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तौकीर रज़ा की रज़ामंदी का क्या मतलब है?

बरेलवी पंथ के रहनुमा तौकीर रज़ा ने पिछले चुनाव में भी अपने प्रत्याशी खड़े किए थे

Updated On: Feb 11, 2017 12:23 PM IST

Amitesh Amitesh

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तौकीर रज़ा की रज़ामंदी का क्या मतलब है?

'हमारा अज्मे सफर कब किधर का हो जाए, ये वो नहीं जो किसी रह गुजर का हो जाए.

उसी को जीने का हक है इस जमाने में, जो दिखे इधर का और उधर का हो जाए.’

मशहूर शायर वसीम बरेलवी की ये शायरी मौजूदा दौर की सियासत पर सटीक बैठती है. ये चंद शब्द आज के सियासतदानों को आईना दिखाते हैं. लेकिन, जोड़-तोड़ और समीकरण बैठाने में लगे हमारे रहनुमाओं को आईना देखने की फुर्सत कहां.

अब तो नवीर-ए-आला हजरत(दरगाह-ए-आला हजरत के नवासे) तौकीर रज़ा भी खुलकर सियासत के मैदान में अपनी किस्मत आजमाने में लगे हैं. हालांकि, ये पहला मौका नहीं है, इसके पहले भी तौकीर रज़ा ने अपनी पार्टी बनाकर सियासत में भी अपनी पैठ बनाने की पूरी कोशिश की है.

मौलाना-तौकीर रजा की पार्टी इत्तेहाद-ए-मिल्लत-काउंसिल (आईएमसी) इस बार भी यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी मौजूदगी का एहसास कराना चाहती है. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बातचीत में तौकीर रज़ा कहते हैं कि हम इस बार चुनिंदा सीटों पर ही चुनाव लड़ रहे हैं और हमारी कोशिश है कि किसी भी कीमत पर फिरकापरस्त ताकतों को कोई फायदा न हो.

भले ही पूरे प्रदेश में आईएमसी पचास से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कर रही हो, लेकिन, इस बार अपने प्रभाव वाले बरेली में 9 में से 5 सीटों पर ही चुनाव मैदान में है.

2012 में एक सीट पर मिली थी कामयाबी

taukir raza

इसके पहले 2012 के विधानसभा चुनाव के वक्त आईएमसी ने करीब दस सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें भोजीपुरा सीट पर उसको कामयाबी मिली थी. लेकिन, बरेली की दूसरी सीटों पर मुस्लिम वोटों के विभाजन से फायदा बीजेपी को हो गया था. बीजेपी ने यहां 3 सीटें जीती थीं.

लेकिन, इस बार तौकीर रजा अपने दामन पर लगे वोटकटवा के तमगे को हटा देना चाहते हैं. शायद यही वजह है कि इस बार बरेली में दो हिंदू और एक सिख उम्मीदवार को उन्होंने मैदान में उतार दिया है.

बरेली के कारोबारी पवन अग्रवाल कहते हैं कि पिछली बार तौकीर रज़ा की पार्टी के अलग चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोटों का विभाजन हो गया था, लेकिन, इस बार हालात कुछ अलग हैं.

मतलब साफ है कि अगर आईएमसी के हिंदू उम्मीदवार बरेली की सीटों पर कुछ वोट लेते हैं तो इससे नुकसान बीजेपी का ही होगा. लेकिन, खुद तौकीर रज़ा इस बात से इनकार करते हैं.

उनका कहना है कि जब गठबंधन की सरकार बने और हमारी जैसी छोटी पार्टियों के सहयोग से हिलती-डुलती सरकार बने तो मुसलमानों का काम इसमें ज्यादा होगा, उनका भला होगा.

अल्पसंख्यकों का मत है जुदा

सबसे बड़ा सवाल है कि जिस बरेलवी पंथ को मानने वालों के रहनुमा बनकर तौकीर रज़ा ताल ठोंक रहे हैं, उस पंथ के लोग क्या उनके साथ पूरी तरह से खड़े हैं? बरेली के रहने वाले एक छोटे कारोबारी मुख्तार अली कहते हैं कि हमें तो अखिलेश ही पसंद है. हम तो उन्हें ही वोट करेंगे.

बरेली जिले में मुस्लिम वोट बैंक की अहमियत ज्यादा है. बरेली में लगभग 35 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. इसी वजहु से इस बार बीएसपी ने 4 और एसपी ने 2 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.

ऐसी सूरत में तौकीर रज़ा मामले को चौतरफा बनाने की कोशिश में हैं. भले ही खुद के बल बूते कुछ बड़ा उलट-फेर न कर पाएं लेकिन, तौकीर रज़ा कई सीटों पर इस बार सभी पार्टियों का खेल बिगाड़ सकते हैं.

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