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गुजरात विधानसभा चुनाव 2017: कांग्रेस और बीजेपी दोनों से नाराज़ हैं मुस्लिम वोटर

मुस्लिम इलाकों के लोगों का कहना है कि प्रशासन उन्हें नागरिक नहीं महज वोटर मानता है

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Nov 19, 2017 11:10 AM IST

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गुजरात विधानसभा चुनाव 2017: कांग्रेस और बीजेपी दोनों से नाराज़ हैं मुस्लिम वोटर

पूर्वी सूरत के विधानसभा क्षेत्र 159 से वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलीम भाई पटेल पूछते हैं, ‘यह गुजरात है या उत्तर प्रदेश?’ वह कांग्रेसी नेताओं द्वारा गुजराती वोटरों के संप्रदायों में बांटे जाने के बारे में बात कर रहे हैं. एक ओर हार्दिक पटेल हैं जो कि पाटीदारों को कांग्रेस के पक्ष में लाने में जुटे हुए हैं, दूसरी ओर, अल्पेश ठाकुर ओबीसी और जिग्नेश मेवानी दलित नेता के तौर पर उभरे हैं. इन तीन युवा तेज तर्रार नेताओं के कांग्रेस की तरफ झुकाव से गुजरात में पार्टी की जीत की उम्मीदें पैदा हो रही हैं. राहुल गांधी नरम हिंदुत्व का सहारा लेते हुए पूरे गुजरात में एक के बाद एक मंदिरों में जा रहे हैं.

पिछले 22 साल से गुजरात पर बीजेपी का शासन है. ऐसे में सपोर्ट के लिए मुस्लिम वोटरों को कांग्रेस में एकमात्र उम्मीद नजर आ रही थी. अब पार्टी का ध्यान दूसरे समूहों पर बढ़ने के साथ मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना घर कर रही है. दक्षिणी गुजरात में पहले चरण में 9 दिसंबर को चुनाव होने हैं और 21 नवंबर नामांकन पत्र दाखिल करने की आखिरी तारीख है.

सलीम के विधानसभा क्षेत्र 159 में 2.6 लाख वोटरों में करीब 92,000 मुस्लिम हैं. कुछ दिन पहले इसी इलाके के नानपुरा के चौक बाजार जैसी जगहों पर कांग्रेस विरोधी पोस्टर नजर आए. इन पोस्टरों में कांग्रेस को संदेश दिया गया था कि अगर पार्टी मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व नहीं देगी तो उसे मुस्लिम वोट भी नहीं मिलेंगे. हालांकि, स्थानीय कांग्रेस नेताओं द्वारा समझाए जाने पर इन पोस्टरों को हटा लिया गया. लेकिन, माहौल में तनाव नजर आ रहा है क्योंकि इस बात के कयास हैं कि कांग्रेस सूरत वेस्ट से किसी मुस्लिम उम्मीदवार को उतार सकती है.

मुस्लिम इलाकों में पहुंचने पर साफ सुथरे, विकसित सूरत वाली तस्वीर नहीं दिखतीं

मुस्लिम इलाकों में पहुंचने पर साफ सुथरे, विकसित सूरत वाली तस्वीर नहीं दिखतीं

इस इलाके में करीब 5,000 से 10,000 मुस्लिम हैं. इस इलाके में रहने वाले और करीब एक दशक से कांग्रेस से जुड़े हुए मुकद्दर रंगूनी कहते हैं, ‘इस इलाके से मुस्लिम कैंडिडेट जीत सकता है. हमारे लिए अपने प्रतिनिधित्व को जिंदा रखना जरूरी है. बीजेपी हमारी मौजूदगी से ही इनकार करती है. उनकी पार्टी से कोई यहां नहीं आया. यहां तक कि बाढ़ के दौरान सड़कों पर जलभराव होने पर भी कोई यहां नहीं आया. यहां के लोगों ने गुजरात पर शासन करने वाले विधायकों, सांसदों की शक्ल तक नहीं देखी है. इन लोगों के लिए उम्मीद की एकमात्र किरण कांग्रेस है और अगर वे हमें निराश करेंगे तो इसके बुरे परिणाम निकल सकते हैं.’ रंगूनी के घर तक पहुंचने के लिए आपको गलियों से होकर गुजरना पड़ता है जहां पर फर्नीचर, टायर और कबाड़ी वालों की दुकानें सड़कों तक पसरी हुई हैं. गलियां ग्रीस, मुर्गे-मुर्गियों के पंखों की गंदगी से पटी हुई हैं और बकरियां इधर-उधर बैठी नजर आती हैं. इस इलाके में अकेले मुकद्दर ही नाखुश नहीं हैं.

