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आप के लौटे ‘अच्छे दिन’,  लाभ के पद ने हानि से बचाया तो माफी ने मानहानि से

केजरीवाल की ईमानदार छवि पर करप्शन के आरोपों का भले ही कोई सबूत नहीं मिला लेकिन ये आरोप ठीक वैसे ही थे जैसा केजरीवाल दूसरे नेताओं पर लगा कर सत्ता के शिखर पर पहुंचे

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 23, 2018 10:18 PM IST

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आप के लौटे ‘अच्छे दिन’,  लाभ के पद ने हानि से बचाया तो माफी ने मानहानि से

आम आदमी पार्टी के अच्छे दिन शुरू हो गए हैं. आप के निलंबित 20 विधायकों का दिल्ली विधानसभा में ‘गृहप्रवेश’ का रास्ता साफ हो गया है. इसकी बड़ी वजह दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला है. लाभ के पद के दुरुपयोग के मामले में घिरी आम आदमी पार्टी के 20 विधायक ‘बाइज्जत बहाल’ हो गए हैं. दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वो इन विधायकों की बात को दोबारा सुनें.

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले से दिल्ली की राजनीति में बड़ा फेरबदल होने से बच गया. विधायकों के निलंबन की वजह से आप बैकफुट पर थी. लेकिन अब दोगुने जोश से मैदान में हुंकार भर सकेगी. हाईकोर्ट के फैसले से अब आप जनता में ये संदेश देगी कि किस तरह चुनाव आयोग ने उसके साथ नाइंसाफी की. चुनाव आयोग की कार्रवाई को लेकर वो केंद्र सरकार पर हमले करेगी. आम आदमी पार्टी के पास चुनाव आयोग का ही दिया हुआ मौका है कि वो खुद को पीड़ित बता कर जनता से इंसाफ मांगे.

आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला संजीवनी से कम नहीं है. एक तरफ उपचुनावों का खतरा टल गया तो साथ ही अब साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी को कमर कसने का मौका भी मिल गया. अगर हाईकोर्ट से आप के विधायकों को राहत नहीं मिलती तो दिल्ली विधानसभा की तस्वीर बदल सकती थी.

Kejriwal, leader of the newly formed Aam Aadmi Party, speaks with the media at a polling station in New Delhi

आप के ऊपर उपचुनावों तलवार लटकी हुई थी. लाभ के पद के दुरुपयोग के गढ़े हए आरोपों से दागी हुई छवि का असर उपचुनाव में साफ दिखता. पार्टी के लिए हर सीट पर चुनाव जीतने का इतिहास दोहराना संभव नहीं होता. वैसे भी एमसीडी चुनावों में मिली हार में पार्टी को भविष्य की आहट डराने लगी थी.

हालांकि आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग के फैसले को एकतरफा और दुर्भावना से प्रेरित बताया था. यहां तक कि चुनाव आयोग को केंद्र की कठपुतली तक कहा था. आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार पर दिल्ली सरकार गिराने का भी आरोप लगाया. लेकिन आरोपों की राजनीति करने की छवि बनने की वजह से आप चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ सियासी भूचाल नहीं ला सकी. ऐसे में आम आदमी पार्टी को अपने राजनीतिक वजूद के लिए एक ऐसे ही मौके की तलाश थी.

सबसे बड़ी राहत दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को मिली है. केजरीवाल को अब राजनीतिक आरोपों को सच साबित करने का मौका मिल गया है. तभी उनके ट्वीटर से बोल फूटे – ‘ये सत्य की जीत है.’ सत्ता के संघर्ष में केजरीवाल को इस जीत की दरकार थी.

केजरीवाल अपनी पार्टी के साथ भीतरी और बाहरी विरोध के साथ गुजर रहे हैं. साथ ही हाल में हुए कई मामलों ने उनकी छवि को नकारात्मक बनाने में कसर नहीं छोड़ी.  अरविंद केजरीवाल के आरोप भी सबूतों के अभाव में दम तोड़ने लगे थे. जनता के बीच केजरीवाल की बातों की गंभीरता धीरे-धीरे कम होती दिख रही थी. उनके आरोपों में जनता को पॉलिटिकल स्टंट ज्यादा दिखाई देने लगा था. तभी उनकी धरना-पॉलिटिक्स ने विपक्षी दलों को अराजक बताने का मौका दे दिया.

arvind kejriwal

दिल्ली के एलजी के साथ विवाद, पार्टी की अंदरूनी कलह, राज्यसभा टिकट बंटवारे का मामला, दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट के मामले ने केजरीवाल की छवि को नुकसान पहुंचाने का ही काम किया. लेकिन उनकी छवि सबसे ज्यादा तब प्रभावित हुई जब उन्होंने पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक कुमार विश्वास का टिकट काट कर बाहरी को थमा दिया. जिसके बाद केजरीवाल पर टिकट बेचने का आरोप लगा.

इससे पहले दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा उन पर दो करोड़ की रिश्वत लेने के संगीन आरोप लगा चुके थे. केजरीवाल की ईमानदार छवि पर करप्शन के आरोपों का भले ही कोई सबूत नहीं मिला लेकिन ये आरोप ठीक वैसे ही थे जैसा केजरीवाल दूसरे नेताओं पर लगा कर सत्ता के शिखर पर पहुंचे. केजरीवाल की राजनीति ही बीजेपी और कांग्रेस के आला नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का साथ शुरू हुई थी. लेकिन जब आरोपों की इंतेहाई हुई तो मानहानि के मुकदमों ने भी रफ्तार पकड़ी.

Arvind Kejriwal meets Defence colony market traders

केजरीवाल अपने ही बुने हुए जाल में उलझते चले गए. उनके आरोपों के साथ जनता की सहानुभूति कम और दूरियां ज्यादा दिखाई देने लगी. आम जन मन में आम आदमी पार्टी की तस्वीर भी दूसरे राजनीतिक दलों की तरह भ्रष्टाचार, अहंकार और अवसरवाद में डूबी दिखाई देने लगी.

इन तमाम परिस्थितियों में एक तरह से उलझ चुके केजरीवाल के पास राजनीति का कोई ऐसा मुद्दा नहीं था. केजरीवाल राजनीति के भंवर जाल में इस तरह से उलझते चले गए कि उनका बाहर निकलना मुश्किल लग रहा था. इसके बावजूद केजरीवाल ने राजनीति की नई राह पकड़ी. उन्हें अतीत की गलतियों से सबक लेते हुए माफी मांगने की शुरुआत कर विरोधियों को चौंका दिया. केजरीवाल ये जानते हैं कि विपरीत काल में क्या व्यवहार किया जाना चाहिए.

माफीनामे से उनके ऊपर चल रहे मानहानि के मुकदमों की तादाद कम होगी. उससे केजरीवाल ही नहीं बल्कि पार्टी का भी फायदा होगा. अब दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से अरविंद केजरीवाल को अपने पक्ष में हवा बनाने का मौका मिल गया है. इस बार उनके आरोपों के साथ हाईकोर्ट के फैसले का सबूत भी साथ होगा जिसका वो जनता के सामने भरपूर सियासी इस्तेमाल करेंगे.

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