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2014-2018: कितने बदले राहुल गांधी, कितनी बदली कांग्रेस !

जिन राहुल गांधी के बारे में कभी सोशल मीडिया पर मजे लिए जाते थे लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनकी छवि में बदलाव आया है

Updated On: Feb 21, 2018 08:21 AM IST

Aparna Dwivedi

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2014-2018: कितने बदले राहुल गांधी, कितनी बदली कांग्रेस !

साल 2017 महीना अप्रैल स्थान 24 अकबर रोड—कांग्रेस का मुख्यालय. वैसे तो वहां वीराना पसरा रहता था लेकिन तब भी भूले बिसरे कुछ लोग पहुंच जाते थे. उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्टी की स्थिति पर विचार कर रहे थे और मीडिया के कुछ लोगों के आगे उस समय रहे कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का बचाव कर रहे थे. उत्तर प्रदेश का चुनाव ताजा ताजा हारे थे तब. जब पूछा गया कि अब क्या, तो उनका जवाब था कि देखिए राहुल गांधी तेजी से बदल रहे हैं और आप देखिएगा कि वो बहुत बढ़िया करेंगे. कब करेंगे ! तो उनका जवाब था कि हम 2019 के बारे में तो सोच ही नहीं रहे हैं हम 2024 की तैयारी कर रहे हैं.

लेकिन करीब एक साल बाद कांग्रेस पार्टी और उनके नए नवेले अध्यक्ष राहुल गांधी के तेवर ही अलग हैं. वही नेता अब 2019 में राहुल गांधी को संभावित प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं. कुछ तो दंगल के आमिर खान मार्का बोल रहे हैं हमारा छोरा अब बड़ा हो गया है.

साल 2014 में भारत की सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव का मतदान 12 मई को खत्म हो गया था. हालांकि नतीजे चार दिन बाद आने वाले थे लेकिन कांग्रेसी नेताओं के दिल में निराशा पहले ही घर कर चुकी थी लेकिन नतीजे आने के बाद तो जोर का झटका काफी जोर से लगा. कांग्रेस को मालूम था कि वो जीत नहीं रही है लेकिन पार्टी इतनी बुरी तरह से हारेगी ये तो उन लोगों ने भी नहीं सोचा था.

कांग्रेसियों ने चुनावों में करोड़ों रुपए लगाए और हार गए, कई की तो जमानत भी जब्त हो गई. ऐसे लोग जिन्होंने राजनीति में गंभीरता पूर्वक निवेश किया है, जिनके लिए यह शौकिया नहीं है, वे पार्टी नेतृत्व पर आगबबूला हो रहे थे. उनका गुस्सा सोनिया गांधी पर कम और राहुल गांधी पर ज्यादा था.

कांग्रेसी नेता सिर्फ ये यकीन चाहते थे कि कांग्रेस फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है. और ऐसा किए जाने के संकेत उन्हें सिर्फ राहुल गांधी से मिल सकते थे. लेकिन राहुल गांधी उस समय यूरोप की यात्रा या फिर ध्यान पर चले जाते थे. कांग्रेसियों में खुल कर हताशा दिखने लगी और आलम ये था कि राहुल के करीबी माने जाने वाले नेताओं ने ही उनके नेतृत्व पर सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए थे. इसका असर कांग्रेस के सहयोगी दलों पर भी पड़ा और तो और केरल में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने तो सीधे राहुल गांधी को ही जिम्मेदार ठहरा दिया था.

Parliament session

हालांकि उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी थीं लेकिन खराब तबीयत की वजह से वो सक्रिय राजनीति से दूर होती जा रही थीं और राहुल गांधी राजनीति में कम ही रुचि लेते थे. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद से प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल को 'अयोग्य राजकुमार' कहा था. कांग्रेस ने इसका जम कर विरोध किया लेकिन 14 के बाद विधानसभा में लगातार हार के बाद राहुल गांधी अपनी योग्यता साबित नहीं कर पाए.

