विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

गुजरात चुनाव 2017: राहुल का प्यार नहीं, GST से नाराजगी दिला सकती है कांग्रेस को वोट

कपड़ा कारोबारी सबसे ज्यादा इस बात से खफा हैं कि जीएसटी लागू करने के दौरान सरकार ने उनसे बात करना तक मुनासिब नहीं समझा

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Nov 22, 2017 02:01 PM IST

0
गुजरात चुनाव 2017: राहुल का प्यार नहीं, GST से नाराजगी दिला सकती है कांग्रेस को वोट

सूरत को देश में कपड़ा उद्योग का गढ़ माना जाता है. यहां हर तरफ रेशम (सिल्क), सिंथेटिक, सूती (कॉटन), विस्कोस और नीले, सफेद, हरे, लाल, काले रंग के नायलॉन के छपाईदार चमचमाते कपड़ों के गट्ठर नजर आते हैं. सूरत की आबोहवा में हर वक्त कपड़ों की अनोखी महक बसी रहती है. सुबह से लेकर देर रात तक बाजारों में कपड़ा खरीदारों और व्यापारियों की रौनक नजर आती है.

सूरत के मुख्य बाजार रिंग रोड पर कपड़ों की दुकान चलाने वाले नितिन भाई का कहना है कि, ‘सूरत मेहनत से नहीं डरता है’. नितिन से जब गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानी जीएसटी से उनकी जिंदगी और कारोबार पर पड़ने वाले असर के बारे में सवाल पूछा गया, तो उनका दर्द छलक आया. नितिन ने बताया कि, जीएसटी की वजह से सूरतवालों को बहुत मुसीबतें उठाना पड़ रही हैं. नितिन ने आगे कहा कि बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सूरत के कपड़ा कारोबारियों को बहुत निराश किया है.

Surat Cloth Business

जीएसटी जैसा जटिल और विचित्र टैक्स व्यापारियों के लिए जी का जंजाल बन गया

सूरत के कपड़ा उद्योग से जुड़े कारीगर और मजदूर कपड़ा निर्माण की अलग-अलग प्रक्रियाओं में महारथ रखते हैं, लेकिन उनमें से कमोवेश सभी ने मिडिल स्कूल तक की भी शिक्षा हासिल नहीं की है. नितिन ने बताया कि सूरत के करन भाई लेस वाला, सूरत के उत्तर-पूर्वी इलाके वराच्छा के विमल भाई जरी वाला, उत्तरी सूरत के कतार्गम इलाके के रसिक भाई और गुड्डू भाई जैसे कपड़ों पर लेस लगाने वाले और कढ़ाई-छपाई करने वाले कारीगरों को यह भी नहीं पता है कि कोई सरकारी फॉर्म कैसे भरा जाता है.

नितिन भाई 16 साल से सिंथिटिक कपड़ों का व्यापार करते आ रहे हैं, उनके मुताबिक, '17 अलग-अलग चरणों और प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद एक साड़ी बनती है. कपड़ा व्यापारी और कारीगर एक-दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं. क्या इन कारीगरों के पास इतना खाली वक्त है कि, ये जीएसटी चुकाने के लिए किसी अकाउंटेंट की सेवाएं ले सकें? क्या ये अनपढ़ कारीगर कंप्यूटर या स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं? गुजरात के अधिकतर लोगों को व्यापार की बुनियादी जानकारी ही होती है, हम लोग अर्थशात्र के विशेषज्ञ नहीं हैं. जीएसटी जैसा जटिल और विचित्र टैक्स हम व्यापारियों के लिए जी का जंजाल बन गया है. जीएसटी से व्यापारियों को हो रही परेशानी का असर मतदान में साफ नजर आएगा.'

जिस नीयत और इरादे के साथ सरकार ने जीएसटी को लागू किया, उससे व्यापारियों को जरा भी दिक्कत नहीं हैं. व्यापारियों की नाराजगी तो जीएसटी को लागू करने के तरीके से है. व्यापारी इस बात से भी खफा हैं कि जीएसटी लागू करने के दौरान सरकार ने उनसे बात करना तक मुनासिब नहीं समझा.

