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अखिलेश के जाति कार्ड ने विरोधियों को धर्मसंकट में डाला

यूुपी चुनाव में अखिलेश यादव ने अचानक से जाति कार्ड खेलकर अपने विरोधियों को चौंका दिया है.

Updated On: Dec 24, 2016 01:12 PM IST

Ambikanand Sahay

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अखिलेश के जाति कार्ड ने विरोधियों को धर्मसंकट में डाला

यूपी चुनाव के मैदान में एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नोटबंदी और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अचानक से जाति कार्ड खेलकर अपने विरोधियों को चौंका दिया है.

ये एक ऐसी चाल है जिसने एक ही झटके में बीजेपी और बीएसपी दोनों को जड़ कर दिया है. यूपी सरकार के इस निर्णायक चुनाव से ठीक पहले जल्दबाजी में लिए गए एक फैसले में राज्य में रहने वाले 17 ओबीसी सब-कास्ट को अनुसूचित जाति की सूची डाल दिया गया है.

ये एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला है क्योंकि राज्य के कहार, कश्यप, केवट, माझी, मछुआ, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, बिंद, भार, राजभर, बाथम, गौड़ और धीमर समुदाय की एक बड़ी आबादी है.

इनकी चुनाव में काफी बड़ी भूमिका होती है. आपस में मिलकर ये जातियां चुनाव में बहुत बड़ा वोट-बैंक बन जाते हैं.

इतिहास में झांका जाए तो हम पाएंगे कि पारंपरिक तौर पर इन सभी जातियों ने आजादी के बाद के समय से खुद को समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियों के साथ जोड़ लिया है- जिनमें प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, जनता दल, लोकदल और समाजवादी पार्टी शामिल हैं.

Akhilesh_Mayawati

जाति कार्ड खेलकर अखिलेश बीएसपी के वोटबैंक को तोड़ रहे हैं

कांशीराम-मायावती का जोर

कांशीराम और मायावती के यूपी की राजनीति में आगमन के साथ ही राज्य की राजनीति में अति-पिछड़ों की राजनीति ने जोर पकड़ लिया. इनमें से कुछ लोगों ने बीएसपी का दामन थाम लिया था. लेकिन अब उनमें फूट पड़ चुकी है. इनमें से कुछ लोग आगे चलकर जहां बीजेपी के साथ हो गए, वहीं जो बचे रह गए वो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का हिस्सा बनकर रह गए.

इस फैसले का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि एसपी प्रमुख मुलायम सिंह यादव साल 2005 से इन जातियों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखना चाहते थे, ताकि पिछड़ी जातियों के वोट को अपने पक्ष में कर सकें.

यादव की यह इच्छा केंद्र की अनिच्छा के कारण अब तक पूरी हो नहीं पायी हुई थी. केंद्र सरकार ने तीन बार यादव के इस प्रस्ताव को मानने से इंकार कर दिया था. जिसके विरोध में मुलायम सिंह यादव ने राज्य में कई बार सामाजिक न्याय अधिकार यात्रा का आयोजन किया. ये यात्राएं साल 2007, 2009 और 2012 के चुनावों के दौरान आयोजित की गईं थीं.

मुलायम के इस कदम से पार्टी को विधानसभा चुनावों में फायदा भी हुआ था. शायद यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनावों में बीएसपी के 80 सीटों की तुलना में एसपी को 224 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इस चुनाव की खास बात ये थी कि दोनों पार्टियों के वोट शेयर में सिर्फ साढ़े तीन प्रतिशत का फर्क था.

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बेमन से ही सही, पिता के सामने अखिलेश ने हार मानी

पिता से सीख रह हैं राजनीति के गुर

आप अब समझ पाएंगे कि आखिर क्यों मुलायम की छत्रछाया में रहने के बावजूद अखिलेश ने आखिरी समय में यू-टर्न क्यों लिया. इसके लिए अखिलेश के हाल ही में दिए गए दो बयानों पर नजर डालने की जरुरत है.

‘ये सही है कि जाति और धर्म का समन्वय काम करता है. लेकिन राजनैतिक दलों को इन समीकरणों पर केंद्रित होने के बजाय विकास के आधार पर वोट मांगना चाहिए....लोगों को भी उन्हीं राजनैतिक दलों का समर्थन करना चाहिए जो विकास की बात करें.’

यूपी विधानसभा के मॉनसून सत्र के अंतिम दिन 1 सितंबर 2016 को अखिलेश ने कहा, ‘जाति के आधार पर राजनीति के दिन अब पूरे हो गए हैं. अब सिर्फ दो ‘डी’ ही मायने रखते हैं और वो है डिवलेपमेंट और डिमोनेटाइजेशन (विकास और नोटबंदी).....कोई भी व्यक्ति पार्टियों के भीतर गुटबाजी या कैबिनेट में हुए फेरबदल की बातें नहीं कर रहा....लोग पिछले पांच सालों के काम को देखकर हमें वोट देंगे....नोटबंदी के कारण लोगों को जिस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, वो भी हमें जीत दिलाने में मदद करेगा. बैंक और एटीएम के सामने जो लंबी लाइनें लगी हैं, वे ही कल समाजवादी पार्टी के वोटर होंगे.’

साफ है कि अखिलेश यादव आज भी अपने पिता मुलायम सिंह यादव से लगातार राजनीति के गुर सीख रहे हैं. वे सीख रहे हैं कि ‘वोटरों को जीतने के लिए और राजनीति पर असर डालने’ के क्या करना जरुरी होता है.

मुलायम सिंह का अखिलेश को दिया गया संदेश बिल्कुल साफ है, आने वाले चुनावों में दूसरी छोटी-मोटी चीजों को किनारे किया जा सकता है और अखिलेश ने बुझे मन से ही सही पिता के निर्देशों को मानना शुरु कर दिया है.

अखिलेश सिंह यादव और नरेंद्र मोदी

अखिलेश सिंह यादव और नरेंद्र मोदी

लेकिन इस बदले वाले माहौल में बीजेपी और बीएसपी दोनों असमंजस में है. अगर वे सरकार के फैसले का समर्थन करते हैं तो समाजवादी पार्टी को फायदा पहुंचाएंगे. अगर नहीं तो वे उन 17 जाति के वोटरों को खो देंगे. शायद यही वजह है कि अखिलेश के जाति कार्ड का खुलकर विरोध नहीं हो रहा है.

विपक्ष को सिर्फ इस बात से राहत हो सकती है कि केंद्र में बीजेपी का राज है और इस बात की पूरी उम्मीद है कि यूपी सरकार के इस प्रस्ताव को केंद्र मानने से ही इंकार कर दे.

लेकिन सबसे अहम सवाल ये है कि अगर इस प्रस्ताव के केंद्र तक पहुंचने से पहले ही यूपी में चुनाव हो जाते हैं तो क्या होगा?

राजनीति में जो चीज मायने रखती है, वो है सही टाइमिंग.

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