रोड-रास्ता-गटर के साथ ही यहां के नौकरियों की भी मांग कर रहे हैं. इनका आरोप है कि निचले स्तर की नौकरियां हिंदुओं को दी जाती हैं, वहीं निजी एंप्लॉयर्स उनके पिनकोड के चलते उन्हें नौकरियां देने से इनकार कर देते हैं. सीधी सड़क के दूसरे छोर पर हिंदू कहार समाज के लोग रहते हैं. मुकद्दर बताते हैं, ‘2014 में इस इलाके में दंगे हुए और उस वक्त भी कांग्रेस या बीजेपी का कोई बड़ा नेता मतभेदों को खत्म कराने यहां नहीं आया.’ मुकद्दर पूर्वी सूरत मलिन बस्तियों में हिंदू-मुस्लिम एकता समाज चलाते हैं.

मुकद्दर एक और प्रमुख मसले की ओर संकेत करते हैं. वह शहरी निकाय के सीमांकन में हुए बदलावों के बारे में बताते हैं. यह काम हर पांच-छह साल में होता है. वह पूछते हैं, ‘गोपीपुरा पारंपरिक रूप से बीजेपी का वोट बेस है, इसे हमारे इलाके में क्यों मिला दिया गया है?’ वह बताते हैं कि ओबीसी, झुग्गी और मुस्लिमों की गैरमौजूदगी वाले इलाकों को कांग्रेस के वोट कम करने के लिए उनके क्षेत्र से मिला दिया है. इस तबके को पारंपरिक तौर पर कांग्रेस का समर्थक माना जाता है.

पूराने सूरत पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों की सत्ता देख चुके एक वरिष्ठ नागरिक नूर मुहम्मद कहते हैं कि शासन ने पूरी तरह से मुस्लिमों के अस्तित्व को ही नकार दिया है. उन्हें लगता है कि बीजेपी ने कई तरीकों से यह संदेश दिया है कि ‘आपका वोट हमें नहीं चाहिए.’ इनमें से एक तरीका निश्चित तौर पर किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं देने का है. लेकिन, वोट नहीं मांगने का मतलब यह नहीं है कि वोट बेस ही नहीं है. यहां के स्थानीय लोगों का आरोप है कि बीजेपी स्थानीय लोकप्रिय नेताओं को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने के लिए रिश्वत देती है. कुछ को 50,000 रुपये मिलते हैं, तो कुछ को 1-2 लाख रुपये भी उनकी लोकप्रियता के हिसाब से दिए जाते हैं.

यहां के ज्यादातर नागरिकों की अभी भी प्रतिक्रिया यही है कि ‘हम तो अभी भी कांग्रेस को ही वोट देंगे.’ वे भले ही निराश हैं और गुस्से में हैं, लेकिन पूर्वी सूरत में 42 फीसदी वोटरों के लिए किसी विकल्प के न होने से शायद वे अभी भी कांग्रेस को छोड़कर कहीं और जाने की स्थिति में नहीं हैं.

सूरत के मुस्लिम इलाकों के कई आवेदन उनके पिनकोड देखकर कैंसल हो जाते हैं.

सूरत के मुस्लिम इलाकों के कई आवेदन उनके पिनकोड देखकर कैंसल हो जाते हैं.

दूसरी ओर, बीजेपी को लगता है कि सांप्रदायिक सोच के चलते वे अभी भी कांग्रेस से जुड़े हुए हैं. इस इलाके से मौजूदा बीजेपी विधायक रंजीत भाई गिलितवाला ने कहा कि पार्टी ने मुस्लिमों तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे. उन्होंन कहा, ‘गुजरात में हिंदू घरों में जिन मटकों से पानी पिया जाता है, वे मुस्लिमों के बनाए हुए होते हैं. जब कारोबार की बात आती है तो दोनों समुदाय सौहार्द से काम करते हैं. केवल चुनाव के मौके पर कांग्रेस बीजेपी को एक सांप्रदायिक पार्टी साबित करती है.’ वह बताते हैं कि लगातार इस तरह की छवि बनाने से मुस्लिम वोटर्स पार्टी से दूर बने हुए हैं.

