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गुजरात में गाय पर कानून: गणतंत्र में सेंध लगा रहा धर्म

जो लोग चमड़े और मीट के कारोबार से जुड़े हैं, वे इस कानून की वजह से परेशान होंगे या किए जाएंगे

Aakar Patel Updated On: Apr 04, 2017 07:37 AM IST

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गुजरात में गाय पर कानून: गणतंत्र में सेंध लगा रहा धर्म

गुजरात विधानसभा ने गोहत्या पर एकदम अलग तरह का कानून पास किया है. राज्य ने पुराने एनिमल प्रिजर्वेशन कानून में बदलाव करके गाय और बैलों को मारने की सजा और सख्त कर दी है.

अब ऐसा करने पर दस साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा होगी. इसका मतलब है कि अब गुजरात में इंसान को मारना या जानवर को मारना एक बराबर जुर्म होगा. राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि वो गुजरात को शाकाहारी राज्य बनाना चाहते हैं. हालांकि मुख्यमंत्री ने आगे ये भी कहा कि, 'हम किसी भी खाने के खिलाफ नहीं हैं'. गुजरात के बाहर का कोई भी शख्स ये पूछ सकता है कि अगर आपको किसी भी खाने पर ऐतराज नहीं तो इसका यही मतलब हुआ न कि उनकी पार्टी यानी बीजेपी को किसी के बीफ खाने पर ऐतराज नहीं है.

लेकिन इस सवाल का असल जवाब है कि बीजेपी को बीफ खाने पर ऐतराज है. बीफ की वजह से ही ये नया कानून बना है. इस मामले का कानूनी पहलू ये है कि देश के संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में गायों और बैलों की सुरक्षा की बात लिखी हुई है. संविधान में लिखा है कि सरकार को आर्थिक वजहों से गोवंश की रक्षा करनी चाहिए. संविधान में ये बात उस वक्त लिखी गई थी जब बैलों से खेत की जुताई होती थी. अब वो वक्त बीत चुका है. किसी और देश में ऐसा तर्क नहीं दिया जाता. ये सिर्फ हिंदुस्तान की खूबी है. और ऐसा तर्क इसलिए दिया जाता है कि हिंदुओं को बीफ खाने से दिक्कत है.

हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है

भारत के बारे में ये कहा जाता है कि यहां ऐसा संविधान है जो किसी खास धर्म के लिए नहीं है. हम इस बात पर गर्व करते हैं कि हमारा संविधान पंथ निरपेक्ष है. हमारे मुकाबले पाकिस्तान राष्ट्र धर्म के इर्द-गिर्द ही रचा-बुना गया है. उसकी बुनियाद ही धर्म थी. मगर सच तो ये है कि भारत में बहुत से कानून ऊंची जाति के हिंदुओं की परंपराओं के हिसाब से बनाए गए हैं. इसकी एक और मिसाल शराबबंदी है. संविधान इसके भी खिलाफ है. समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास कहते हैं कि शराबबंदी संस्कृति की देन है. ये सच है.

बीफ की तरह शराब पर पाबंदी भी दूसरे बहानों से लागू की जाती है. तमाम भारतीय राज्यों ने शराबबंदी के तजुर्बे किए हैं. इनमें से ज्यादातर नाकाम रहे हैं.

Wine drinking

बिहार ने हाल ही में ऐसा कानून बनाया है जिसमें शराब रखना भी जुर्म है. अगर मेरे घर में शराब की बोतल मिलती है, तो मेरे साथ साथ मेरी पत्नी और घर में रहने वाले बाकी सदस्य भी इस जुर्म में साझीदार माने जाएंगे. ये कानून इतना हास्यास्पद है कि ऐसा लगा था कि राज्य सरकार इसे लागू नहीं करेगी. आखिर में अदालतों को इस मामले में दखल देकर इस कानून पर रोक लगानी पड़ी. लेकिन अब इस कानून को नए अवतार में लागू कर दिया गया है. जिन्हें लगता है कि हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला करने के लिए नीतीश कुमार सबसे अच्छे नेता हैं, उन्हें इस कानून की नजर से नीतीश को तौलना चाहिए.