आलम ये था कि कांग्रेस चुनावी रूप से सिकुड़ती जा रही थी. कांग्रेस पार्टी अब बिहार जैसे राज्य में चौथे पायदान पर है तो पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु समेत दिल्ली में वह तीसरे स्थान पर है. और बकौल कांग्रेस नेता जो कि पार्टी के इतिहास को लेकर इशारा करते थे कि अगर ये पार्टी किसी भी राज्य में तीसरे स्थान पर आ जाती है तो कभी भी वहां पर उभरती नहीं है. 2014 के बाद से विभिन्न विधानसभा चुनावों में, पार्टी तीसरे या चौथे स्थान पर रही है. पार्टी के मुख्य पक्षों में से एक दलित और अन्य पक्ष पार्टी से दूर चले गए हैं. आलम ये है कि कांग्रेस हाल के चुनाव के बाद तो कांग्रेस मात्र चार राज्यों में सिमट कर रह गई. पंजाब, मेघालय, मिजोरम और कर्नाटक. उसमें भी 2018 में कर्नाटक और मिजोरम में चुनाव होंगे.

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ऐसा नहीं था कि राहुल गांधी राजनीति से दूर हो गए थे. वो चुनाव में हिस्सा लेते थे, 2014 से पहले भी वो चुनावी रणनीति तैयार करने में लगे थे लेकिन उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी. साल 2017 के शुरुआत में पांच राज्यों - उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के चुनाव हुए. इनमें से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला तो पंजाब में कांग्रेस ने बाजी जीती. गोवा में किसी भी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत नहीं मिला है. कुल 40 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 17 सीटें गई हैं जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी को 13 सीटें ही मिली हैं.

मणिपुर में भी स्थिति गोवा जैसी ही है. वहां भी किसी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत नहीं मिला है. यहां सरकार बनाने के लिए कम से कम 31 सीटों की जरूरत है जबकि कांग्रेस को 28 सीटें मिली हैं और बीजेपी के खाते में 21 सीटें गई हैं.

मजे की बात थी कि कांग्रेस दोनों राज्यों गोवा और मणिपुर में ज्यादा सीटों के बावजूद सरकार नहीं बना पाई. बीजेपी ने कांग्रेस के हाथों से दोनों राज्यों को अपनी तरफ खींच लिया और सरकार बना ली. बीजेपी की इस झपटमारी के पीछे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दबे-दबे स्वरों में पार्टी में नेतृत्व का सही समय पर निर्णय ना लेना बताते है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि राहुल गांधी आंधी की तरह आते हैं और वैसे ही गायब हो जाते हैं. राजनीति में लगातार काम करने की जरूरत है जो राहुल नहीं करते. वो कुछ ही रोड शो करते हैं, और बार-बार ब्रेक लिया करते हैं, और यही अनकन्सिस्टेंसी है, जो बहुत बड़ा मुद्दा रही है.

दूसरा वो सवालों के जवाब देने से हिचकते थे, लेकिन कांग्रेस में अचानक ही उम्मीद की किरण जगी. लोगों के सामने हिचकिचाते हुए राहुल गांधी जब अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय गए तो उनका अंदाज-ए-बयां ही अलग था. उन्होंने वहां के छात्रों से बात की और माना कि साल 2012 के आसपास कांग्रेस दंभ में चूर थी, इसलिए काफी नुकसान उठाना पड़ा. राहुल गांधी ने बोला कि जनता से संवाद कम हो गया था और इसका नुकसान हमें उठाना पड़ा.

rahul gandhi

बर्कले में भाषण के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अच्छा वक्ता होने की बाकायदा तारीफ की. राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी काफी अच्छे वक्ता हैं, वह जानते हैं कि भीड़ में जो तीन-चार तरह के अलग-अलग समूह हैं उन तक संदेश को कैसे पहुंचाया जाए. साथ ही उन्होंने मोदी पर चुटकी भी ली और कहा कि मोदी जी अपने पार्टी के लोगों की नहीं सुनते. हालांकि बीजेपी भी शुरुआती दौर में राहुल गांधी पर यही आरोप लगाती थी.

