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गुजरात चुनाव 2017: मनमोहन सिंह का भावुक जवाब कहीं नुकसान न पहुंचा दे

सवाल उठता है कि क्या बीजेपी इतनी कमजोर राजनीतिक पार्टी है, जो विपक्षी दल के नेताओं के एक दूसरे देश के राजनयिकों के साथ डिनर से डर कर चिंता में पड़ जाती है?

Bikram Vohra Updated On: Dec 14, 2017 01:48 PM IST

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गुजरात चुनाव 2017: मनमोहन सिंह का भावुक जवाब कहीं नुकसान न पहुंचा दे

जब कोई हमें खाने पर आमंत्रित करता है, तब उस शख्स की नजर में हमारा महत्व कुछ खास या अपनेपन से भरा होता है. हम सामने वाले की दावत कुबूल करें या नहीं, यह हमारे विवेक और सुविधा पर निर्भर करता है. लेकिन दावत कुबूल करने से पहले मेजबान से उसकी मेहमान सूची के बारे में पूछताछ करना सरासर बेवकूफी कहलाएगी.

इसके अलावा, किसी दावत या पार्टी में अगर आपको कोई ऐसा शख्स मिल जाता है, जिसे आप नापसंद करते हैं, तो आप उसकी अनदेखी करते हुए बचकर निकल जाते हैं. अगर वह शख्स पार्टी में जानबूझकर आपसे घुलने-मिलने की कोशिश करता है, तो आप विनम्रता के साथ इनकार करके उससे दूरी बना लेते हैं. हम सभी लोगों ने अपनी जिंदगी में कभी न कभी ऐसा जरूर किया होगा.

वह लोग जो हमें नापसंद हैं, वह लोग जो कभी हमारे दोस्त हुआ करते थे, वह लोग जिन्होंने हमारा दिल तोड़ा और हमें निराश किया, वह लोग जिनसे हमने पैसे उधार लिए या जिन्हें हमने पैसे उधार लिए वगैरह वगैरह. ऐसे लोगों से हमने किसी महफिल में कभी न कभी दूरी जरूर बनाई होगी.

किसी पार्टी या दावत में अगर हमें कुछ मेहमान पसंद न आएं तो हम अपने मेजबान से उस बारे में सवाल कर सकते हैं. हम अपने मेजबान से पूछ सकते हैं कि, उसने भिन्न-भिन्न तरह के (अलग-अलग विचारधारा वाले) लोगों को एक छत के नीचे जमा करने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया.

अगर किसी पार्टी में आए मतभिन्नता वाले लोगों से हमें दिक्कत होती है, तो हम उस पार्टी को बीच में ही छोड़कर घर वापस लौट सकते हैं. हम सभी कभी न कभी ऐसा कर चुके हैं. हालांकि इस तरह से किसी पार्टी को छोड़कर आना कायरता की निशानी भी समझी जाती है. ऐसे में भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री को अपनी जमीन पर एक पाकिस्तानी राजदूत की मौजूदगी से भला डर क्यों होना चाहिए?

अगर मनमोहन सिंह पार्टी से चले आते तो?

पद और वरिष्ठता में दोनों के बीच कोई बराबरी नहीं है, लिहाजा ऐसे में मनमोहन सिंह का महफिल छोड़कर भाग जाना कहां तक उचित होता? अगर मनमोहन सिंह महफिल बीच में छोड़कर वहां से चले आते तो भी उस बात को मुद्दा बनाया जाता. हमें भूलना नहीं चाहिए कि मनमोहन सिंह जिस पार्टी (दावत) में शामिल होने पहुंचे थे, उसका आयोजन दिल्ली में किया गया था, इस्लामाबाद में नहीं.

मोदी और उनकी टीम ने गुजरात चुनाव के मद्देनजर इस डिनर पार्टी के मुद्दे को जोरशोर से उठाया. दरअसल मोदी और उनके सिपहसालार हमें विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि राहुल गांधी और मनमोहन सिंह ने बीजेपी को गुजरात की सत्ता से बेदखल करने के लिए पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिश रची है.

सवाल उठता है कि क्या बीजेपी इतनी कमजोर राजनीतिक पार्टी है, जो विपक्षी दल के नेताओं के एक दूसरे देश के राजनयिकों के साथ डिनर से डर कर चिंता में पड़ जाती है? और अगर कांग्रेस नेताओं की दुश्मन देश के साथ दोस्ती बहाल करने की यह पहल कोई गुनाह है, तो हमें इस्लामाबाद के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को तोड़ देना चाहिए. कम से कम हमें अपनी नीति पर ईमानदारी के साथ कायम तो रहना चाहिए.

तो फिर प्रधानमंत्री की 'पाकिस्तानी मुलाकातों' का क्या?

