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गुजरात चुनाव 2017: मोदी में मतदाताओं का भरोसा उन्हें बीजेपी की ओर खींच लाता है

जब से मोदी दिल्ली आए हैं, गुजरात सरकार से वह चमक और नयापन गायब हो गया है जो उनके शासन की खास शैली के रुप में जाना जाता था. एक जो बड़ी शिकायत सुनने में आ रही है वो यह कि मोदी के दिल्ली जाने के बाद से सूबे की नौकरशाही ने फिर से भ्रष्टाचार की पुरानी रीत अपना ली है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Dec 09, 2017 11:53 AM IST

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गुजरात चुनाव 2017: मोदी में मतदाताओं का भरोसा उन्हें बीजेपी की ओर खींच लाता है

परिचय ज्यादा गाढ़ा होकर अक्सर अनादर का कारण बन जाता है. और, किसी राजनीतिक दल का मतदाताओं के साथ हेलमेल दो दशक से भी ज्यादा लंबे समय से चला आ रहा हो तो इस रिश्ते के भीतर अनादर, असंतोष और ईर्ष्या के प्रेत पैदा होंगे ही.

अगर गुजरात से मिल रहे असमंजस भरे संकेतों पर नजर डालें तो लगेगा इनमें से अधिकतर की वजह है बीजेपी नेतृत्व के साथ मतदाताओं का प्रगाढ़ परिचय. वक्त गुजरने के साथ राज्य में बीजेपी का नेतृत्व मतदाताओं के लिए कुछ ऐसा बन गया है मानो वह उनका पड़ोसी हो और इस किस्म की नजदीकी मतदाताओं में एक ही साथ गर्व की भावना जगाती है तो पूर्वाग्रह की भी.

गुजरात विधानसभा का यह चुनाव कोई मामूली चुनाव नहीं है. दो दशक बीतने के बाद गुजरात एक ऐसे नेता की गैरमौजूदगी को बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा है जो महात्मा गांधी और सरदार पटेल के बाद उसकी जमीन पर जन्मा अब तक का सबसे ताकतवर राजनेता है. इसमें कोई शक नहीं कि इस नेता की बड़ी शख्शियत के आगे प्रदेश के बाकी नेता बौने बनते चले गए.

सूबे की नौकरशाही ने फिर से भ्रष्टाचार की पुरानी रीत अपना ली है

इस लिहाज से देखें तो आनंदीबेन पटेल या फिर विजय रुपाणी का शासन काल नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार के आगे एकदम ही बेपानी नजर आती है. जब से मोदी दिल्ली आए हैं, गुजरात सरकार से वह चमक और नयापन गायब हो गया है जो उनके शासन की खास शैली के रुप में जाना जाता था. ठीक इसी तरह, एक बड़ी शिकायत यह सुनने में आ रही है कि मोदी के दिल्ली जाने के बाद से सूबे की नौकरशाही ने फिर से भ्रष्टाचार की पुरानी रीत अपना ली है.

Vadnagar: Prime Minister Narendra Modi launches the “Intensive Indradhanush Misssion” campaign for the vaccination of children at a public meeting in his hometown Vadnagar on Sunday. Union Health Minister J P Nadda and Gujarat CM Vijay Rupani are also seen. PTI Photo (PTI10_8_2017_000103B)

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी राज्य में नरेंद्र मोदी शासनकाल जैसी चमक को बरकरार नहीं रख सके (फोटो: पीटीआई)

लेकिन साथ ही यह भी दिख रहा है कि मतदाता के मन में कुछ खास उपलब्धियों के लिए मोदी के प्रति प्रशंसा का भाव है. मिसाल के लिए मोदी की एक योजना लगातार गरीब मेला आयोजित करने की थी जिसे 2012 के चुनाव में जीत के लिहाज से तुरुप का पत्ता माना गया. मोदी ने गुजरात के बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया और इस बात के लिए गुजरात के मतदाताओं में चारों ओर प्रशंसा है. लेकिन मोदी जनता से जुड़ाव कायम करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाते थे जबकि गुजरात में उनके उत्तराधिकारियों में ऐसी ऊर्जा का अभाव दिखा है.