अदालतें भी हमेशा किसी इंसान की आजादी के साथ नहीं खड़ी होतीं. इन दिनों अदालत के आदेश पर हाइवे के पांच सौ मीटर के दायरे से शराब की दुकानें हटाई जा रही हैं. उत्तर पूर्व के कुछ पहाड़ी राज्यों में, जहां सड़कें कम हैं, वहां तो शराब की कमोबेश हर दुकान इस आदेश के बाद बंद हो जानी है. हालांकि अदालत ने इन राज्यों को शराबबंदी के इस आदेश से कुछ रियायतें दी हैं. मगर इनके पीछे के तर्क मेरी समझ से तो परे हैं. अब अगर हाइवे के पास की शराब की दुकानें बंद करना सुरक्षा का मामला है तो इससे तो कोई समझौता नहीं होना चाहिए.

निजी आजादी का मामला

मेरे हिसाब से तो ये किसी नागरिक की निजी आजादी का मसला है. किसी भी देश को ये यकीन करना चाहिए कि उसके नागरिक बड़ी जिम्मेदारी से शराब पीने का अपना शौक पूरा करेंगे. जो लोग शराब पीकर हंगामा करते हैं, या दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन ऐसी पाबंदियां लगाकर शायद कोई भी प्रशासन ये कहना चाहता है कि उसकी नजर में हर नागरिक गैरजिम्मेदार है. यानी सरकार या प्रशासन लोगों की निजता में दखल दे रहा है और उसकी जिंदगी में पाबंदियों का ढेर लगा रहा है.

ऐसे तमाम कदमों से धर्म हमारी जिंदगी, हमारे राज-काज का हिस्सा बनता जा रहा है. दूसरे देशों में भी ऐसा होता है. पाकिस्तान की ही मिसाल लीजिए. वहां के लोग बसंत उत्सव मनाना, पतंगें उड़ाना पसंद करते हैं. लेकिन इसे गैरइस्लामिक मानकर इस पर सरकार ने पाबंदी लगा दी है. वहां की अदालतों का मानना है कि पतंग उड़ाने से परिंदों को खतरा होता है. नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है. इसीलिए अदालतें भी इस पाबंदी के हक में हैं. ये ठीक उसी तरह का मामला है जैसे भारत में शराबबंदी जैसे आदेशों का है.

पवित्र गाय

फर्क ये है कि पाकिस्तान ये दावा नहीं करता कि उसका संविधान और कानून धर्मनिरपेक्ष है. वो खुद को मुस्लिम राष्ट्र मानते हैं. हालांकि कई पाकिस्तानियों को इस पर ऐतराज है. क्योंकि आज के दौर में सिर्फ धर्म की बुनियाद पर कोई राष्ट्र नहीं चल सकता. भारत में इसका ठीक उल्टा है. यहां कुछ लोगों का मानना है कि हमारा देश हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं है. हमें हिंदू मान्यताओं को और तरजीह देनी चाहिए. इन्हीं भावनाओं के चलते गुजरात में गोवध पर उम्र कैद की सजा देने जैसे कानून बन रहे हैं.

हमें सबसे पहले तो ये मानना होगा कि ये हिंदुत्व को एक खास चश्मे से देखने की कोशिश है. इस विचारधारा को बीजेपी तेजी से आगे बढ़ा रही है. इसे नागरिकों पर थोपा जा रहा है. जो लोग चमड़े और मीट के कारोबार से जुड़े हैं, जैसे दलित और मुसलमान, वो इस कानून की वजह से परेशान होंगे, या किए जाएंगे.

मगर मजे की बात ये है कि हम उन्हें भरोसा ये देंगे कि हम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं. यहां कोई भी कानून किसी खास धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं बनाया जाता.

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