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चुनावों में बीजेपी के लिए कितना कारगर साबित होगा मोदी का चेहरा?

जब मुख्यमंत्री चुनने की बारी आती है तो लोग अखिलेश यादव या मायावती का नाम पहले लेते हैं

Sreemoy Talukdar Updated On: Feb 17, 2017 09:11 PM IST

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चुनावों में बीजेपी के लिए कितना कारगर साबित होगा मोदी का चेहरा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वक्त बेहद व्यस्त हैं. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. प्रचार के लिए प्रधानमंत्री मोदी, रोजाना किसी न किसी राज्य का दौरा कर रहे हैं. चुनावी रैलियां कर रहे हैं.

उत्तराखंड में प्रचार खत्म होने से पहले, पीएम मोदी ने शुक्रवार को हरिद्वार में रैली की. शनिवार को वो पिथौरागढ़ गए. रविवार को मोदी ने श्रीनगर और रुद्रपुर में जनसभाएं कीं. यानी तीन दिन में पीएम मोदी ने उत्तराखंड में चार रैलियां कीं.

इसी तरह यूपी में दूसरे दौर के प्रचार के आखिरी दिन यानी सोमवार को, पीएम मोदी लखीमपुर में एक और रैली की. यूपी में सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. दूसरे दौर में 11 जिलों की 67 सीटों पर मतदान 17 फरवरी को हुआ.

मोदी के सहारे यूपी में बीजेपी का बेड़ा 

यूपी में हर दौर के चुनाव से पहले पीएम मोदी कम से कम दो रैलियां कर रहे हैं. यानी अकेले यूपी में ही पीएम मोदी 14 से ज्यादा जनसभाएं कर रहे हैं. इसके अलावा उन्होंने पंजाब और गोवा में भी चुनाव प्रचार किया था.

2015 के बिहार चुनाव में बीजेपी ने प्रधानमंत्री मोदी की 30 रैलियां आयोजित कीं. फिर भी पार्टी चुनाव हार गई. इस बार पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी पीएम मोदी की बिहार से कम रैलियां करा रही है. हालांकि फर्क बहुत ज्यादा नहीं.

बिहार में बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह किसी लोकप्रिय स्थानीय नेता की कमी बताई गई थी. यानी 2014 की मोदी लहर बिहार चुनाव के आते-आते खत्म हो गई थी. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की निजी लोकप्रियता अभी भी बरकरार है.

लेकिन बिना मुख्यमंत्री पद के किसी चेहरे और अच्छे स्थानीय उम्मीदवारों की कमी की भरपाई, अकेले मोदी की लोकप्रियता से नहीं हो सकती. जनता स्थानीय स्तर पर भी अच्छे प्रत्याशी चाहती है. वो चाहती है कि ऐसे जनप्रतिनिधि हों जो स्थानीय समस्याओं पर ध्यान दे सकें, उनकी सुनें.

राष्ट्रीय लहर से कब तक चलेगा काम 

हर बार राष्ट्रीय स्तर की लहर से किसी भी दल का काम नहीं चलने वाला. फिर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जनता का मूड भी अलग होता है. बिहार और दिल्ली में हार से बीजेपी को ये सबक मिला है कि सिर्फ पीएम मोदी की लोकप्रियता पर भरोसा करना उसके लिए नुकसानदेह हो सकता है.

सीनियर पत्रकार आर. जगन्नाथन ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा था, 'हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में जीत से बीजेपी को लगा कि सिर्फ मोदी की लोकप्रियता से वो बिखरे विपक्ष को मात दे सकती है. मगर 2014 के बाद बीजेपी एक भी राज्य में बिना स्थानीय नेता के चेहरे के चुनाव नहीं जीत सकी है.'

उन्होंने आगे लिखा कि 'दिल्ली और बिहार में पार्टी की बुरी तरह हार हुई. वहीं असम में स्थानीय नेता सर्वानंद सोनोवाल को प्रोजेक्ट करके बीजेपी ने जीत हासिल की. यूपी की जनता को पता है कि अगर वो समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन को वोट देगी तो अखिलेश यादव सीएम बनेंगे. बीएसपी को वोट देगी तो मायावती मुख्यमंत्री होंगी. बीजेपी के बारे में उसे पता ही नहीं कि जीत के बाद किस नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा'

बीजेपी में सर्वमान्य स्थानीय नेताओं की कमी 

बीजेपी के बारे में ये समीक्षा काफी हद तक सही है. पंजाब में पार्टी, अकाली दल की जूनियर सहयोगी है. गोवा में मतदाताओं को लुभाने के लिए पार्टी ने मनोहर पर्रिकर के वापस गोवा की राजनीति में आने का लॉलीपॉप दिखाया है.

उत्तराखंड में बीजेपी के पक्ष में माहौल है, लेकिन मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार पार्टी ने घोषित नहीं किया है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी के पास कई नेता हैं. जैसे योगी आदित्यनाथ, उमा भारती, कलराज मिश्र या प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य.

इन सभी नेताओं की कुछ खास इलाकों में भले ही अच्छी पैठ हो, प्रदेश स्तर पर ये अखिलेश यादव या मायावती के कद के नेता नहीं हैं. यूपी में अमित शाह भी खूब प्रचार कर रहे हैं. लेकिन अमित शाह एक रणनीतिकार ज्यादा हैं, जननेता कम.

साफ है कि स्थानीय कद्दावर नेतृत्व के मामले में बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं. बीजेपी के मुकाबले समाजवादी पार्टी या बीएसपी, दोनों ने मोदी की ही तरह का प्रचार अभियान छेड़ा हुआ है.

