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नोटबंदी: लोकतंत्र में मौतें तर्कसंगत कैसे हो सकती हैं!

किसी भी तरह की मौत को जायज कैसे ठहराया जा सकता है?

Updated On: Nov 20, 2016 03:25 PM IST

Krishna Kant

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नोटबंदी: लोकतंत्र में मौतें तर्कसंगत कैसे हो सकती हैं!

नोटबंदी के बाद बैंक से रुपये निकालने या बदलने की कोशिश में कई लोगों की मौत हो गई. इस बारे में लोगों की अपनी-अपनी राय है.

सरकार के किसी फैसले से सहमत या असहमत होने से अलग, किसी भी तरह की मौत को जायज कैसे ठहराया जा सकता है?

नोटबंदी के चलते हो रही मौतों पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे और सांसद गोपाल शेट्टी का बयान लोकतांत्रिक पतन का एक नमूना भर है जो कतई हैरान नहीं करता.

आम जनता की जिंदगी सरकारों के लिए हमेशा एक आंकड़ों से ज्यादा की अहमियत नहीं रखती. चाहे वह किसान आत्महत्याओं का मामला हो या किसी मानवजनित कारणों से हो रही मोतें हों.

नोटबंदी के चलते हुई परेशानियों के कारण कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. इस बारे में पूछे गए सवाल पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं मध्य प्रदेश प्रभारी डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने जवाब दिया, 'लोग तो राशन की लाइन में भी मर सकते हैं....अब आगे ऐसे मामले न हों, इसके लिए पूरी व्यवस्था की जाएगी.'

दूसरी तरफ, इसी मसले पर उत्तर मुंबई से सांसद गोपाल शेट्टी ने कहा, 'हर साल रेल पटरियों पर 3,500 यात्रियों की मौत हो जाती है.

पांच लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं और कहीं अधिक लोगों की आतंकवादी घटनाओं और अन्य घटनाओं में मौत हो जाती है. लेकिन कोई उनके बारे में बात नहीं करता. कुछ पाने के लिए, कुछ खोना पड़ता है.'

यह कोई हैरान होने वाली बात नहीं है कि सरकार के किसी निर्णय को सत्तारूढ़ पार्टी के लोग जायज ठहराएं. यह उनकी पार्टी लाइन का मसला है और इसमें कुछ गड़बड़ भी नहीं.

लेकिन उस निर्णय से उपजी तबाही को अगर वे किसी उपलब्धि की तरह पेश करें तो समझना चाहिए कि हमारे जनप्रतिनिधियों की संवेदना कितनी क्रूर हो चुकी है.

वीके सिंह से जवाब-तलब

v k singh

कुछ महीने पहले फरीदाबाद में दो दलित बच्चों को जिंदा जला दिया गया था. इस घटना पर विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह से पूछा गया कि क्या यह सरकार की नाकामी है? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि 'सरकार को इसके साथ मत जोड़िए. यह दो परिवारों का आपसी झगड़ा था, मामले की जांच की जा रही है. यदि कोई कुत्ते को पत्थर मार दे तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है. केंद्र सरकार का दलित बच्चों की मौत से कुछ लेना-देना नहीं है.'

जुलाई, 2015 में कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह से राज्यसभा सांसद सीपी नारायणन ने किसानों की आत्महत्या को लेकर सवाल पूछा था.

कृषि मंत्री ने लिखित जवाब में कहा कि किसानों की आत्महत्या के पीछे मुख्य वजहों में किसानों के प्रेम प्रसंग, शादी टूटना, नपुंसकता, बांझपन और दहेज की समस्या है. कृषि मंत्री ने फसल खराब होने और किसानों पर बढ़ते कर्ज को जवाब के सबसे अंत में रखा.

बीते सितंबर में महाराष्ट्र के आदिवासी कल्‍याण मंत्री विष्‍णु सावरा अपने चुनाव क्षेत्र पालघर के दौरे पर थे.

इस दौरान उन्होंने कुपोषण से मर रहे आदिवासियों के बारे में कहा, 'अरे भाई मर गए तो मर गए न. अब उसका क्या? कोशिश इसके आगे ऐसा न हो ये है'.

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र में 1 अप्रैल 2015 से जुलाई 2016 तक 683 बच्चे कुपोषण के शिकार हो चुके हैं. इसके उलट विपक्ष कह रहा है कि दोगुनी मौतें हुई हैं. इस पर मंत्री का रवैया है कि 'मर गए तो मर गए.'

इसके पहले उपमुख्यमंत्री रहते हुए अजीत पवार भी कई बार लोगों का मजाब उड़ा चुके हैं. एक सभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजीत पवार ने कहा था, 'एक आदमी 55 दिन से बांध से पानी छोड़ने की रट लगाए हुए है. वह अनशन पर है, क्या उसे पानी मिल गया? जब पानी ही नहीं है तो कहां से छोड़ें, क्या अब पेशाब कर दें?

बिजली की किल्लत पर अजीत पवार की महान राय

...जब पीने को पानी है ही नहीं, तो पेशाब भी नहीं होती.' इसी भाषण में उन्होंने बिजली की किल्लत पर अपनी महान राय रखी थी कि 'रात में दो बजे बिजली काट देते हैं. आजकल रात में बच्चे बहुत पैदा हो रहे हैं. बिजली नहीं होगी तो लोग क्या करेंगे.'

कुपोषण, बिजली, पानी, किसान आत्महत्याएं आदि भयावह समस्याओं पर अगर वरिष्ठ नेताओं के इस तरह के बयान आएं तो समझना चाहिए कि हमारे नेताओं की ट्रेनिंग किस स्तर की है और आम जनता को लेकर क्या सोचते हैं.

वे जनता के चुने हुए नुमाइंदे हैं और उन्हें देश का शासन चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

लोगों की आम-फहम परेशानियों में शरीक होने की बात तो जाने दीजिए, वे किसी की मौत का मखौल उड़ाने में सड़कछाप लंपटों को भी मात देते हैं.

लोकतंत्र को लेकर हमारे नेताओं की समझ कैसी है कि वे मौतों को भी तर्कसंगत ठहराने की हिम्मत कर पाते हैं? लोकतंत्र में राज्यजनित कारणों से हुई मौतें भी तर्कसंगत कैसे हो सकती हैं!

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