीवाल इस संकट से खुद को कैसे संभाल पाएंगे?

राष्ट्रपति द्वारा चुनाव आयोग की सिफारिश को मंजूर कर लेने के बाद दिल्ली में जोड़-तोड़ की राजनीति फिर से शुरू होने के आसार बन रहे हैं

Updated On: Jan 22, 2018 03:51 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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'आप' और अरविंद केजरीवाल इस संकट से खुद को कैसे संभाल पाएंगे?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार को झटके पर झटका लग रहा है. बीते रविवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने चुनाव आयोग की उस सिफारिश को मंजूर कर लिया, जिसमें लाभ के पद मामले में आप के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की अनुशंसा की गई थी.

हालांकि, इस फैसले के बावजूद दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार को कोई खतरा नहीं है. लेकिन, पिछले कुछ दिनों से पार्टी के अंदर जिस तरह से घमासान मचा हुआ है, उससे किसी अनहोनी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है.

विधायकों को एकजुट रखने, उपचुनाव होने पर उसकी भी जिम्मेदारी 

राजनीतिक गलियारे में इस बात की भी चर्चाएं शुरू होने लगी हैं कि पार्टी के तीन नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद विशेष कर सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता पर विशेष जिम्मेदारी आने वाली है. अब दोनों सांसदों पर पार्टी विधायकों को एकजुट रखने और अगर उपचुनाव हुए तो उसकी भी जिम्मेदारी आने वाली है.

संजय सिंह को छोड़ दोनों ही राज्यसभा सांसद पार्टी के लिए भी नए हैं. संजय सिंह के पास पहले से ही पार्टी की कई जिम्मेदारियां है. लेकिन, सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता राज्यसभा सांसद निर्वाचित होने के बाद पार्टी में जिम्मेदारी लेने की आस में बैठे थे.

तस्वीरः न्यूज18

अरविंद केजरीवाल के सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को आम आदमी पार्टी की तरफ से राज्यसभा भेजने के निर्णय को लेकर सवाल खड़े हुए थे (फोटो न्यूज18)

इतनी जल्दी उनकी यह आस पूरी होने वाली है, दोनों ने ऐसा कभी नहीं सोचा होगा. इन दोनों ने सोचा भी नहीं होगा कि जिस काम के लिए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने उन्हें राज्यसभा भेजा था, उस काम को करने का वक्त इतनी शीघ्रता से आ जाएगा. सरकार बचाने से लेकर, उपचुनाव होने तक सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता पार्टी के लिए जरूरत साबित होने वाले हैं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शायद चुनाव आयोग के फैसले की भनक पहले ही लग गई थी. इसे ध्यान में रखते हुए ही केजरीवाल ने पार्टी कार्यकर्ताओं और पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं कुमार विश्वास और आशुतोष के अनुभव पर गुप्ता बंधुओं के अनुभव को ज्यादा तरजीह दी.

राष्ट्रपति द्वारा चुनाव आयोग की सिफारिश को मंजूर कर लेने के बाद दिल्ली में जोड़-तोड़ की राजनीति फिर से शुरू होने के आसार बन रहे हैं. चुनाव आयोग के फैसले के बाद 3-4 अहम सवाल उभर कर सामने आए हैं.

पहला, इस फैसले के बाद दिल्ली सरकार पर कितना खतरा मंडरा रहा है? दूसरा, इन सभी विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव कितने जल्दी कराए जाएंगे. इसमें आप को कितना नुकसान और कांग्रेस-बीजेपी को कितना फायदा होगा?तीसरा, क्या इस संकट से आम आदमी पार्टी टूट जाएगी? चौथा सवाल यह है कि पार्टी से नाराज चल रहे कुछ विधायकों और नेताओं जैसे कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा जैसे लोग दिल्ली सरकार का खेल बिगाड़ेंगे?

ताजा घटनाक्रम के बाद 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा में आप विधायकों की संख्या 66 से घटकर अब 46 हो गई है. फिलहाल सरकार पर तो कई खतरा नहीं है, लेकिन बागी विधायक अरविंद केजरीवाल का खेल बिगाड़ सकते हैं.

arvind kejriwal

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

दिल्ली हाईकोर्ट आप की याचिका पर दोबारा सुनवाई कर रही है

पिछले सप्ताह चुनाव आयोग की सिफारिश के तुरंत बाद पार्टी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन उसे निराशा हाथ लगी थी. दिल्ली हाईकोर्ट सोमवार को आम आदमी पार्टी की याचिका पर दोबारा से सुनवाई कर रही है.