जीएसटी को लेकर कहा जा रहा है कि आजाद भारत का यह सबसे बड़ा टैक्स रिफॉर्म है

जीएसटी के बारे में कहा जा रहा है कि आजाद भारत का यह सबसे बड़ा टैक्स रिफॉर्म है

बीजेपी और जीएसटी से नाराज कारोबारियों ने कांग्रेस का 'हाथ' थाम लिया

ऑल इंडिया टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और टेक्सटाइल जीएसटी संघर्ष समिति के कन्वीनर ताराचंद कसार बीजेपी के पुराने समर्थक हुआ करते थे. लेकिन केंद्र सरकार के जीएसटी ने ताराचंद को इतना आहत किया कि, उन्होंने बीजेपी से अपना पुराना रिश्ता तोड़ लिया. उन्होंने हाल ही में कांग्रेस का 'हाथ' थाम लिया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाल के सूरत दौरे के दौरान ताराचंद ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. यहां अपने रोड शो में राहुल ने जीएसटी के मुद्दे पर मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला था.

राहुल ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताकर सरकार की खिल्ली भी उड़ाई थी. राहुल से मिलकर ताराचंद खासे गदगद और आश्वस्त नजर आए थे. ताराचंद को उम्मीद थी कि, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उन्हें अपना उम्मीदवार जरूर बनाएगी. लेकिन कांग्रेस ने ताराचंद को टिकट नहीं दिया. इसके बावजूद ताराचंद निराश नहीं हैं. ताराचंद को यकीन है कि राहुल गांधी के दबाव में मोदी सरकार जल्द ही जीएसटी में बड़ा बदलाव करेगी.

ताराचंद के मुताबिक, हमने जीएसटी के मुद्दे पर केंद्र सरकार को कई चिट्ठियां लिखीं. हमने सरकार से बार-बार यही सवाल पूछा कि, आखिर जीएसटी को लागू करने के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों की गई. मगर सरकार की तरफ से हमें एक बार भी जवाब नहीं आया. जीएसटी लागू करने से पहले सरकार ने हम व्यापारियों को डेमो देना भी उचित नहीं समझा. जीएसटी की रूपरेखा बनाने और उसकी दरें तय करने से पहले सरकार ने टेक्सटाइल एसोसिएशन से मशविरा करना भी गवारा नहीं किया. दरअसल सरकार को व्यापारियों की परेशानियों की चिंता ही नहीं है. हमारी मांग है कि सूत और सभी तरह के धागों को टैक्स के दायरे से बाहर रखा जाए.'

Surat Cloth Merchant

सरकार ने हाल ही में सूत और सभी तरह के धागों के टैक्स स्लैब में बदलाव किया है. जीएसटी के तहत सूत और धागों पर पहले 18 फीसदी की दर से टैक्स तय किया गया था, जिसे घटाकर अब 12 फीसदी कर दिया गया है. इसके अलावा जीएसटी काउंसिल हर तिमाही टैक्स अदा करने वाले उन कपड़ा व्यापारियों को राहत देने पर विचार कर रही है, जिनका सालाना टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपए तक है. लेकिन कपड़ा व्यापारी सरकार के इस आश्वासन से भी खुश नहीं है, क्योंकि कपड़ा कारोबार में सालाना 1.5 करोड़ रुपए का टर्नओवर आम बात है.

सूरत में रोजाना करीब 2.5 करोड़ मीटर रॉ फैब्रिक का उत्पादन 

गुजरात सरकार राज्य में निवेश बढ़ाने और उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर हर दो साल में एक बार वाइब्रेंट गुजरात समिट का आयोजन करती है. वाइब्रेंट गुजरात के आठवें संस्करण यानी 'वाइब्रेंट गुजरात समिट 2017' के ब्रोशर के मुताबिक, कृत्रिम फाइबर और फिलामेंट फैब्रिक के उत्पादन में सूरत देश भर में पहले पायदान पर है. कृत्रिम फाइबर और फिलामेंट फैब्रिक के उत्पादन का 40 फीसदी हिस्सा देश को सूरत से मिलता है. पूरे गुजरात में रोजाना लगभग 3 करोड़ मीटर रॉ फैब्रिक का उत्पादन किया जाता है. जबकि अकेले सूरत में रोजाना करीब 2.5 करोड़ मीटर रॉ फैब्रिक का उत्पादन होता है.

