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‘दुश्मन का दुश्मन-दोस्त’ की थ्योरी पर बनेगा हार्दिक-ममता का सियासी समीकरण

ममता बनर्जी को लगता है कि गुजरात के पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल से हाथ मिलाकर वो राज्य में बीजेपी के खिलाफ प्रचार का नया युद्ध छेड़ सकती हैं

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Feb 09, 2018 11:27 AM IST

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‘दुश्मन का दुश्मन-दोस्त’ की थ्योरी पर बनेगा हार्दिक-ममता का सियासी समीकरण

पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (PAAS) के संयोजक हार्दिक पटेल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करने जा रहे हैं. कोलकाता में दोनों के बीच सियासत के नए समीकरणों को लेकर मुलाकात होगी. माना जा रहा है कि साल 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर एक नए तरह का गठबंधन तैयार करने की रणनीति पर दोनों चर्चा करेंगे.

हार्दिक पटेल से मुलाकात के पीछे टीएमसी की बेचैनी की वजह सिर्फ बीजेपी है. पश्चिम बंगाल में टीएमसी की जमीन पर धीरे-धीरे कमल खिलना शुरू हो गया है. ऐसे में ममता बनर्जी को लगता है कि गुजरात के पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल से हाथ मिलाकर वो राज्य में बीजेपी के खिलाफ प्रचार का नया युद्ध छेड़ सकती हैं. गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने उन्हें फोन कर बधाई दी थी और उनके काम को शानदार बताया था.

हार्दिक हुए हैं मजबूत

गुजरात विधानसभा चुनाव में हार्दिक पटेल ने कांग्रेस का साथ देकर बीजेपी के पटेल खेमे में काफी सेंध लगाई थी. हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की त्रिमूर्ति ने जहां बीजेपी की सीटें घटाने का काम किया तो वहीं कांग्रेस की सीटें भी 80 पर पहुंचा दीं. जिस वजह से 25 साल में पहली बार कांग्रेस मजबूत विपक्ष बन सकी है. हार्दिक पटेल इस उपलब्धि को बीजेपी का घमंड तोड़ने वाला बताते हैं. हार्दिक पटेल के बीजेपी विरोध को अगर पटेल समुदाय से पूरा समर्थन मिल जाता तो गुजरात की चुनावी तस्वीर कुछ और भी हो सकती थी. ग्रामीण क्षेत्रों में पाटीदार आंदोलन का असर दिखा लेकिन शहरी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव कम नहीं हो सका. बीजेपी के कोर वोटर पटेल समुदाय ने हार्दिक की अपील और दलील को उतनी तवज्जो नहीं दी.

Ahmedabad: Patidar community leader Hardik Patel waves at supporters during a road show for the second phase of state assembly elections, in Ahmedabad on Monday. PTI Photo by Santosh Hirlekar (PTI12_11_2017_000085B) *** Local Caption ***

पाटीदार आरक्षण आंदोलन की वजह से हार्दिक पटेल गुजरात में रातों रात मशहूर हो गए थे. उनकी रैलियों में लाखों लोगों की भीड़ उमड़ने लगी थी. पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने गुजरात में बीजेपी की नींद उड़ा दी थी. माना जा रहा था कि बीजेपी के लिए इस बार विधानसभा चुनाव में हालात बहुत मुश्किल होंगे. लेकिन विधानसभा चुनाव में हार्दिक पटेल अपनी रैलियों में आई भीड़ को कांग्रेस के लिए वोटों में बदलने में उतने कामयाब नहीं हो सके. चुनाव के वक्त कथित सेक्स-सीडी आने की वजह से भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरा.

कांग्रेस के बाद ममता के ब्रह्मास्त्र

गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद अब हार्दिक पटेल बीजेपी के खिलाफ अपनी एक सूत्रीय मुहिम चला रहे हैं. ऐसे में ममता बनर्जी भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तर्ज पर हार्दिक पटेल में बीजेपी के खिलाफ ब्रह्मास्त्र देख रही हैं. उनकी बीजेपी विरोध की रणनीति को ही ममता बनर्जी अपना भी हथियार बनाना चाहती हैं क्योंकि बंगाल में बीजेपी के बढ़ते जनाधार ने टीएमसी की नींद उड़ा दी है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रदर्शन में लगातार सुधार हो रहा है. बीजेपी धीरे धीरे पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन तैयार करती जा रही है. हाल के उप चुनावों में वो सीपीएम और कांग्रेस को पछाड़कर दूसरे नंबर पर आ चुकी है.

पश्चिम बंगाल में उलुबेरिया और नवपाड़ा में हाल ही में हुए उप चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार भले ही चुनाव हारे लेकिन वो दूसरे स्थान पर रहे. नवपाड़ा में बीजेपी उम्मीदवार संदीप बनर्जी को 38,711 वोट मिले थे. जबकि साल 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इस सीट पर 23 हजार वोट मिले थे यानी एक साल के भीतर ही पंद्रह हजार से ज्यादा वोटों का इजाफा हुआ.

लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा की दो सीटें जीती थीं जबकि विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीतकर खाता भी खोला. बीजेपी का वोट प्रतिशत 4 फीसदी से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया. सबांग की सीट पर हुए उपचुनाव में भी बीजेपी को 37 हजार 476 वोट मिले थे और वो तीसरे स्थान पर रही. जबकि निकाय चुनाव में भी नगरपालिकाओं की 148 सीटों में से 77 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही.

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नरम हिंदुत्व की ओर बढ़ीं ममता

बीजेपी की सुधरती स्थिति टीएमसी के लिए चिंता का सबब है क्योंकि टीएमसी के सात साल के शासन में ही अब वहां धीरे धीरे बीजेपी विकल्प के तौर पर तैयार हो रही है. टीएमसी की नीतियों को बीजेपी मुद्दा बना कर अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने में कामयाब होती दिख रही है. बीजेपी की आक्रामक हिंदुत्व रणनीति की वजह से ही ममता को सियासी यू-टर्न लेते हुए नरम हिंदुत्व का सहारा लेना पड़ा. कभी बीरभूम में उन्हें ब्राह्मण सम्मेलन बुलाकर 8 हजार ब्राह्मणों को भगवद्गीता भेंट करनी पड़ी तो गांवों में गाय बांटने का फरमान भी जारी किया. हिंदू पुष्टिकरण की नीति अपनाने को मजबूर ममता अब मंदिर की परिक्रमा कर रही हैं.

ऐसे में पश्चिम बंगाल में बीजेपी को मजबूत होने से रोकने के लिए वो हार्दिक पटेल को सियासी मोहरा बनाना चाहती हैं. उन्हें लगता है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में हार्दिक पटेल की रैलियां न सिर्फ बीजेपी को कमजोर करने का काम करेंगी बल्कि पटेल-पाटीदारों की तरह ही मंडल और महतो वोटर्स को लुभाने के भी काम आ सकेंगी. साथ ही वो दूसरे विपक्षी दलों को भी ये संदेश देना चाहती हैं कि मोदी विरोध के अभियान में वो अगुवा की भूमिका में हैं. हालांकि नोटबंदी के व्यापक विरोध के बावजूद ममता बनर्जी को विपक्ष का साथ नहीं मिल सका था और वो अकेले पड़ने के बाद दिल्ली से बैरंग कोलकाता लौट गई थीं. ऐसे में हार्दिक पटेल में ममता कौन सी ताकत देख रही हैं ये सोचने वाली बात है. फिलहाल हार्दिक से हाथ मिलाने की रणनीति ममता की कमजोरियों और घबराहट को उजागर करने का काम कर रही हैं.

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