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मोदी को हराने के लिए मतभेद भुलाने को कितना तैयार है विपक्ष

Updated On: Mar 10, 2018 03:35 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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मोदी को हराने के लिए मतभेद भुलाने को कितना तैयार है विपक्ष

चुनावी इतिहास अपने को 30 साल बाद दोहराने जा रहा है. सियासत के मैदान के दो दुश्मन जिनके बीच का भेद किसी वक्त अमिट जान पड़ रहा था आज एक-दूसरे को गलबहियां डालने को तैयार हैं. देश की राजनीति में एक बार फिर से 1988 का मुकाम आ गया है.

नरेंद्र मोदी की सरकार से टीडीपी का दामन छुड़ाना कुछ हफ्ते पहले शुरू हुए सियासी ड्रामे का अगला अध्याय है. यह सियासी ड्रामा जिस वक्त शुरू हुआ उस समय घटनाएं बहुत टूटी-बिखरी थीं, उनके बीच ऐसा तालमेल ना था कि कोई मुकम्मल तस्वीर उभरकर सामने आती. लेकिन अब तस्वीर साफ नजर आने लगी है.

मोदी को सत्ता से हटाने में एक-दूसरे के मददगार हो सकते हैं

अब यह बिल्कुल साफ है कि 1989 की ही तरह एक-दूसरे के कट्टर विरोधी आपसी भेद भुलाकर एकजुट होंगे और बीजेपी से दो-दो हाथ करेंगे. मायावती, मुलायम सिंह, चंद्रशेखर राव, एन चंद्रबाबू नायडू, लालू यादव और उनके बेटे, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और कुछ अन्य नेता बीजेपी के खिलाफ एक गठबंधन के रुप में एकजुट हो सकते हैं या फिर मोदी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने में एक-दूसरे के मददगार हो सकते हैं.

चंद्रबाबू नायडू-नरेंद्र मोदी

आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर टीडीपी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से हट गई है

उभरती हुई इस तस्वीर का एक जाहिर सा नक्श यह है कि साझेदारी का स्वरुप अखिल भारतीय स्तर का नहीं भी हो सकता है. मतलब, मुमकिन है कि गठबंधन एक नहीं बल्कि एक से ज्यादा बने. मोदी के प्रतिद्वंद्वी अलग-अलग रुपों में एकजुट हो सकते हैं. वो अलग-अलग सूबों और इलाकों के हिसाब से साझा कायम कर सकते हैं और ऐसा कर के बीजेपी को पटखनी देने की बेहतर संभावना तलाश सकते हैं. वो अपनी सोच को राष्ट्रीय रखते हुए बिल्कुल मुकामी तौर पर कदम उठा सकते हैं.

बीएसपी और एसपी उत्तर प्रदेश में अपने बीच की दूरियां पहले ही मिटा चुके हैं. गोरखपुर और फूलपुर में लोकसभा के उपचुनाव हो रहे हैं और इन सीटों पर यह दोनों पार्टियां एकजुट होकर लड़ाई के मैदान में हैं. एक वक्त ऐसा भी था जब यह कल्पना कर पाना मुश्किल था कि बीएसपी के कार्यकर्ता एसपी के उम्मीदवार के लिए घर-घर वोट मांगने जाएंगे लेकिन इस बार दोनों पार्टियां छोटी-छोटी दो पार्टियों के साथ मिलजुल कर काम कर रही हैं.

उभरते हुए इस मंजर में टीडीपी के पास विकल्प बहुत सीमित है

गठबंधन की एक और संभावना टीडीपी और कांग्रेस के बीच साझी कोशिशों की बनती दिख रही है. विशेष राज्य के दर्जे के सवाल पर टीडीपी ने बीजेपी से नाता तोड़ा है और जब तक यह मांग पूरी नहीं हो जाती, टीडीपी के एनडीए में आने की संभावना नहीं दिख रही. टीडीपी के हाथ इसलिए भी बंधे हुए हैं क्योंकि प्रतिद्वंद्वी जगनमोहन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के सवाल पर सख्त रुख अपना रखा है. वायएसआर कांग्रेस के नेता धमकी दे रहे हैं कि आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिला तो वो मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लायेंगे. उभरते हुए इस मंजर में टीडीपी के पास विकल्प बहुत सीमित है.

कांग्रेस पहले ही टीडीपी की मांग का समर्थन कर चुकी है. दोनों पार्टियां बीते वक्त में एक-दूसरे की कट्टर दुश्मन रही हैं लेकिन बहुत मुमकिन है इस बार अपने मतभेद भुलाकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एकजुट होकर चुनावी अखाड़े में उतरें और दोनों राज्यों में एक-दूसरे को अपनी ताकत से मजबूत बनाएं. आंध्र प्रदेश में तो खैर उग्र और आक्रमक होते जगमोहन रेड्डी को सत्ता से बाहर रखने के लिए दोनों के सामने एकमात्र रास्ता यही है.

