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राज्यसभा चुनाव ने 'सेकुलर' दिग्विजय को 'क्षत्रिय धर्म' की याद दिला दी

एक राज्यसभा की सीट का सवाल सामने आता है तो पार्टी के बड़े धुरंधर नेता का असली जातिवादी चेहरा सामने आ जाता है

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Aug 08, 2017 02:25 PM IST

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राज्यसभा चुनाव ने 'सेकुलर' दिग्विजय को 'क्षत्रिय धर्म' की याद दिला दी

अहमद पटेल को राज्यसभा में भेजने का सवाल कांग्रेस के लिए इतना बड़ा बन गया है कि पार्टी अपने सिद्धांतों तक से समझौता करने को तैयार है. पटेल की जीत को अपनी इज्जत का सवाल बना बैठी कांग्रेस इसके लिए अपने ही विधायकों को बंधक बना लेती है. बात सिर्फ यहीं तक नहीं है. कांग्रेस के सीनियर लीडर अपनी पार्टी की इज्जत बचाने के लिए अपने जन्मजात सिद्धांतों की तिलांजलि तक देने को तैयार बैठे हैं.

मंगलवार को चुनाव के दिन पार्टी के नेताओं को पता था कि शंकर सिंह वाघेला का पार्टी के विरोध में जाने का तगड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा. वाघेला को अंतिम वक्त में अपने पाले में लाने के लिए पार्टी के सीनियर लीडर दिग्विजय सिंह अहले सुबह ही ट्विटर पर जम गए. दोस्ती दुश्मनी के पुराने किस्सों को याद करते-करते वो जात-पात पर जाकर वाघेला से अहमद पटेल को समर्थन करने की अपील करने लगे.

ट्विटर पर दिग्विजय सिंह ने लिखा, ‘मत भूलिए कि कांग्रेस ने आपके लिए क्या किया है. आप एक राजपूत हैं. कृपया अहमद भाई की जीत सुनिश्चित कीजिए. वह हमारे दोस्त और सपोर्टर रहे हैं.'

दिग्विजय सिंह और उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर बीजेपी को कोसने को एक मौका नहीं छोड़ती. जात-पात की राजनीति से खुद को दूर दिखाने के लिए मौके बेमौके किसी दलित के घर खाना खाने का ढोंग करती है. लेकिन जब एक राज्यसभा की सीट का सवाल सामने आता है तो पार्टी के बड़े धुरंधर नेता का असली जातिवादी चेहरा सामने आ जाता है.

वाघेला को उनकी जाति की याद दिलाकर क्या दिग्विजय सिंह जातिवादी राजनीति नहीं कर रहे हैं? दिग्विजय सिंह खुद राजपूत जाति से आते हैं. शंकर सिंह वाघेला भी इसी जाति के हैं. वाघेला को पार्टी में बनाए रखने के सारे जतन बेकार गए. कांग्रेस के भीतर उनकी सुनी नहीं गई और अब जब वो पार्टी से बाहर आकर कांग्रेस विरोध की राजनीति कर रहे हैं तो उन्हें जाति का हवाला देकर अपने साथ बनाए रखने की नाकाम कोशिश की जा रही है. और इस कोशिश में कांग्रेस के नेता जात पात की राजनीति करने से भी परहेज नहीं कर रहे.

सवाल ये भी है कि क्या दिग्विजय सिंह के ऐसे बयान पर चुनाव आयोग को नोटिस नहीं लेना चाहिए. दिग्विजय सिंह राजपूत जाति का हवाला देकर शंकर सिंह वाघेला को अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट डालने की अपील कर रहे हैं. चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों के मुताबिक धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगना अवैध है और इसके खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने जात और धर्म के आधार पर वोट मांगने को अवैध करार दिया है. इस बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश हैं.

पिछले यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने चुनावों के एलान के साथ ही अपनी पार्टी के जातिवार उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी थी. मायावती के इस कदम को जातिवादी बताते हुए उनके खिलाफ विरोधी पार्टियां चुनाव आयोग चली गई थी. क्या दिग्विजय सिंह का ये बयान भी उसी तरह का नहीं है?

कांग्रेस पार्टी नैतिकता के जिस ऊंचे मानदंड का हवाला देकर धर्मनिरपेक्षता और गैरजातिवाद राजनीति करने का दंभ भरती आई है ये उसकी भी पोल खोलने वाला है. दिग्विजय सिंह वही शख्सियत हैं, जिन्होंने सांप्रदायिकता का नाम लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर तीखे हमले किए हैं. धर्मनिरपेक्षता का भारीभरकम शब्द उठाकर बीजेपी पर हमलावर रहे हैं. लेकिन एक राज्यसभा सीट के लिए वो खुद कितने जातिवादी हो जाते हैं ये उनके ट्वीट से झलक जाता है.

दिग्विजय सिंह ने हर स्तर पर जाकर शंकर सिंह वाघेला को लुभाने की कोशिश की. एक ट्वीट में उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस के साथ आपके जो भी मुद्दे हैं उन्हें पार्टी के भीतर सुलझा लेंगे. धोखा मत दीजिए और न ही अपने पुराने चेले को सपोर्ट कीजिए, जो पूरे देश को अपने हिसाब से हांके जा रहा है.’

यहां पुराने चेले का मतलब पीएम मोदी से है. दिग्विजय तंज कसने के माहिर खिलाड़ी हैं. उनके ट्वीट्स में इसकी झलक दिखती है. पुराना चेला कहके उन्होंने तंज ही कसा है.

लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद कुछ असर नहीं हुआ है. शंकर सिंह वाघेला ने राज्यसभा के चुनाव में वोट डालने के बाद एलान किया कि उऩ्होंने कांग्रेस के विरोध में वोट डाला है. उन्होंने ये तो नहीं बताया कि वोट किसको डाला है. लेकिन बयान से साफ है कि कांग्रेस को चोट देने की उनकी मंशा जात पात की राजनीति से ऊपर है.

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