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मतदाताओं और बीजेपी के नए नेतृत्व के बीच जुड़ाव की एक जाहिर सी कमी नजर आ रही है. लेकिन शिकायत इतने भर तक सीमित नहीं है. दक्षिण गुजरात में घूमते-टहलते आपको राजनीतिक शब्दकोश का एक नया लफ्ज- अहंकार सुनाई देगा. सूरत के कपड़ा बाजार में व्यापारी संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि हमलोग बीजेपी के नेतृत्व वर्ग के अहंकार के खिलाफ हैं.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 13 वर्षों तक सरकार चलाई है

नरेंद्र मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात में 2001 से मई, 2014 तक सरकार चलाया है

'वो लोग हमें हमेशा के लिए अपने पाले में मानकर क्यों चल रहे हैं?'

150 सीट जीतने के अमित शाह के दावे की याद दिलाते हुए व्यापारी संघ के एक पदाधिकारी ने कहा कि 'वो लोग हमें हमेशा के लिए अपने पाले में मानकर क्यों चल रहे हैं?' लेकिन जब उससे पूछा गया कि क्या आप कांग्रेस को समर्थन देंगे तो उसने चट से जवाब दिया- ‘किसी भी सूरत में नहीं’. हम लोग नाखुश भले हों लेकिन अब भी मोदी पर हम विश्वास करते हैं.'

इस बातचीत का छुपा हुआ संदेश बड़ा साफ है. सूबे में बीजेपी का नया नेतृत्व मतदाताओं के समर्थन को हमेशा के लिए गारंटीशुदा मानकर न चले. मोदी की बात अलग है. शायद पार्टी के नेतृत्व ने बहुत सारा वक्त गुजर जाने के बाद यह समझा है कि मतदाताओं के मन में नाराजगी है और उन तक पहुंचने के लिए भरपूर तेजी से कोशिश हुई है. बीजेपी के संगठन का ढांचा बड़ा मजबूत और ऊर्जावान है और समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली ने मतदाताओं के मन की नाराजगी को एक हद तक दूर किया है.

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राज्य की सियासत में पूर्वाग्रह और ईर्ष्या का भाव भी फैला हुआ है. हार्दिक पटेल का उभार इसी की देन है. पाटीदार अपने संख्या बल के आधार पर मानते हैं कि सत्ता बल पर उनका हक है. ऐसे पाटीदारों के एक हिस्से ने देखा कि मोदी अब गुजरात में नहीं है तो उसे लगा अपनी दावेदारी पेश करने का यही सही मौका है. हार्दिक की बातें नौजवानों को पसंद आ रही हैं और यह बीजेपी के लिए सचमुच चिंता की बात है.

Rahul Gandhi-Hardik Patel

पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाकर बीजेपी के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं

अपने भीतर की बेतरतीबी को संवारने का मौका मिलेगा 

इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात विधानसभा के चुनावों से बीजेपी को अपने भीतर की बेतरतीबी को संवारने का मौका मिलेगा और आत्मपरीक्षण का भी. लेकिन यह बात भी सच है कि गुजरात के समाज के साथ बीजेपी का हेलमेल और मोदी का करिश्मा भावनाओं के उस क्षणिक ज्वार से उभार से कहीं ज्यादा भारी है जिसके सहारे कांग्रेस ने अपनी नैया पार उतारने की आस लगा रखी है. जब तक कांग्रेस गुजरात में मतदाताओं के साथ पड़ोसी का सा रिश्ता नहीं बना लेती वह सिर्फ आंय-बांय ही करती नजर आएगी, उसके बोल वचन का कोई खास असर नहीं होने वाला.

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