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मोदी का अडानी या अंबानी समर्थक होना सच से ज्यादा कल्पना है!

राहुल गांधी के हिसाब से नोटबंदी की योजना देश के बड़े व्यापारियों के फायदे के लिए है

Updated On: Dec 26, 2016 06:52 PM IST

Prakash Nanda

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मोदी का अडानी या अंबानी समर्थक होना सच से ज्यादा कल्पना है!

बीते गुरुवार को रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर हथियारों की खरीद फरोख्त और उसकी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर अपने अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे. ठीक उसी समय दिल्ली और विदेशों में रह रहे सुरक्षा मामलों के जानकार उम्मीद कर रहे थे कि आज की बैठक में केंद्र सरकार उस फैसले पर मुहर लगा देगी जिसके जरिए अंबानी और अडानी ग्रुप के लिए सामूहिक तौर पर रक्षा उद्योग पर पकड़ मजबूत करने का रास्ता साफ हो जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

इस समय सिर्फ टाटा, महिंद्रा और एलएनटी ही वो कंपनियां हैं, जिनकी भारतीय रक्षा उद्योग में कुछ अहम भूमिका है. हालांकि, ये आम राय बनी हुई है कि नरेंद्र मोदी सरकार में अंबानी और अडानी की तूती बोलती है लेकिन सच्चाई ये है कि इस रेस में दोनों काफी पीछे हैं.

धारणाएं अक्सर हकीकत से अलग होती हैं. पर राजनीति में धारणाएं अक्सर हकीकत से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं. यही वो कारण है कि जब आप राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को ध्यान से सुनें तो पाएंगे कि जब से नरेंद्र मोदी ने पीएम का पद संभाला है, तब से इस देश मे जो कुछ भी किया जा रहा है वो अडानी और अंबानी जैसे उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है. वो भी देश के गरीबों की कीमत पर .

अगर राहुल गांधी की बातों पर यकीन करें तो उनके हिसाब से डिमोनेटाइजेशन यानि कि नोटबंदी की पूरी योजना ही देश के बड़े व्यापारियों को फायदा दिलाने के लिए की गई है. अपनी हर पब्लिक रैली में राहुल गांधी बार-बार जिस एक बात पर जोर देते हैं, वो ये कि मोदी की सरकार सूट-बूट की सरकार है, जिसका मतलब ये कि ये पूंजीवादियों की सरकार है.

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी भी गरीबों के प्रति अपनी चिंता जताने का कोई मौका नहीं चूकते. वे लगभग अपने हर भाषण में गरीबों के लिए शुरू और चलाई जा रही अनेक योजनाओं की जानकारी देने से नहीं चूकते. फिर चाहे वो जनधन योजना हो या स्वच्छ भारत या फिर नमामि गंगे अभियान.

इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि ये सभी बहुत ही महत्वकांक्षी योजनाएं हैं और जैसा कि समाज विज्ञानी प्रताप भानु मेहता ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है, कि शानदार होने के बावजूद ये योजनाएं बहुत ही खराब तरीके से लागू की गई हैं. इनका नतीजा क्या निकलकर आता है, ये अलग मुद्दा है. लेकिन मुख्य बात ये है कि मोदी सरकार अमीरों की पैरोकार सरकार नहीं है जैसा राहुल गांधी या अरविंद केजरीवाल दावा करते हैं.

बीजेपी का पलटवार  

PM Narendra Modi

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, विपक्षी दलों के इन्हीं दावों और ‘अडानी-अंबानी की सरकार’ जैसे आरोपों का जवाब देने के लिए बीजेपी ने कुछ जानकारियां और आंकड़े इकट्ठा किए हैं. जुटाई गई इन जानकारियों में ये बताया गया है कि साल 2005 से लेकर 2013 तक देश के विभिन्न कॉरपोरेट समूहों को दिए गए 36.5 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को, डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली दो यूपीए सरकारों ने माफ कर दिया था.