Jagan Mohan Reddy

आंध्र प्रदेश के स्पेशल स्टेटस को लेकर जगन मोेहन रेड्डी के राजनीतिक दांव से चंद्रबाबू नायडू की मुश्किलें बढ़ गई हैं

कई और राज्यों में इसी तर्ज पर साझा कायम हो सकता है. ऐसे राज्यों में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र का भी नाम लिया जा सकता है जहां कांग्रेस और एनसीपी के बीच पहले ही गठबंधन बन चुका है. तमिलनाडु में बीजेपी ने द्रविड़ आंदोलन के विचारक पेरियार को निशाने पर लेकर मानो जलती हुई आग पर पांव रख दिया है. बीजेपी के इस गलत कदम से अब वहां कोई भी पार्टी उससे दूर का भी नाता नहीं रखने वाली. बड़ी संभावना इसी बात की है कि 2019 में बीजेपी के मुकाबिल पार्टियों का एक व्यापक साझा मंच बने.

वर्ष 2019 में चुनावी मुकाबला दो ध्रुवीय हो जाएगा

इसका मतलब है हर राज्य में बीजेपी को एक ताकतवर क्षेत्रीय गठबंधन का सामना करना होगा. यह गठबंधन या तो स्थानीय पार्टियों के बीच बनेगा या फिर इसमे कांग्रेस का साथ होगा. अगर ऐसा होता है तो भारत का चुनावी मानचित्र 2019 में अलग दिख पड़ेगा जहां मोदी के प्रतिद्वंद्वी बीजेपी-विरोधी वोटों को गोलबंद करने के लिए हाथ मिला रहे होंगे और ऐसी सूरत में चुनावी मुकाबला दो ध्रुवीय हो जाएगा.

आइए देखते हैं कि बड़े राज्यों में क्या तस्वीर उभर सकती है और कैसे इनमें से ज्यादातर सूबे सीधी चुनावी लड़ाई के मैदान में तब्दील हो सकते हैं. बहुत संभव है, यूपी मे बीजेपी को बीएसपी-एसपी गठबंधन का मुकाबला करना पड़े और कांग्रेस इस गठबंधन में सहायक की भूमिका निभाए या फिर वह हाशिए पर हो जाएगी. पश्चिम बंगाल में टीएमसी और कांग्रेस हाथ मिला सकते हैं. असम में कांग्रेस एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन बना सकती है. बिहार में आरजेडी और कांग्रेस का गठबंधन जारी रह सकता है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और पंजाब में चुनावी लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच होगी (पंजाब में बीजेपी नहीं बल्कि अकाली मुख्य प्रतिद्वंद्वी साबित हो सकते हैं).

बड़े राज्यों में मात्र दिल्ली (आप, बीजेपी, कांग्रेस), ओडिशा (बीजेडी, बीजेपी, कांग्रेस), महाराष्ट्र (कांग्रेस-एनसीपी, शिवसेना, बीजेपी), कर्नाटक (कांग्रेस, जेडीएस, बीजेपी) और तेलंगाना में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार नजर आ रहे हैं. आंध्र प्रदेश में चुनावी मुकाबले के एतबार से अभी सारे विकल्प खुले हुए हैं. यहां टीडीपी-कांग्रेस आपसे में हाथ मिला सकते हैं, वायएसआर कांग्रेस बीजेपी के साथ जा सकती है या फिर सारी पार्टियां स्वतंत्र रुप से चुनाव लड़ सकती हैं.

यूपी में हो रहे उपचुनावों में बीजेपी को मात देने के लिए मायावती और अखिलेश यादव ने हाथ मिला लिया है

यूपी में 2 संसदीय सीटों के उपचुनावों में बीजेपी को मात देने के लिए मायावती और अखिलेश यादव ने हाथ मिलाया है

2014 जैसा प्रदर्शन दोहराने के लिए बीजेपी को बहुत ज्यादा दमखम दिखाना होगा

विपक्ष के एकजुट होकर लड़ने की सूरत में वोटों का बंटवारा किस रुप में सामने आएगा, यह सिर्फ आने वाला वक्त बता सकता है. लेकिन चूंकि बीजेपी ने पिछला चुनाव मात्र 31 फीसदी वोट हासिल कर जीता था सो चुनावी प्रतिद्वंद्वियों के एकजुट होने की सूरत में बीजेपी को इससे ज्यादा तादाद में वोट लाने होंगे. चूंकि बीजेपी का मुकाबला राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र में नए सिरे से ताकत हासिल करती कांग्रेस से होना है और इन्हीं राज्यों में बीजेपी को 2014 में एकतरफा जीत मिली थी. इसलिए उसे लोकसभा की सीटों के एतबार से 2014 का अपना प्रदर्शन दोहराने के लिए बहुत ज्यादा दमखम दिखाना होगा.

साल 1989 में प्रतिद्वंद्वियों के ऐसे ही जमावड़े- बीजेपी, जनता दल और लेफ्ट ने अपने भेद भुलाकर पूरे देश में सीटों पर तालमेल कायम किया, गठबंधन बनाया और राजीव गांधी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. बहुत मुमकिन है, अगले चुनाव में फिर से ऐसा ही प्रयोग दोहराया जाए.

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