बर्कले के बाद राहुल गांधी जब हिंदुस्तान वापस आए तो वही अंदाज अपने साथ लेकर आए. और इस बार उन्होंने बीजेपी को उसके गढ़ में चुनौती दी. गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में राहुल गांधी काफी अलग नजर आए. उत्तर प्रदेश में रैली करने वाले राहुल गांधी और गुजरात में मंदिर के दर्शन करने वाले राहुल गांधी में फर्क साफ दिखने लगा. और तो और 2004 से सक्रिय राजनीति में कदम ऱखने वाले राहुल गांधी ने 13 साल बाद कांग्रेस पार्टी की अहम जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली.

पप्पू नहीं रहे राहुल गांधी

अभी तक 'पप्पू' कहलाने वाले राहुल गांधी से बीजेपी इतना घबरा गई कि पूरी केंद्र सरकार गुजरात का किला संभालने में लग गई. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपने गढ़ में 34 रैलियां करनी पड़ीं. गुजरात में दशकों से सबसे मजबूत नेता मोदी को अदने से राहुल गांधी ने इतनी कड़ी टक्कर दी जिसके लिए बीजेपी तैयार नहीं थी. 1995 के बाद पहली बार कांग्रेस ने बीजेपी को इतना कड़ा मुकाबला दिया है.

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गुजरात का नतीजा भले ही कांग्रेस के पक्ष में नहीं गया लेकिन प्रधानमंत्री के घर में घुस कर उन्हें तगड़ी चुनौती देकर राहुल गांधी ने विपक्षी योद्धा की जगह हासिल कर ली है. वो दिन अब नहीं रहे जब नीतीश कुमार या केजरीवाल से उम्मीद की जाती थी कि वे एकीकृत विपक्ष की कमान संभालेंगे क्योंकि राहुल से न हो पाएगा. राहुल ने इस धारणा को बदल डाला है. मोदी के उग्र, तानों से भरे, तनकर दिए गए भाषणों के मुकाबले राहुल ने शांत, संतुलित और सौम्य छवि पेश की है, वे मोदी से उन्हीं की शैली में मुक़ाबला करने की कोशिश न करके एक कॉन्ट्रास्ट पैदा करने में कामयाब रहे हैं.

कैसे बदली बयार

2017 मार्च में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के साथ मिलकर लड़े गए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी का सियासी सयानापन दिखने लगा लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं है. लोगों का नजरिया बदलने का कारण सिर्फ राहुल गांधी नहीं थे बल्कि हालात भी थे.

अर्थव्यवस्था में मंदी के माहौल ने लोगों को परेशान किया. बेरोजगारी और मंहगाई को झेल रहे लोगों के सामने जब एक-एक करके भ्रष्टाचार के स्कैम आने लगे तो लोगों का नजरिया भी बदला. यह बहुत कुदरती बात है कि जो लोग आर्थिक मंदी की वजह से पीड़ित हैं वे उस एक नेता को गंभीरता से लेंगे जो उनके लिए आवाज उठा रहा है. वे उसमें विश्‍वास करते हैं क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि विकल्‍प का उभरना जरूरी है.

rahul gandhi 1

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपने आप को गरीबों की पार्टी के रूप में स्थापित करना शुरू किया. कल्याणकारी अर्थव्यवस्था, किसानों के लिए कर्जमाफी की वकालत और ग्रामीण कल्याण पर अधिक खर्च का समर्थन किया और ये सारे संदेश लोगों तक पहुंचने लगे. सोशल मीडिया पर राहुल गांधी प्रभावशाली तरीके से व्यंग्य का इस्तेमाल अपनी बात रखने के लिए कर रहे हैं.