बीजेपी का ये कदम कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के उन आरोपों के बाद आया है, जिनमें उन पर कुछ खास कॉरपोरेट समूहों की कर्ज माफी का आरोप लगा था. बीजेपी ने अपने दिए गए आंकड़ों के जरिए ये बताने की कोशिश की है कि साल 2005-2013-14 तक ‘बैड-लोन’ 132 प्रतिशत से बढ़ गया है.

बीजेपी प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा के अनुसार, ‘एसबीआई बैंक ने साल 2012 में उद्योगपति विजय माल्या का ग्रुप अकाउंट फ्रीज कर दिया था, जब वे बैंक का 1450 करोड़ का कर्ज चुकाने में नाकाम रहे थे.’

हालांकि, माल्या को 1500 करोड़ का कर्ज दिया गया था. कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए बीजेपी कहती है, ‘अडानी, अंबानी और माल्या का जन्म पिछले ढाई सालों में नहीं हुआ था...ये उतने ही पुराने उद्योगपति हैं जितनी की कांग्रेस पार्टी. ये तब से फलफूल रहे हैं जब राहुल गांधी का जन्म भी नहीं हुआ था. इसलिए अगर ये औद्योगिक समूह भ्रष्ट हैं तो इनके फलने-फूलने के लिए बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस जिम्मेदार है. इसलिए इसके लिए पहली जवाबदेही उनकी बनती है.

बीजेपी के सवालों में दम है. उदाहरण के लिए केजी (कृष्णा-गोदावरी) बेसिन में गैस निकालने के लिए रिलायंस समूह ने अकूत पैसा लगाया है. हमें ये याद करना चाहिए कि कैसे मनमोहन सिंह सरकार में पेट्रोलियम मंत्री रहे वीरप्पा मोइली ने 2014 के चुनावों से ठीक पहले गैस की कीमत 4.2 डॉलर से बढ़ाकर 8-8.4 डॉलर करने का निर्णय लिया था.

ये दर प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट के हिसाब से है.

इसके उलट, मोदी सरकार ने रिलायंस ग्रुप पर हजारों करोड़ का जुर्माना लगाया है. (पहले 14000 करोड़ फिर बाद में 2500 करोड़, कम उत्पादकता के लिए) और 10311.76 करोड़ रुपए सरकारी कंपनी ओएनजीसी की, केजी बेसिन डीप वॉटर ब्लॉक से लगातार सात सालों तक गैस निकालने के लिए.

ये कंपनिया खुद पर लगाए गए इन जुर्मानों के खिलाफ कोर्ट भी जा सकते हैं, लेकिन मुख्य बिंदु ये है कि जिन कंपनियों पर मोदी का करीबी होने का आरोप लगता रहा है, उसपर एक के बाद एक कई तरह का जुर्माना भला कैसे लग सकता है?

और अब जबकि, ऐसी खबरें आ रहीं हैं कि भारत सरकार फिर से प्राकृतिक गैस की कीमत 5.05 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट से 18 प्रतिशत बढ़ा रही है. सरकार की ये योजना साल 2014 में आई थी और नए कायदे रिलायंस जैसे समूहों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं.

Gautam Adani

उद्योगपति गौतम अडानी और उनके बेटे करण अडानी

कांग्रेस के राज में फले-फूले       

अडानी ग्रुप की बात करें तो पाएंगे कि इसके प्रमोटर गौतम अडानी पिछले तीन सालों में कई बार प्रेस के सामने ये कह चुके हैं कि कैसे उनका बिजनेस साम्राज्य, देश में उदारवाद के आने के बाद के सालों में 1993 के नरसिम्हाराव के नेतृत्व वाली सरकार के शासन काल में फला-फूला है.

अडानी ने गुजरात में बंजर और अनुपजाऊ जमीन खरीदकर उन पर जहाजों को खड़ा करने के लिए बंदरगाहों का निर्माण किया. उन्होंने ये सब कुछ गुजरात के चिमनभाई पटेल और शंकरसिंह वाघेला के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकारों के दौरान किया.