आम आदमी पार्टी ने हाईकोर्ट से अपने 20 विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने के फैसले पर रोक लगाने की मांग की है. आप के 20 विधायक 'लाभ का पद' लेते हुए दिल्ली सरकार के मंत्रालयों में संसदीय सचिव पद पर काबिज होने के दोषी पाए गए हैं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी पर काम में अड़ंगा डालने का आरोप लगाया है. केजरीवाल ने कहा, ‘20 विधायकों के खिलाफ झूठे मामले गढ़े गए. मेरे ऊपर भी रेड कराए गए, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला. मिला तो सिर्फ चार मफलर. उन्होंने सब कुछ आजमाया और अंत में 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करा दिया. जब हमारे 67 विधायक जीते तो मुझे बड़ी हैरानी हुई, पूरी दुनिया यह भी जानती है कि ये 20 विधायक क्यों अयोग्य हुए. ऊपरवाले ने 67 सीटें कुछ सोच कर दी थी.’

दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी बीजेपी पर जमकर हमला बोला. मनीष सिसोदिया ने मीडिया से कहा, ‘बीजेपी को दिल्ली का विकास देखा नहीं जा रहा है. यही वजह है कि वह हर तरीके से परेशान कर रही है. बीजेपी आम आदमी पार्टी के विधायकों को तोड़ने की कोशिश करती है. यह पहली बार नहीं है कि बीजेपी आम आदमी पार्टी को परेशान कर रही है.’

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राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग की सिफारिश पर आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को लाभ के पद मामले में अयोग्य ठहरा दिया है (फोटो: पीटीआई)

केजरीवाल सरकार ने आदेश पारित कर 21 विधायकों को सचिव बनाया

13 मार्च, 2015 को आप की सरकार ने एक आदेश पारित कर अपने 21 विधायकों को सचिव बनाया था. वकील प्रशांत पटेल ने इनकी अयोग्यता को लेकर राष्ट्रपति के पास चुनौती दी थी. दिल्ली सरकार ने इसे रोकने के लिए 2015 में असेंबली में एक विधेयक पारित किया. मेंबर ऑफ लेजिसलेटिव असेंबली (रिमूवल ऑफ डिसक्वालिफिकेशन अमेंडमेंट बिल) के नाम से इस बिल में तत्काल प्रभाव से लाभ के पद से संसदीय सचिवों को बाहर कर दिया गया. हालांकि, बाद में राष्ट्रपति ने इस अमेंडमेंट बिल को रोक लिया और आगे की कार्रवाई के लिए मामले को चुनाव आयोग को सौंप दिया.

सोमवार को देश के मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति रिटायर हो रहे हैं. आम आदमी पार्टी के नेताओं का मानना है कि सीईसी के रिटायरमेंट से ठीक पहले 20 विधायकों को जिस तरीके से ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला बता कर सदस्यता से निलंबति किया है, उससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े उठे हैं. आम आदमी पार्टी ने इसे मुख्य चुनाव आयुक्त का रिटायरमेंट प्लान कहा है.

हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि सीईसी ने न्याय देश के सामने रखा है, वह अंतरात्मा की आवाज का गला घोंटते हुए दिखाई दिए हैं. ऐसा लग रहा है मानो लोकतंत्र चीख-चीखकर अपने महफूज होने की बात कहती हुई नजर आ रही हो.

अब सवाल यह उठता है कि जिस सरकार के 66 विधायकों में 20 विधायकों को सदस्यता अयोग्य करार दे दी जाती है, उस सरकार की जनता के सामने नैतिकता का क्या पैमाना होगा. कांग्रेस और बीजेपी ने नैतिकता की दुहाई देते हुए अरविंद केजरीवाल से दिल्ली के सीएम पद से इस्तीफा देने की मांग कर दी है.

आम आदमी पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद से ही अंदर और बाहर नेताओं के ज्वालामुखी समय-समय पर फूटते रहे हैं. प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार, मयंक गांधी जैसे लोगों ने खुद को पार्टी से पूरी तरह से किनारा कर लिया है, वहीं कुमार विश्वास जैसे नेताओं की अहमियत को तरजीह न देकर चापलूस पॉलीटिक्स की शुरुआत की गई. पार्टी के वैसे नेताओं ने धीरे-धीरे पार्टी से किनारा कर लिया.

arvind kejriwal

नैतिकता का गला घोंटा जाता है तो बात सबसे ज्यादा होती है

जानकारों का मानना है कि जब नैतिकता का गला घोंटा जाता है तो इसकी बात सबसे ज्यादा होती है. एक तरफ अरविंद केजरीवाल की पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने जाते-जाते नैतिकता का गला घोंट दिया. दूसरी तरफ सीईसी ने और बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी की खुद की नैतिकता पर सवाल खड़े कर उसे भी सोचने पर विवश कर दिया है.

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