1997 में बने गुजरात अल्पसंख्यक वित्त और विकास निगम की वित्तीय सहयोग योजना का 400 करोड़ रुपये का फंड है. यह एजेंसी छोटे कारोबारों और स्वरोजगार के लिए 3 लाख रुपये तक की वित्तीय मदद देने की स्कीम चलाती है. इसके अलावा भारत में उच्च शिक्षा और वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए 7.50 लाख रुपये, कृषि विकास के लिए 5 लाख रुपये तक, किराए पर चलाने के मकसद से खरीदी जाने वाली गाड़ियों के लिए 5 लाख रुपये तक और दिमागी रूप से कमजोर लोगों की मदद के लिए 3.5 लाख रुपये तक की मदद वाली योजनाएं यह एजेंसी चलाती है.

अल्पसंख्यकों के लिए सरकार के उठाए गए कदमों के बारे में गुजरात गवर्नमेंट माइनॉरिटी फाइनेंस एंड डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन एम के चिश्ती, जो कि एक सूफी संत हैं, हज कोटा के बारे में बताते हैं. वह कहते हैं कि गुजरे तीन साल में यह कोटा 4,000 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये कर दिया गया है. वह कहते हैं कि बीजेपी सदस्यता अभियान से राज्य में मुस्लिम प्राइमरी वोटरों की संख्या बढ़कर 5 लाख हो गई है. वह यह भी बताते हैं कि गुजरात कर्फ्यू और हिंसा मुक्त पहला राज्य बन गया है और मुस्लिमों की साक्षरता दर करीब 80 फीसदी पर पहुंच गई है. वह कहते हैं कि बीजेपी मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने जैसे ठोस काम कर रही है, जबकि राहुल गांधी केवल सॉफ्ट-हिंदुत्व का सहारा ले रहे हैं जिससे वोटर्स नाराज हो रहे हैं.

विधानसभा क्षेत्र 159 के काफी नजदीक जीवन ज्योति थियेटर के दूसरी ओर बीजेपी हेडक्वॉर्टर पर सूरत के पार्टी अध्यक्ष नितनभाई ठाकर ने स्थानीय मुस्लिमों द्वारा लगाए गए कांग्रेस विरोधी पोस्टरों पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. उन्होंने इसे पार्टी और मुस्लिमों के बीच का मसला बताया. सत्ताधारी पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर किसी मसले पर लोगों के विरोध के बारे में क्या ज्यादा उत्सुकता नहीं होनी चाहिए? मुकद्दर कहते हैं कि पूर्वी सूरत की दिक्कत यह है कि हम वोटर पहले हैं और नागरिक बाद में. वह कहते हैं कि सूरत नगरपालिका से पूछा जाना चाहिए कि गुजरे सालों में निचले स्तर की हजारों नौकरियों में कितने मुस्लिमों को मौका मिला है.

नौकरी के आवेदनों को पिनकोड के आधार पर खारिज किए जाने के चलते बीकॉम और बीए डिग्री धारकों को सफाई कर्मचारी या बिस्कुट बेचने जैसे काम अपनाने पड़ रहे हैं. वह बताते हैं कि लैंडलाइन टेलीफोन की रिक्वेस्ट भी अधिकारी इस आधार पर खारिज कर देते हैं क्योंकि वे ‘एम क्लास’ (एमः मुस्लिम) से ताल्लुक रखते हैं.

कांग्रेस को लेकर वफादारी पहले इमोशनल थी जो अब बेचैनी भरी हो गई है. लोग किसी भी ऐसे शख्स को चाहते हैं जो कि सेफ्टी और विकास की उन्हें गारंटी दे सके. हालांकि, जिस पार्टी पर उन्हें पूरा भरोसा था उन्हें निराशा मिली है, लेकिन एक वर्ग  ऐसा है जो कि ‘काम करो आने वोट ले जाओ’ (काम करो और वोट पाओ) को मानता है. यह गुजरात की उस मानसिकता को दिखाता है जिसमें काम को प्रभावी और शांतिपूर्ण तरीके से करने को तरजीह दी जाती है. इस इलाके के 26 साल के एडवर्टाइजिंग आंत्रप्रेन्योर मुहम्मद साहिब को लगता है कि कोई हिंदू कैंडिडेट शायद ज्यादा बेहतर आइडिया है क्योंकि कोई मुस्लिम चेहरा इस इलाके को और सांप्रदायिक कर सकता है, जबकि निचले तबके के मुस्लिमों की तमाम जरूरतों को पूरा करने वाले किसी संवेदनशील शख्स की आज जरूरत ज्यादा है.

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