वो मोदी को भी उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहे हैं. जीएसटी के लिए उन्होंने गब्बर सिंह टैक्स कहा. व्यंग्य के इस्तेमाल से राहुल गांधी एक स्मार्ट नेता के रूप में सामने आ रहे हैं क्योंकि व्यंग्य संवाद का एक प्रभावशाली माध्यम है. पार्टी के भीतर भी उन्हें पूरी आजादी दी गई. यही वजह है कि पार्टी अध्यक्ष बनने से पहले ही उन्होंने मणिशंकर अय्यर को निलंबित कर दिया था.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि सब कुछ ठीक है. राहुल ने प्रधानमंत्री के गढ़ में जाकर चुनौती दी है लेकिन अभी तक कोई बड़ी जीत हासिल नहीं की है. अगले दो महीने में होने वाले कर्नाटक चुनाव राहुल गांधी के लिए अग्नि परीक्षा हैं. हालांकि गुजरात चुनाव में बीजेपी को सौ के अंदर समेटने और उपचुनाव में जीतने के बाद उत्साह से भरे है. कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान वो काफी सावधानी से अपने मुद्दे चुन रहे हैं और फिर उन मुद्दों के सहारे वो मोदी सरकार पर तंज भी कसते हैं कि मोदी कैसे सिद्धारमैया से सरकार चलाना सीख सकते हैं.

उन्हें जनसमर्थन भी मिल रहा है लेकिन वो समर्थन जब तक वोट में तब्दील होकर उन्हें जीत नहीं दिलाता तब तक राहुल गांधी की राह काफी कठिन है. साथ ही राहुल के सामने पार्टी को मजबूत करने, और विपक्ष को एकजुट करने जैसी चुनौतियां भी हैं. पार्टी की राज्य इकाइयों में गुटबाजी खत्म करना और सभी को एकजुट करने के साथ साथ कांग्रेस और उनकी सहयोगी पार्टियों के पुराने नेताओं और युवा नेताओं के बीच संतुलन बनाने की भी चुनौती है.

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राहुल गांधी के ट्वीट्स और बयानबाजी में परिपक्वता दिखने लगी है. किसी जमाने में शर्ट-पैंट में राजनीति है जैसे बयान देने वाले राहुल गांधी आज खुल कर बोल रहे हैं. सही समय पर शॉट भी मार लेते हैं, हालांकि अभी भी हिचक जाते हैं. लेकिन राहुल को नरेंद्र मोदी तक पहुंचने में राहुल गांधी को अभी भी लंबा फासला तय करना है, लेकिन उन्होंने कम से कम शुरुआत तो कर ही दी है.

उनके कुछ पुराने बयान देखिए…

राजनीति हर जगह है. आपकी कमीज में है. आपकी पैंट में है. राजनीति हर जगह है.

सितंबर, 2010

हर एक आतंकी हमला रोकना बहुत मुश्किल काम है. हम 99 फीसदी आतंकवादी हमले रोक देंगे, लेकिन फिर भी एक फीसदी हमले हो ही जाएंगे.

नवंबर, 2011

मेरी मां मेरे कमरे में आईं. रोने लगीं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि सत्ता जहर है.

जनवरी, 2013

ये कांग्रेस बड़ी अजीब पार्टी है. ये दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है, लेकिन इसका कोई नियम-कायदा नहीं है. हम हर दो मिनट में नए नियम बनाते हैं और फिर उसे कूड़ेदान में डाल देते हैं. कोई नहीं जानता कि पार्टी के क्या नियम हैं.

जनवरी, 2013

लोग हमें हाथी कहते हैं. हम हाथी नहीं हैं. हम मधुमक्खी का छत्ता हैं. ये मजेदार है, पर जरा सोचिए कि कौन ज्यादा ताकतवर है? हाथी या मधुमक्खी का छत्ता.

अप्रैल, 2013

गरीबी तो एक मानसिक अवस्था है. इसका खाने-पीने, पैसे या बाकी सांसारिक सुविधाओं के अभाव से कोई लेना-देना नहीं है. अगर हमारे अंदर आत्मविश्वास हो तो हम गरीबी से उबर सकते हैं.