यही वजह है कि तमाम ओपिनियन पोल में मतदाताओं की पहली पसंद बीजेपी है. मगर जब मुख्यमंत्री चुनने की बारी आती है तो लोग अखिलेश यादव या मायावती का नाम पहले लेते हैं.

यही वजह है कि बीजेपी को मुकाबले में अपने सबसे ताकतवर हथियार यानी नरेंद्र मोदी के चेहरे का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ रहा है. हालांकि बिहार से सबक लेते हुए पार्टी ने इस बार यूपी में पीएम मोदी की रैलियों की तादाद कम ही रखी है.

हार से ब्रांड मोदी पर आ सकता है संकट  

इसकी वजह है कि पार्टी को पता है कि यूपी जैसे राजनीतिक तौर पर बेहद पेचीदा सूबे में सिर्फ मोदी के बूते चुनाव नहीं जीता जा सकता. और पार्टी हार की सूरत में ब्रांड मोदी को बचाना चाहेगी.

पार्टी यूपी में अपनी तमाम होर्डिंग्स में मोदी को सबसे बड़े चेहरे के तौर पर पेश करती है. स्थानीय नेता, मोदी के आगे बौने नजर आते हैं. यानी बिहार वाला फॉर्मूला यहां दोहराने की कोशिश हो रही है. बीजेपी के लिए ऐसा करना मजबूरी है.

बीजेपी की ये मजबूरी समझ में आती है. मोदी स्टार प्रचारक हैं. मगर उन पर ज्यादा से ज्यादा निर्भरता से बीजेपी का सबसे अलग पार्टी होने का दावा गलत साबित होता है.

यूपी की गंगोह विधानसभा में एक मतदाता ने लाइवमिंट के ज्ञान वर्मा को बताया कि, 'अगर मोदी के नुमाइंदे के तौर पर कोई खाली कुर्सी भी चुनाव में उतरेगी, तो वो उसको ही वोट दे देंगे. मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं. लोगों ने 2014 में उन्हें वोट दिया था. वो समर्थन अब भी बरकरार है. यूपी में बढ़ते अपराध और पुलिस की नाकामी की वजह से लोग अखिलेश यादव से नाराज हैं'

वहीं मेरठ के किठौर में एक रैली कवर करने गईं इकनॉमिक टाइम्स की ज्योति मल्होत्रा ने लिखा कि, 'बीजेपी के कई युवा समर्थक केसरिया टोपी लगाए हुए थे और मोदी मोदी के नारे लगा रहे थे, जबकि उन्हें मालूम था कि रैली में राजनाथ सिंह आ रहे हैं, मोदी नहीं.'

शिखर पुरुष मोदी के आगे बौने हुए क्षत्रप 

बीजेपी की ये दिक्कत संगठनात्मक है. 2014 में शानदार जीत से मोदी बीजेपी के सबसे बड़े नेता बन गए. इस जीत से बीजेपी की चाल-ढाल भी बदल गई. पहले जहां पार्टी में कई नेता बराबरी के कद वाले होते थे.

वहीं 2014 की जीत से बीजेपी का हाल भी कांग्रेस वाला हो गया, जहां शिखर पर सिर्फ एक नेता है, नरेंद्र मोदी. इससे पार्टी की ताकत भी एक ही शख्स यानी मोदी के हाथ में आ गई. पार्टी के पास अभी भी वसुंधरा राजे, शिवराज चौहान और रमन सिंह जैसे ताकतवर क्षेत्रीय नेता हैं. मगर इनमें से कोई भी लोकप्रियता में मोदी के आस-पास नहीं ठहरता.

2014 की जीत से एक बात साफ हुई कि एक कद्दावर नेता होने के कई फायदे हैं. इससे पार्टी के भीतर बगावत पर लगाम लगी रहती है. खास तौर से बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी में तो ऐसा होना बेहद जरूरी है.

अपने करीब तीन साल के राज में पीएम मोदी ने 'सबका साथ-सबका विकास' के नारे पर काफी जोर दिया है. पार्टी की राजनीति अब विकास पर केंद्रित है. मोदी, पार्टी के उन नेताओं पर लगाम लगाने पर भी कामयाब हुए हैं, जो विकास के एजेंडे से भटककर संप्रदाय और जाति की राजनीति करने लगते हैं.

आज बीजेपी दक्षिणपंथी पार्टी के बजाय बीच का रास्ता निकालने वाली यानी सेंट्रिस्ट पार्टी लगती है. और जिस तरह मोदी बार-बार गरीबों की बात करते हैं उससे कई बार तो बीजेपी के वामपंथी धारा का दल होने का भी एहसास होता है.

फिलहाल बीजेपी में मोदी का विकल्प नहीं 

हमारे देश में सिविल सोसाइटी की ताकत सरकार से ज्यादा है. मगर पीएम मोदी ने अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए सामाजिक बराबरी पर जोर दिया है. वो राजनीति को जाति और समुदाय से परे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं और काफी हद तक कामयाब भी हुए हैं.

लेकिन पिछले तीन सालों में बीजेपी का अंदरूनी लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ है. शिवराज चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह जैसे स्थानीय क्षत्रप आज अपने ही इलाकों में सिमटकर रह गए हैं. जिन राज्यों में बीजेपी के पास स्थानीय नेताओं की पहले से ही कमी थी, वहां कोई नया नेता भी नहीं उभर सका है.

मोदी का कद बड़ा होने से आज बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी दिखती है. बिना मोदी के करिश्मे और लोकप्रियता के पार्टी का काम नहीं चल पा रहा है. मगर ऐसा करके बीजेपी किसी और नेता के उभरने की संभावनाएं भी खत्म कर दे रही है.

शायद इस हालात में यूपी के नतीजे आने के बाद बदलाव हो. मगर इसके लिए हमें 11 मार्च तक इंतजार करना होगा.

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