अडानी के अनुसार, अपने व्यवसाय में उन्हें हर सरकार से मदद मिली है, फिर चाहे वो कांग्रेस की सरकार हो या बीजेपी की. अडानी के मुताबिक ये कहना भी गलत होगा कि एसबीआई बैंक ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया में अपना माइनिंग का व्यापार चालू करने के लिए 62000 करोड़ रुपए कर्ज में दिया है. (जहां उन्हें अभी एनवायरमेंटल क्लीयरेंस मिला है).

संयोग से, मोदी सरकार के आने के बाद रिलायंस और अडानी ग्रुप का मार्केट कैपिटलाइजेशन काफी कम हुआ है. सच्चाई ये है कि नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद अडानी समूह के मार्केट कैपिटलाइजेशन में 51 प्रतिशत की गिरावट आयी है. लेकिन इससे न तो मुकेश अंबानी की रिलायंस समूह न ही गौतम अडानी की कंपनी ने बैंक का कर्ज चुकाने के मामले में डिफॉल्टर साबित हुई हैं.

इस सबसे ये साबित होता है कि जिस तरह से एक खास मकसद के तहत मोदी सरकार और उद्योग जगत के बीच एक तरह के गलत संबंध होने की बात कही जा रही है वो पूरी तरह से गलत है. ये धारणाएं सच्चाई से कोसों दूर है जो इस पूरी प्रक्रिया में देश के विकास में बाधा पैदा करती है.

अगर उद्योगजगत पैसा बनाता है तो इसमें कुछ भी अनैतिक या गलत नहीं है, असल में ये देश के विकास, गरीबों की मदद और नौकरी पैदा करने के लिए काफी जरूरी है. बशर्ते कि ये टैक्स के नियमों का उल्लंघन न करता हो.

फिर सवाल ये उठता है कि हम ऐसा क्या करें कि नेताओं के इस तरह के झूठ और ऊलुल-जुलूल आरोपों का सामना कैसे करें? सच कहें तो इसका कोई आसान जवाब भी हमारे जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के पास मौजूद नहीं है. मेरी राय में- मीडिया इस दिशा में एक छोटी सी शुरुआत कर रहा है.

rahul modi

नोटबंदी के मुद्दे पर पीएम मोदी लगातार राहुल गांधी के निशाने पर हैं

कुछ यूरोपीय देशों में पत्र-पत्रिकाएं ‘पॉलिटीफैक्ट’ और ‘ट्रूथोमीटर’ के नाम से फीचर छापती हैं.

इन छपे हुए फीचर की कैटेगरी ‘ट्रू’ ‘मोस्टली ट्रू’ ‘फॉल्स’ ‘मोस्टली फॉल्स’ और ‘पैंट्स ऑन फायर’ की होती है. द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रेगुलर फीचर है जो ‘द फैक्ट चेकर’ के नाम से छपती है. लेकिन फिर, इन फीचर के खिलाफ वहां कुछ आलोचनाएं भी छपती हैं, जो कुछ हद तक सही भी होती हैं.

जो बात मैं यहां कहना चाहता हूं वो ये कि एक पत्रकार और विशेषज्ञ के पास तथ्य ढूंढने का एकाधिकार होता है. उदाहरण के तौर पर एक पत्रकार सिर्फ ये जानने में दिलचस्पी रखता है कि राहुल गांधी कितना सच बोल रहे हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी क्या बोल रहे हैं उसे वो पूरी तरह से खारिज कर देता है. इसका उल्टा भी बिल्कुल सच है.

लेकिन, फिर कुछ करना कुछ न करने से बेहतर है. ये पूरी तरह से मुमकिन है कि कोई भी व्यक्तिपरक आदमी जो राहुल का समर्थक हो वो सच को कल्पना से पूरी तरह से अलग कर देगा, और कोई दूसरा आदमी जो मोदी का समर्थक हो, वो उनके साथ भी ऐसा ही करेगा तो इससे सच और झूठ के बीच एक तरह का बैलेंस या तालमेल स्थापित होगा.

(डिस्क्लोज़र: फ़र्स्टपोस्ट हिंदी नेटवर्क 18 का हिस्सा है जिसका स्वामित्व रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के पास है. ये लेखक के निजी विचार हैं )

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