सरकार से नाराज नजर आ रहे ताराचंद ने कहा कि, 'सरकार सूरत की क्षमताओं और सूरतवासियों की कमजोरियों से बखूबी वाकिफ है. ऐसे में सरकार हम लोगों से किसी भी तरह का संवाद करने से क्यों कतरा रही है?'

सूरत समेत पूरे गुजरात में ज्यादातर लोग जो कांग्रेस का दामन थाम रहे हैं, वही लोग ही राज्य और केंद्र की बीजेपी सरकार पर अपना गुस्सा दिखा रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी से नाराजगी के बावजूद इन लोगों की नजर में राहुल गांधी का महत्व ज्यादा नहीं है. ज्यादातर लोग राहुल को विकल्प पर तौर पर नहीं देख रहे हैं.

सूरत के उधाना बाजार में कपड़ों का कारोबार करने वाले बलवंत जैन भी जीएसटी के बड़े विरोधी हैं. जीएसटी के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान बलवंत ने अपनी कमीज उतारकर विरोध जताया था. बलवंत के मुताबिक, 'जीएसटी के चलते हम लोगों को कारोबार में लेन-देन का हिसाब बार-बार दर्ज करना पड़ रहा है. जरा सोचिए, अगर मैं एक लेस लगाने वाला कारीगर होता और 1000 रुपए के ऑर्डर पर मेरी कमाई 200 रुपए होती, तब क्या मैं जीएसटी का हिसाब रखने के लिए एक कंप्यूटर खरीद पाता? या किसी बिजनेस कंसल्टेंट की सेवाएं ले पाता?'

बलवंत ने आगे कहा कि, गांधी जी ने चरखा चलाकर खादी को देश भर में मशहूर कर दिया था, लेकिन अब चरखा एक ऐसी विचारधारा बनकर रह गया है, जो सरकार की निगाह-ए-करम का मोहताज है.

Cloth

कारोबार के लिए राज्य सरकार सभी तरह की सहूलियतें देती है

सूरत के सेंट्रल मार्केट से दक्षिण की ओर चलने पर सोस्यो सर्किल नाम का इलाका आता है. यहां के कपड़ा निर्माताओं और व्यापारियों की अलग ही परेशानियां है. स्टैंडर्ड मिल चलाने वाले एक कपड़ा व्यापारी ने बताया कि, वह बीजेपी के कट्टर समर्थक रहे हैं. वह गुजरात में बरसों से कपड़ों का कारोबार करते आ रहे हैं, क्योंकि यहां पर कारोबार के लिए राज्य सरकार सभी तरह की सहूलियतें देती है. लेकिन अब केंद्र सरकार के गुड्स एंड सर्विस टैक्स ने उनके व्यापार को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है. हाल ही में उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक कारोबारी के पास कपड़ों की खेप भेजी थी, लेकिन वो कारोबारी ई-वे बिल उपलब्ध कराने में नाकाम रहा, लिहाजा मजबूरी में उसने कपड़ों की खेप उत्तर प्रदेश के बॉर्डर से ही सूरत वापस लौटा दी.

पीड़ित व्यापारी के मुताबिक, 'गुजरात में श्रम कानून दूसरे राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल की अपेक्षा काफी सरल हैं. लेकिन पिछले कुछ महीनों से जब से जीएसटी लागू हुआ है, तब से बाजार में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है. जीएसटी की दरों और उसकी जटिल प्रक्रियाओं को समझना व्यापारियों के लिए मुश्किल हो गया है.'

आपको बता दें कि ई-वे बिल दरअसल इलेक्ट्रॉनिक वे बिल होता है, जो माल को कहीं भी लाने-ले जाने के काम आता है. ई-वे बिल को जीएसटीएन पोर्टल पर जेनरेट किया जाता है. 50 हजार रुपए से ज्यादा कीमत के माल को कहीं लाने-ले जाने के लिए ई-वे बिल उपलब्ध कराना अनिवार्य है.