आपको फिर एक ऐसे प्रधानमंत्री की जरूरत भी नहीं है, जो ‘सरप्राइज’ देता हुआ अचानक पाकिस्तान पहुंच जाए. शिष्टाचार और सदाचार के नाम पर नवाज शरीफ के घर जाकर चाय का लुत्फ ले और उनकी पोती की शादी में शामिल हुआ हो. लेकिन मोदी जैसा ही शिष्टाचार निभाने पर और महज एक डिनर पार्टी में शरीक होने पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया जा रहा है.

मनमोहन सिंह पर लगे यह आरोप वाकई बहुत गंभीर हैं. ऐसा लगता है कि इन आरोपों ने मनमोहन सिंह के अंदर के शेर को जगा दिया है. खुद पर लगे आरोपों से आहत होकर ही शायद मनमोहन सिंह दहाड़ते हुए नरेंद्र मोदी से माफी मांगने को कह कह रहे हैं. मनमोहन सिंह की यह भावुक मांग राहुल की तुलना में मोदी को काफी नुकसान पहुंचा सकती है.

ManmohanSingh

मोदी के आरोपों से मनमोहन सिंह के दिल को गहरा आघात पहुंचा है. मनमोहन सिंह का दर्द उनके शब्दों से साफ झलकता है, देखिए इस मसले पर उन्होंने क्या कहा- 'मैं, मेरे बारे में फैलाए गए झूठ और अफवाह से बेहद दुखी और आहत हूं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उद्देश्य से भटक गए हैं, वह यह सब राजनीतिक फायदे के लिए कर रहे हैं. यह बहुत दुखद और खेदजनक बात है कि मोदी सत्ता लोभ के चलते पूर्व प्रधानमंत्री समेत सभी संवैधानिक पदों को अपमानित और कलंकित कर रहे हैं.'

पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ असभ्य भाषा का चलन क्यों बन गया है?

मनमोहन सिंह का सवाल वाकई प्रासंगिक है और वह इसका जवाब पाने के हकदार हैं. क्या प्रधानमंत्री पद को ऊल-जुलूल और अनर्गल बयानों के जरिए अपमानित नहीं किया जा रहा है? क्या पूर्व प्रधानमंत्री के लिए असभ्य और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया है? सभी जानते हैं कि यह असभ्य भाषा इन दिनों मोदी के सार्वजनिक भाषणों की पहचान बन चुकी है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली जेटली भी इस मामले में मोदी से पीछे नहीं हैं. उन्होंने भी मनमोहन सिंह पर आरोप लगाते हुए पूछा है कि, पाकिस्तानियों से मिलने और उनका मनोरंजन करने से पहले क्या विदेश मंत्रालय से इजाजत ली गई थी या नहीं. जहां तक मेरी जानकारी है कि भारत अभी भी एक लोकतांत्रिक देश है. लिहाजा, पाकिस्तानी राजनयिक अगर बतौर मेहमान हमारे देश में आए हैं, तो इसमें कतई गलत बात नहीं है.

साल 1961 के वियना कन्वेंशन के तहत सभी राजनयिकों को ऐसे अधिकार दिए गए हैं. मणिशंकर अय्यर की पार्टी में शामिल हुए पाकिस्तानी राजनयिकों को भी यकीनन यह अधिकार मिला हुआ है. जब विश्वसनीयता को हद से ज्यादा खींचा-ताना जाता है, तब हमें बेतुकी बातों और घटनाओं पर विश्वास कर उन्हें स्वीकार करने के लिए कहा जाता है. लेकिन ऐसे बातों पर यकीन करना इतना आसान नहीं होता है, क्योंकि बेतुकी बातों के सिर-पैर नहीं होते हैं. लिहाजा ऐसे में आपको यह पूछना चाहिए कि सत्ता के गलियारों में आखिर यह हो क्या रहा है?

rahul gandhi manmohan singh

राजनीति के चक्कर में देश की छवि को नुकसान

अगर हम दुनिया को यह धारणा बनाने का मौका देंगे कि पाकिस्तान ने हमारे एक राज्य की सरकार को गिराने के लिए हमारी ही धरती पर बैठकर साजिश रची, तो भारत की छवि को बहुत नुकसान पहुंचेगा. खासकर पाकिस्तान को तो इस बात पर बहुत मजा आएगा.

आप खुद ही गौर करिए कि मनमोहन सिंह कितनी नाराजगी के साथ हमारे राजनीतिक दलों के नैतिक पतन की ओर इशारा कर रहे हैं. सच में फिलहाल हमारे देश के नेताओं की राजनीति कीचड़ औेर गंदगी में तैरती नजर आ रही है. एक वाजिब सवाल: क्या मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ कुटिल साजिश रचने के लिए इक्का-दुक्का पाकिस्तानी राजनयिकों की मदद जरूरत है?

संभल कर प्रधानमंत्री महोदय. मनमोहन सिंह आपके लिए अभिशाप भी साबित हो सकते हैं. उनकी तुलना किसी युवा लड़के से करने की गलती न करें, वरना आपको इसका बड़ा खामियाजा उठाना पड़ सकता है.

Gujarat Election Results 2017

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