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हिमाचल चुनाव 2017: सर्वाधिक वोटरों वाले इस सीट में आसान नहीं है कांग्रेस-बीजेपी की राह

यह वही विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र है जहां से शांताकुमार चुनाव जीत कर वर्ष 1977 में पहली बार हिमाचल प्रदेश के गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे

Updated On: Oct 27, 2017 04:38 PM IST

Matul Saxena

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हिमाचल चुनाव 2017: सर्वाधिक वोटरों वाले इस सीट में आसान नहीं है कांग्रेस-बीजेपी की राह

हिमाचल प्रदेश में सर्वाधिक मतदातों वाला विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र कांगड़ा जिला की सुलह सीट है जहां कुल मतदाता 92,753 हैं. इस सीट पर सात प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं और मुख्य मुकाबला कांग्रेस के जगजीवन और भारतीय जनता पार्टी के विपिन परमार में है. इस चुनाव क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की है.

यह वही विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र है जहां से शांता कुमार चुनाव जीत कर वर्ष 1977 में पहली बार हिमाचल प्रदेश के गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे. शांता कुमार का पैतृक-गांव गढ़ इसी निर्वाचन क्षेत्र में है. इसी क्षेत्र की अधिकांश जनसंख्या पारंपरिक खेती-बाड़ी से ही अपनी आजीविका कमाती है.

पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की कमी इस क्षेत्र की प्रमुख समस्या रही है. इस क्षेत्र की पालमघाटी में धान की खेती होती है. इस विधानसभा क्षेत्र के साथ कांगड़ा जिला का वह दुर्गम क्षेत्र भी जुड़ा है जो चंगर क्षेत्र के नाम से जाना जाता है और जहां विकास के नाम पर बहुत कुछ अभी किया जाना बाकी है.

यहां के वोटर को मालूम है वोट की अहमियत

सियासी दृष्टि से यह निर्वाचन क्षेत्र अप्रत्याशित परिणामों के लिए विख्यात है. प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार को इस क्षेत्र के मतदाताओं ने हार का मुंह भी दिखाया है. तब किसी को यह आशा नहीं थी कि मुख्यमंत्री रहने वाले शांता कुमार को कांग्रेस का एक सामान्य कार्यकर्ता मानचंद राणा चुनाव में शिकस्त दे देगा. हार-जीत का यह सिलसिला अब भी उसी तरह बरकरार है. सुलह निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता अपने मत का सार्थक प्रयोग करना जानते हैं ,यही कारण है यहां सर्वाधिक मतदान प्रतिशतता रहती है.

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शांता कुमार

कांग्रेस के जगजीवन पाल और भारतीय जनता पार्टी के विपिन परमार पारंपरिक प्रतिद्वंदी हैं. जगजीवन पाल 2003 में पहली बार परमार को हरा कर इस सीट से चुनाव जीते थे. दोनों ही उम्मीदवारों का अपनी पार्टी में खास रुतबा है. पाल वीरभद्र सरकार में संसदीय सचिव रहे हैं जबकि विपिन परमार भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश में उच्च ओहदेदार हैं. इस बार भारतीय जनता पार्टी द्वारा टिकट आवंटन की अधिकृत सूची जारी करने से बहुत पहले हाई कमांड ने उनके नाम पर मोहर लगा दी थी और वे उन खुशकिस्मतों में से थे जिन्हें बिना किसी मशक्कत के टिकट हासिल हो गया था.

काफी कम अंतर रहा है हार-जीत का

इसके चलते विपिन परमार का चुनाव-प्रचार बहुत पहले से शुरू हो गया था. जगजीवन पाल के खाते में सबसे बड़ी बात यह है कि मतदाताओं की उन तक पहुंच आसान है और वीरभद्र सिंह की उन पर अपार कृपा है जिसके कारण विकास के कुछ महत्वपूर्ण कार्य इस निर्वाचन क्षेत्र में हुए हैं लेकिन अधिकांश मतदाताओ की शिकायत है कि यह कार्य आधे-अधूरे हैं. हेल्थ-सेंटर में चिकित्सा सुविधाएं न के बराबर है और लोगों को प्राथमिक उपचार के लिए भी भवारना आना पड़ता है.

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आपात स्थिति में पालमपुर या कांगड़ा जाना पड़ता है, सड़कों की दुर्दशा की ओर न बीजेपी ने ध्यान दिया है ना कांग्रेस ने. सुलह विधान सभा क्षेत्र में जब भी विपिन परमार जीतें हैं तो बहुत कम मतों के अंतर से जीते हैं और जब हारे हैं तब भी अंतर बहुत कम रहा है . वर्ष 2012 के चुनाव में विपिन परमार 4428 मतों के अंतर से पराजित हुए थे.

इस निर्वाचन क्षेत्र में चुनावी माहौल में गर्मी पैदा करने के लिए आगामी कुछ दिनों में पार्टी के कद्दावर नेता दौरे पर आ रहे हैं. इस कड़ी में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा की जनसभा अगले दो दिनों में आयोजित की गई है. दोनों ही राष्ट्रीय दलों के उम्मीदवार जिस मशक्कत से हर पंचायत में घूम कर अपने लिए जनमत बटोर रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि दोनों ही उम्मीदवार अपनी जीत को लेकर आशंकित हैं.

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