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मोहन भागवत ने किया, हिंदुओं से एकजुट होने का आह्वान

हिंदू समुदाय को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि सबसे पहले अपने घर को ठीक करो.

Updated On: Dec 02, 2016 07:29 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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मोहन भागवत ने किया, हिंदुओं से एकजुट होने का आह्वान

‘मैं, ईश्वर और अपने पूर्वजों को साक्षी मानकर, शपथ लेता हूं कि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बनकर पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज की रक्षा करूंगा, और इस हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र करूंगा...’

यह शपथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 99 चुनिंदा स्वयंसेवकों ने मार्च 1928 को नागपुर में लिया था. यह शपथ तत्कालीन संघ प्रमुख डॉ. के.बी. हेडगेवार द्वारा मराठी में हाथ से लिखा गया था. करीब 9 दशक बाद, आरएसएस के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने हेडगेवार का उल्लेख करते हुए, गुरुवार शाम को दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में, पूरी दुनिया के हिंदुओं से संगठित और एकजुट होने का आह्वान किया.

सबसे पहले घर को करो ठीक

आरएसएस की स्थापना के 90 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने कहा- ‘हिंदू(त्व) कोई पंथ नहीं है; जिसे भी हमारी विविधता में विश्वास है, वह हिंदू है. अगर कोई अपने आपको हिंदू कहता है या फिर भारतीय- इसका एक ही मतलब है. इस देश के पूर्वज कौन थे? वे हिंदू थे. हेडगेवार कहते थे कि अगर आप पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखते हैं, तब सबसे पहले आप उन्हें एकजुट करें जो हिंदुत्व में विश्वास करते हैं, उन्हें अपने साथ जोड़ें- मुस्लिम और ईसाई मिशीनरियों के डर से नहीं. अगर एक भी मुस्लिम और ईसाई नहीं हो फिर भी हिंदुओं को एकजुट करने का हमारा दायित्व तब तक बना रहेगा जब तक वे बिखरे हुए हैं. जिन्हें किसी भी वजह से अपने हिंदू होने का संदेह है और जो इस दायरे से बाहर हैं, वे भी भविष्य में स्वतः इसका अनुसरण करेंगे क्योंकि सभी के पूर्वज हिंदू हैं.’

आरएसएस प्रमुख ने हिंदू समुदाय को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि सबसे पहले अपने घर को ठीक करो. ‘समस्या दूसरों में नहीं है. सबसे पहले हमें अपने घर को ठीक करना होगा. हम कहते हैं पूरा विश्व हमारा कुटुंब (वसुधैव कुटुंबकम) है, लेकिन हम अपने ही लोगों से भेदभाव करते हैं- जैसे दलितों के साथ किया जाने वाला व्यवहार. इसे तुरंत रोका जाना चाहिए. पहले अपनी जीवन शैली को व्यवस्थित करो. संघ यही कहता है कि- ‘आदमी क्या करता है’ यह महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि ‘आदमी क्या है’ यह महत्त्वपूर्ण है.’ भारत के विश्व-गुरु के रूप में भूमिका पर जोर देते हुए, उन्होंने कहा कि भारत को सबसे पहले खुद को संगठित और मजबूत बनाना होगा, तभी हम पूरे विश्व को संगठित कर सकते हैं.’

आरएसएस पत्रिका लोकार्पण

'ऑर्गनाइजर' और 'पांचजन्य' के संकलित संस्करण का लोकार्पण करते मोहन भागवत और अन्य

आरएसएस से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास

लगभग घंटे-भर के अपने भाषण में भागवत ने इस पर भी जोर दिया कि 90 साल पुराने आरएसएस की परंपरा, सिद्धांत और कार्यशैली को लोगों को कैसे समझाएं. इसी उद्देश्य से इसके प्रकाशन विभाग, भारत प्रकाशन ने अपनी पत्रिकाओं ‘ऑर्गनाइजर’ (अंग्रेजी) और ‘पांचजन्य’ (हिंदी) का संकलित संस्करण निकाला है. इन दोनों पत्रिकाओं में आर्काइवों और पुराने स्रोतों की मदद से, 1925 से संघ की उत्पत्ति और इतिहास पर प्रकाश डाला गया है.

इस संकलित संस्करण के लोकार्पण के बाद भागवत ने कहा कि यह संघ को समझने में लोगों की मदद करेगी और जो अधिक जानना चाहते हैं वे आरएसएस की शाखा में जा सकते हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संघ को एक इकाई के रूप में लोगों को समझाना चाहिए.

आरएसएस का अस्तित्व और इसकी कार्यशैली हमेशा से बहस का विषय रही है और इसने कई विवादों को जन्म दिया है. सरकार के नीति-निर्माण में संघ की भूमिका (पढ़ें हस्तक्षेप) और स्वयंसेवकों की सार्वजनिक जीवन में कामकाज पर कई तरह की बातें की जाती हैं. इस संकलित संस्करण में आरएसएस के इतिहास को चार भागों में बांटा गया है- 1925 से 1947 तक, 1947 से 1977 तक, 1977 से 2005 तक और 2005 के बाद. साथ ही साथ इस दौरान संबंधित सरसंघचालकों की भूमिका के बारे में भी बताया गया है.

मोहन भागवत

संघ एक देशज विचार है 

भागवत ने जोर देकर कहा- ‘संघ एक विचार है. यह कोई अलग से बना विचार नहीं है. वास्तव में वर्षों से इस देश में निर्मित सामूहिक विचार का नतीजा है. लोगों के बीच संघ के बारे में बहुत सी गलतफहमियां है. हम किसी भी तरह के बहस में नहीं उलझे हैं और हमने किसी भी प्रकार के विरोध और विवाद को नजरअंदाज किया है. इसके बावजूद हम सभी से दोस्ताना और सौहार्दपूर्ण माहौल में बातचीत करते हैं. अगर आप पहले से ही पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं तो आप के भीतर गलतफहमियां पैदा होंगी.’

भागवत ने अपने भाषण का अंत करते हुए कहा- ‘संघ का एकमात्र लक्ष्य मनुष्य-निर्माण और शाखा चलाना है और स्वयंसेवकों को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाना. शाखा जाने के अलावा संघ को जानने का कोई और रास्ता नहीं है. संघ को बोलकर या बताकर, समझा या समझाया नहीं जा सकता. आप शाखा जाएं, अगर आपको अच्छा लगे तो इससे जुड़े रहें. या आप जाने के लिए स्वतंत्र हैं. हमारे साथ किसी प्रकार की बाधा नहीं है.’

भारत प्रकाशन के समूह संपादक जगदीश उपासने ने कहा- ‘इस संकलित संस्करण द्वारा संघ के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन का प्रयास किया गया है और लोगों की कई भ्रांतियों और सवालों को हल करने की कोशिश की गई है. संघ की भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका पर समय-समय पर उठाए सवालों, स्वतंत्रता के बाद इसकी आपातकाल के दौरान भूमिका और संघ के सांगठनिक ढांचे से संबंधित सवालों का जबाब इसमें दिया गया है. ये दोनों संस्करण लोगों को आरएसएस के बारे में बेहतर तरीके से समझने में मदद करेंगे.’ जगदीश उपासने ने इन संकलित संस्करणों के संपादन का अन्य दो संपादकों प्रफुल्ल केतकर और हितेश शंकर के साथ नेतृत्व किया है.

 

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