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हिमाचल चुनाव 2017: बंजार की धरती पर युवाओं की लड़ाई, बीजेपी का कब्जा या कांग्रेस की विदाई?

जहां सुरेंद्र शौरी स्थानीय नेतृत्व के नाम पर वोट मांग रहे हैं वहीं आदित्य विक्रम सिंह अपने पिता कर्ण सिंह के नक्शे-कदम पर चलने की कोशिश कर रहे हैं.

FP Staff Updated On: Nov 08, 2017 11:13 PM IST

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हिमाचल चुनाव 2017: बंजार की धरती पर युवाओं की लड़ाई, बीजेपी का कब्जा या कांग्रेस की विदाई?

हिमाचल प्रदेश के चुनावों में कांगड़ा जिले की काफी अहमियत है लेकिन मंडी जिला भी काफी अहम है. इस बार मंडी के बंजार में काफी मजेदार मुकाबला देखने को मिल रहा है. बंजार इस बार युवाओं की लड़ाई का मैदान बना हुआ है.

यहां से 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों ने युवा उम्मीदवार उतारे हैं. बीजेपी ने जहां 36 साल के सुरेंद्र शौरी को इस सीट पर खड़ा किया है, वहीं 32 साल के आदित्य विक्रम सिंह कांग्रेस का चेहरा बने हुए हैं. बीएसपी ने भी एक युवा नेता 39 साल के झबे राम कौशल को ही अपना उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी उम्मीदवार सुरेंद्र शौरी के खिलाफ एक आपराधिक मामला चल रहा है.

बंजार विधानसभा सीट पर 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के करण सिंह को 29622 वोट मिले थे. करण सिंह ने बीजेपी के उम्मीदवार खीमी राम को लगभग 8000 वोटों से हराया था. लेकिन 2012 के पहले बीजेपी 1998 से इस कुर्सी पर काबिज थी. अब फिर मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच का है. कांग्रेस 19 सालों में 5 सालों के लिए मिली इस कुर्सी को जाने नहीं देना चाहेगी.

बीजेपी के उम्मीदवार सुरेंद्र शौरी टिकट मिलने से पहले से ही अपना जनाधार तैयार करने में लगे हुए हैं. सितंबर में शौरी ने आक्रोश रैली के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया था. सुरेंद्र शौरी को टिकट मिलने के साथ ही बंजार को 35 सालों में पहली बार स्थानीय नेतृत्व मिला है. शौरी इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहेंगे. उन्होंने अपनी रैलियों में दावा किया था कि अगर पार्टी स्थानीय नेतृत्व को टिकट देगी तो यहां से उसे जीत मिलेगी. शौरी ने अपनी जीत के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क निर्माण को मजबूत करने का वादा किया था.

वहीं, सुरेंद्र शौरी के सामने हिमाचल के बड़े नेता रह चुके स्वर्गीय कर्ण सिंह के बेटे आदित्य सिंह के लिए अपनी विरासत साबित करना एक बड़ी चुनौती होगी. कर्ण सिंह का अभी इसी मई महीने में निधन हुआ है. इतनी जल्दी उनके बेटे के कंधों पर उम्मीदों का बोझ आ पड़ा है. ऐसे में सबकी निगाहें आदित्य विक्रम सिंह पर रहेंगी. साथ ही ये देखना भी दिलचस्प होगा की बंजार की जनता एक स्थानीय नेतृत्व सुरेंद्र शौरी के हाथों अपनी किस्मत सौंपेगी या अपने पिता की विरासत संभाले, उनके नक्शे-कदम पर चल रहे आदित्य विक्रम सिंह को.

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