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नारायण दत्त तिवारी को कितना स्वीकार कर पाएगी बीजेपी ?

नारायण दत्त तिवारी के बहाने बीजेपी की नजर यूपी में ब्राह्मण वोटरों को अपने साथ करने की है

Updated On: Jan 18, 2017 06:21 PM IST

Vinod Verma

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नारायण दत्त तिवारी को कितना स्वीकार कर पाएगी बीजेपी ?

यह सही-गलत का सवाल नहीं है. यह दो गलत का सवाल है. बस तय करना है कि कौन सा गलत बड़ा है.

नारायण दत्त तिवारी का भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होना ठीक वैसा ही है.

एक ओर 91 वर्ष के नारायण दत्त तिवारी हैं. वे राजनीति में जितने विख्यात, निजी जीवन में उतने ही कुख्यात हैं.

वे एक ऐसे जादूगर की तरह रहे हैं जो अपनी काली टोपी से कभी भी कुछ भी निकालकर दर्शकों को चौंका सकता है. हर बार एक नया कारनामा.

राजभवन की रासलीला का वीडियो देखकर लोगों को लगा कि यह उनके जीवन का अंतिम कारनामा है. लेकिन अदालत डीएनए टेस्ट पर अड़ गई और एक नई करतूत सामने आ गई. 86 वर्ष की उम्र में देश भर के लोगों ने उन्हें बाप बनने की बधाई दी.

ND Tiwari

एन डी तिवारी लंबे समय तक कांग्रेस में रहने के बाद यूपी चुनाव के पहले बीजेपी में शामिल हो गए

बेटे की खातिर बीजेपी में शामिल

तब लोगों को लगा कि यह जरूर आखिरी कारनामा है लेकिन सफेद टोपी से फिर एक नया कारनामा निकला. वे बीजेपी में शामिल हो गए. अपनी खातिर नहीं, चार साल पहले मिले अपने बेटे के लिए. वरना वे तो यूं भी समाजवादी पार्टी की गोद में समाए हुए थे.

अब कांग्रेस, राहुल गांधी की कांग्रेस हो चली है. यकीनन वहां रोहित शेखर के लिए कोई आश्वासन नहीं मिला होगा. न उत्तर प्रदेश में, न उत्तराखंड में. इसलिए नारायण दत्त तिवारी ने यह कठिन फैसला लिया होगा.

लेकिन नारायण दत्त तिवारी उस बीजेपी में शामिल हुए जिसमें लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मुरली मनोहर जोशी तक कई बुजुर्ग और तजुर्बेकार नेता हाशिए पर पड़े हुए हैं. क्षुब्ध और दुख झेलते.

ब्राह्मण वोटरों पर नजर

आडवाणी और जोशी इसलिए दरकिनार कर दिए गए कि उनकी उम्र बहुत हो गई है. इसलिए वे मार्गदर्शक मंडल में रहें. यानि सक्रिय राजनीति में उनकी जरूरत को नरेंद्र मोदी की बीजेपी ने खत्म मान लिया.

लेकिन नरेंद्र मोदी की उसी बीजेपी ने नारायण दत्त तिवारी को गोद ले लिया. जो आडवाणी से उम्र में दो साल और जोशी से नौ साल बड़े हैं.

नारायण दत्त तिवारी अपने समय के कद्दावर ब्राम्हण नेता हैं.

नारायण दत्त तिवारी अपने समय के कद्दावर ब्राम्हण नेता रहे हैं

क्या नरेंद्र मोदी की बीजेपी बदल गई है? नोटबंदी की ऐतिहासिक गलती और समाजवादी पार्टी - कांग्रेस के संभावित गठबंधन ने क्या चतुर रणनीतिकार अमित शाह को इतना हिला दिया कि उनका दृष्टिकोण बदल गया?

पता नहीं नारायण दत्त तिवारी के साथ कितने ब्राह्मण या गैर ब्राह्मण वोट हैं. जिनके लिए बीजेपी ने इतना बड़ा निर्णय लिया.

हो सकता है कि नारायण दत्त तिवारी का कांग्रेस छोड़ना और बीजेपी में शामिल होना, अखबारों में एक दिन की सुर्खियां दिला दे. लेकिन आखिर में उसकी गोद में एक ऐसा मार्गदर्शक मिलेगा जो बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद अपने प्रधानमंत्री नरसिंह राव से झगड़कर, अर्जुन सिंह के साथ कांग्रेस (तिवारी) बनाने निकल गया था.

कैसे बर्दाश्त करेंगे दोनों एक दूसरे को?

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