एक और कपड़ा व्यापारी का मानना है कि, जीएसटी के चलते सूरत कपड़ा उद्योग से जुड़े ज्यादातर लोग केंद्र सरकार से खफा हैं, अपनी हताशा की वजह से यह लोग इस बार कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं, खास बात है कि यह वह व्यापारी वर्ग है जो बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है.

इस व्यापारी के मुताबिक, 'हम लोग जिस शख्स को माल (कपड़ा) भेजते हैं, वह ई-वे बिल उपलब्ध कराता है. कभी-कभी लोग चाहते हैं कि, मैं उनके सिस्टम में लॉग इन कर के उनका ई-वे बिल तैयार कर दूं. कभी-कभी कोई कारोबारी यह बताता है कि, उसका अकाउंटेंट छुट्टी पर गया है, लिहाजा वो वक्त पर ई-वे बिल तैयार करने में असमर्थ हैं. ई-वे बिल तैयार करना बहुत कठिन प्रक्रिया है. इसे समझने के लिए न तो लोगों के पास वक्त है और न ही फालतू पैसा.'

Surat Cloth Business

जीएसटी से कपड़ा उद्योग की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे व्यवस्थित हो रही है

सूरत के कपड़ा निर्माता हर्षित जरीवला जीएसटी के समर्थक हैं. हर्षित की पिछली तीन पीढ़ियां कपड़ा उद्योग से जुड़ी रही हैं. हर्षित का मानना है कि जीएसटी से कपड़ा उद्योग की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे व्यवस्थित हो रही है, जो जल्द ही औपचारिक अर्थव्यवस्था में तब्दील हो जाएगी. यही वजह है कि उन्होंने जीएसटी का खुले दिल से स्वागत किया है.

हर्षित के मुताबिक, 'ई-वे बिल के जरिए सरकार देश के सभी राजमार्गों पर भेजे जाने वाले हर कार्गो पर नजर रख सकेगी. इस प्रक्रिया से व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों के बीच जवाबदेही बढ़ेगी. साथ ही माल अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचने की गारंटी भी मिलेगी.'

हर्षित ने आगे बताया कि 'जीएसटी लागू होने से पहले जब कोई व्यापारी मुंबई से भिवंडी माल भेजता था, तब कभी-कभी व्यापारी या ट्रांसपोर्टर अपने कार्गो या ट्रक का गंतव्य (लोकेशन) सूरत या कोई दूसरा राज्य दिखा देता था. ऐसा कर के व्यापारी और ट्रांसपोर्टर टैक्स बचा लेते थे. दरअसल सेंट्रल सेल्स टैक्स (केंद्रीय सरकार का टैक्स) 2 फीसदी है, जबकि वैट यानी वेल्यू ऐडेड टैक्स (राज्य सरकार का टैक्स) 5 फीसदी है. केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी के चलते पहले लोग जमकर धोखाधड़ी और टैक्स चोरी करते थे.'

हर्षित का कहना है कि, कपड़ा उद्योग एक कच्ची अर्थव्यवस्था है. ऐसे में लोगों को यह समझना चाहिए कि, जीएसटी उस वक्त लागू किया गया जब कपड़ा उद्योग पहले ही से बदलाव के दौर यानी संक्रमण काल से गुजर रहा था.

हर्षित के मुताबिक, 'जीएसटी लागू होने से पहले, सूत पर 18 फीसदी टैक्स लगा करता था, औैर हम लोग कपड़े को टैक्स फ्री बेचा करते थे. इसका मतलब यह है कि, कपड़ा निर्म़ाता-थोक व्यापारी-खुदरा विक्रेताओं की श्रृंखला में, केवल खुदरा विक्रेताओं को ही 5 फीसदी वैट चुकाना पड़ता था. लेकिन अब श्रृंखला में हर किसी को 5 फीसदी टैक्स का भुगतान करना पड़ता है.'

केवल अपनी राजनीति चमकाकर चुनाव लड़ना चाहते हैं

हर्षित को लगता है कि सूरत के कपड़ा उद्योग से जुड़े जो लोग जीएसटी को लेकर बीजेपी की आलोचना और कांग्रेस का समर्थक कर रहे हैं, उनका आम जनता की तकलीफों से कोई वास्ता नहीं है, यह लोग केवल अपनी राजनीति चमकाकर चुनाव लड़ना चाहते हैं.