अगस्त, 2013

मैं पार्टी संगठन में बदलाव करने के लिए पूरी कोशिश करने जा रहा हूं. मैं ये पक्का करूंगा कि बदलाव आए और मैं ये सब ऐसे करूंगा कि आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.

दिसंबर, 2013

विपक्ष बेचने की कला में माहिर है. उसके पास चमक, नाच-गाना सब है. वे गंजों को कंघियां बेच रहे हैं. अब वे उनके बाल काटने की कोशिश कर रहे हैं.

जनवरी, 2014

हम विकास का ऐसा मॉडल लाएंगे कि जहां एक आदमी आकर आपकी तमाम परेशानियों को ठीक कर देगा. वो घोड़े पर सवार होकर आएगा. वही हमारा मॉडल होगा. वो ही भारत का मॉडल होगा. वो घोड़े पर सवार होकर आएगा. पीछे बैकग्राउंड में एक सूरज होगा. करोड़ों लोग इंतजार कर रहे हैं. वो आ रहा है और सबकुछ ठीक हो जाएगा. नहीं, ऐसे थोड़े न होती है चीजें.

मार्च, 2014 (मोदी के गुजरात मॉडल पर ताना कसते हुए)

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अब यहां से पढ़िए, चावल पुराना हो रहा है…

बीजेपी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बना डाला.

अक्टूबर, 2017

ये चुनाव न PM मोदी के बारे में है और न मेरे बारे में. न ये बीजेपी के बारे में है और न ही कांग्रेस के बारे में. ये गुजरात के भविष्य का सवाल है. कल मैंने मोदी जी का भाषण सुना. 100 में से 90 बार तो मोदीजी बस मोदीजी के बारे में ही बोलते हैं.

दिसंबर, 2017

कहते थे देंगे जवाबदेह सरकार, किया लोकपाल क्यों दरकिनार? GSPC, बिजली-मेट्रो घोटाले, शाह-जादा पर चुप्पी हर बार, मित्रों की जेब भरने को हैं बेकरार, लंबी है लिस्ट और ‘मौनसाहब’ से है जवाब की दरकार किसके अच्छे दिन के लिए बनाई सरकार?

दिसंबर, 2017

सवालों की लिस्ट बहुत लंबी है और हम बड़ी बेताबी से ‘मौन साहब’ (मोदी) के जवाबों का इंतजार कर रहे हैं. किसके अच्छे दिनों के लिए सरकार बनाई थी?

दिसंबर, 2017

मोदी जी मेरे बारे में बुरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. बेकार की बातें करते हैं. आज के अपने भाषण में भी उन्होंने ऐसा ही किया. मैं कांग्रेस और बीजेपी, दोनों के लोगों से कहना चाहता हूं कि राहुल गांधी, प्रधानमंत्री के पद का सम्मान करता है. PM मेरे बारे में चाहे कितने भी खराब शब्दों का इस्तेमाल करें, मगर राहुल गांधी उनके बारे में कुछ बुरा नहीं बोलेगा.

दिसंबर, 2017

मोदी जी, हम बड़े प्यार से आपको गुजरात में हराएंगे.

दिसंबर, 2017

बहुत लम्बी थी साहेब की बात सदन में दिन को बता दिया रात अपनी नाकामियों पर डाले पर्दे अफसोस भाषण से गायब थे देश के मुद्दे प्रधानमंत्रीजी चुप्पी कब तोड़ेंगे राफेल डील पर आखिर कब बोलेंगे? #PradhanMantriJawabDo

फरवरी 18

पहले ललित फिर माल्या अब नीरव भी हुआ फरार कहाँ है 'न खाऊँगा, न खाने दूँगा' कहने वाला देश का चौकीदार? साहेब की खामोशी का राज़ जानने को जनता बेकरार उनकी चुप्पी चीख चीख कर बताए वो किसके हैं वफादार #ModiRobsIndia

फरवरी 18

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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