एनआईटी सूरत से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले हर्षित ने आगे बताया कि, पिछले दो सालों में, सूरत में करीब 7 से 8 लाख पावर लूम्स एक-एक कर बंद हो चुके हैं. ज्यादातर कपड़ा निर्माता अपने यहां आयातित मशीनें लगवा रहे हैं और इसी में निवेश कर रहे हैं. कपड़ा निर्माताओं को इटली की जैक्वार्ड मशीन खूब रास आ रही है. कपड़ा बनाने वाली इस मशीन पर करीब 80 लाख रुपए तक की लागत आती है. जबकि जैक्वार्ड मशीन के मुकाबले कहीं सस्ते 18 हजार रुपए कीमत के पावर लूम्स अब जंग खा रहे हैं.

Surat Cloth Business

हर्षित के मुताबिक, 'सूरत का कपड़ा उद्योग पहले ही से बदलाव के दौर से जूझ रहा है. अब इस बदलाव को लेकर लोगों में भय और चिंता है. उच्च स्तरीय, सजावटी और महंगे कपड़े लोकप्रिय हो रहे हैं और सूरत के पारंपरिक कपड़ों की मांग घट रही है. पिछले दो साल में, एक लाख से ज्यादा पावर लूम्स बर्बाद होकर बंद हो चुके हैं.'

एनआईटी सूरत में हर्षित के सहपाठी रहे रोहिन दुमासवाला के परिवार के पास 96 पावर लूम्स हैं. उनका परिवार उत्तरी सूरत के कतार्गम इलाके में बुनाई और कपड़ा निर्माण की एक बड़ी यूनिट का संचालन करता है.

रोहिन के मुताबिक, 'हमारे इलाके में 10 हजार से ज्यादा पावर लूम्स हैं, लेकिन यहां टैक्निकल अपग्रेडेशन (तकनीकी उन्नयन) बेतरतीब है. पहले सरकार हमें सब्सिडी वाले बेहतर लोन की पेशकश करती थी, लेकिन वर्ष 2015 के बाद यह सब्सिडी 15 फीसदी कम हो गई है. अब जीएसटी ने इस मामले को कठिन और जटिल बना दिया है. अब फायनेंसिंग (फंडिंग) कठिन हो गई है, क्योंकि लोग 18 फीसदी जीएसटी वसूल करने लगे हैं. हर कारोबार वो चाहे बड़ा हो या छोटा, उसे फायनेंसिंग की जरूरत पड़ती है.'

उन समस्याओं से न जूझना पड़ता, जिनका सामना उसे करना पड़ रहा है

जीएसटी को अच्छा कदम मानते हुए रोहिन ने आगे बताया कि आने वाले वक्त में लोगों को जीएसटी से बहुत फायदा होगा, लेकिन जीएसटी को लागू करने से पहले सरकार को कपड़ा उद्योग से जुड़े लोगों से बात करनी चाहिए थी. जीएसटी की रूपरेखा बनाते वक्त अगर व्यापारियों की राय ली जाती तो सरकार को उन समस्याओं से न जूझना पड़ता, जिनका सामना उसे फिलहाल करना पड़ रहा है.

सूरत नी कमानी, सूरत मां समानी (सूरत में जो कमाया जाता है, वो सूरत में ही रह जाता है). काम और पैसों को लेकर सूरतवालों का यह दृष्टिकोण उनकी नैतिकता और संस्कृति की पहचान है. सूरत के लोगों ने बरसों से जो जीवन शैली अपना रखी है, उसमें कोई भी आर्थिक व्यवधान बड़ी हलचल पैदा कर देता है. यही वजह है कि जीएसटी को लेकर यहां भारी उथलपुथल मची हुई है. यहां तक कि जीएसटी से खफा सूरत के व्यापारी बीजेपी से अपना 22 साल पुराना रिश्ता तक तोड़ने का मन बना चुके हैं. हालांकि सूरत के कपड़ा व्यापारियों की कथनी और करनी की सच्चाई तो 9 दिसंबर को पता चलेगी, जब यहां गुजरात की अगली सरकार के लिए मतदान होगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi