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एग्जिट पोल: 'मोदी इस बार नहीं जीत सकते हैं' का जुमला क्यों नहीं चलने वाला

मैंने जमीन पर इन चीजों को पकड़ने की कोशिश की है. मुझे ऐसा कुछ भी नहीं लगा कि मोदी के नीचे से जमीन खिसक रही है. यही चीज एग्जिट पोल्स से भी दिख रही है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Dec 15, 2017 03:26 PM IST

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एग्जिट पोल: 'मोदी इस बार नहीं जीत सकते हैं' का जुमला क्यों नहीं चलने वाला

एग्जिट पोल्स के नतीजे आ गए हैं. ज्यादातर में नरेंद्र मोदी के लिए आरामदायक जीत का अनुमान लगाया गया है. इस बार के चुनावों में भी वही पुरानी चिरपरिचित कहानी देखने को मिली है. यह कहानी है, ‘मोदी इस बार क्यों नहीं जीत सकते.’

विंस्टन चर्चिल ने अपने मशहूर वाक्य में रूस को एक ‘रहस्य के अंदर पहेली में लिपटा हुआ एक रहस्य’ बताया था. यही चीज गुजरात के असेंबली इलेक्शंस के बारे में भी कही जा सकती है. लेकिन, इसमें एक अहम ट्विस्ट हैः गुजरात में चुनाव रहस्य के अंदर पहेली में लिपटा हुआ एक रहस्य दिखाने की कोशिश भले ही की गई, लेकिन हकीकत यह निकलकर आई कि इसमें कोई रहस्य नहीं था.

इन चुनावों में भी वही कहानी दोहराई गई है. जब चुनाव प्रचार की शुरुआत हुई तो नतीजे पूरी तरह से अनुमान लगाने योग्य नहीं लग रहे थे. जैसे-जैसे चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ती गई, मोदी ज्यादा आक्रामक होते नजर आए. उनके आलोचकों ने कहा कि इस बार के चुनावों का नतीजा चौंकाने वाला हो सकता है.

राजनीतिक टिप्पणीकारों ने ऐसे कई फैक्टर गिनाए जिनके चलते बीजेपी को नुकसान होना तय था. जब मतगणना शुरू होगी तो वह क्लाइमैक्स न होकर एंटी-क्लाइमैक्स होगा. बिना वक्त गंवाए हर किसी को महसूस होने लगा कि निश्चित तौर पर किसी भी हालत में क्या होने वाला है. संक्षेप में कहा जाए तो गुजरात के चुनाव एक दिलचस्प थ्रिलर के जैसे शुरू हुए और आगे बढ़े, लेकिन इनका अंत एक पुरानी रोमांस कहानी की तरह ही हुआ.

एक पत्रकार के तौर पर मैंने 2002 से ही गुजरात के चुनावों को कवर किया है. गोधरा ट्रेन जलाने की दुखद घटना और उसके बाद फैले सांप्रदायिक दंगों के बाद असामान्य रूप से भारी ध्रुवीकरण के बीच हुए थे. ऐसा पहली बार था जबकि मोदी चुनावों में बीजेपी की अगुवाई कर रहे थे. जब उन्हें पार्टी की जबरदस्त लोकप्रियता के बीच लाया गया था, तब उन्होंने कहा था कि उन्हें टेस्ट मैच की बजाय वन-डे इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने की तरह काम करना होगा.

क्या वह इसमें सफल रहे? क्या उनका विराट व्यक्तित्व और भाषण कला, बेहतरीन कैंपेनिंग और अन्य गैर-परंपरागत तरीके वोटर्स को लुभाने में सफल रहे? मीडिया और एनालिस्ट्स इन सवालों में उलझे हुए थे. कइयों को इस पर संदेह था.

जब चुनाव के नतीजे आए, इन सबने हकीकत के हिसाब से अपने-अपने तर्क गढ़ लिए. इन्होंने कहा कि मोदी ने सीधे तौर पर सांप्रदायिक विभाजन का फायदा उठाया है. इन्होंने इस तथ्य की उपेक्षा की कि गुजरात कम से कम 1980 के दशक में लगातार हुए दंगों के बाद से इस विभाजन में जी रहा है. याद रखिए 1969 में भी गुजरात में दंगे हुए थे.

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लेकिन, 2002 तक कभी भी पार्टी को 127 सीटें नहीं मिलीं. कुछ लोगों ने इस घटना को मोदित्व की संज्ञा दी जिसने हिंदुत्व की जगह ले ली थी. इस शब्द को उछालने का मतलब था कि मोदी ने संघ परिवार के हिंदुत्व से हटकर हिंदुत्व का अपना वैरिएंट तैयार कर लिया था.

निश्चित तौर पर इस तरह की शब्दावली पत्रकारिता के लिहाज से दिलचस्प लग सकती थी, लेकिन यह जमीनी हकीकतों को पकड़ने में नाकाम थी. मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और वह संघ के मूल्यों में इतना ढले हुए हैं कि उनके लिए इससे इतर जाना आसान नहीं था. हकीकत यह है कि उन्होंने संविधान के दायरे में रहते हुए हिंदुत्व के विजन को प्रभावी रूप से लागू किया.

गोधरा और उसके बाद हुए दंगों के बाद उन्हें अपने उत्तरदायित्व और कर्तव्यों का निश्चित तौर पर एहसास था. इसी वजह से 2002 के दंगों के बाद उन्होंने बीजेपी के संगठन को फिर से खड़ा करने पर गहन रूप से काम किया और इसे चुनाव लड़ने वाली मशीन के तौर पर तब्दील कर दिया. साथ ही साथ उन्होंने गुजरात के विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता भी साबित की. 2014 में गुजरात छोड़ने के वक्त तक उन्होंने गुजरात का राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से कायापलट कर दिया.

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2007 के विधानसभा चुनावों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी.साथ में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह. (रायटर)

2007 के विधानसभा चुनावों में यही कहानी फिर दोहराई गई. मीडिया और टिप्पणीकारों के एक तबके ने उम्मीद जताई कि हाई-ड्रामा चुनावों का अंत उनके पसंदीदा नतीजे के तौर पर निकलेगा. उन्होंने मोदी के हारने के पक्ष में फिर से कई वजहें गिनाईं.

मिसाल के तौर पर, मोदी के पावर सेक्टर रिफॉर्म्स उनके सबसे कड़े फैसलों में एक था, इसमें किसानों के लिए भी बिजली की दरें बढ़ाने का प्रावधान था. पटेलों या पाटीदारों के साथ किसानों ने मोर्चा खोल दिया था. एक वजह यह गिनाई गई कि मोदी अतिविश्वास से भरे हुए हैं और किसान इस बार उन्हें सबक सिखाएंगे.

जब चुनाव प्रचार अपने चरम पर था, उस वक्त मैंने सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात का दौरा किया और पाया कि पाटीदार, आदिवासियों और अनुसूचित जातियों का एक बड़ा तबका बीजेपी से छिटका हुआ है. मुझे भी लगा कि बीजेपी इस चुनाव को हार जाएगी. लेकिन, सतह के अंदर कुछ और ही हो रहा था. इस तरह के संकेतों को समझने के लिए एक राजनेता का ही सहारा लेना पड़ता है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एकमात्र जेडी(यू) उम्मीदवार छोटूभाई वसावा के लिए साउथ सेंट्रल गुजरात की झगाड़िया सीट पर प्रचार कर रहे थे. नीतीश कुमार ने कहा था, ‘मुझे मोदी के हारने की कोई वजह नहीं दिखाई देती. जब मेरा हेलीकॉप्टर यहां उतरा तो मैं यहां उनके कराए गए विकास को देखकर आश्चर्यचकित था. अगर वह हारते हैं तो यह किसी मुख्यमंत्री के विकास के लिए चिंतित होने पर भी इनाम न मिलने जैसा होगा.’

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जब नतीजे आए तो हर किसी ने एक सुर में कहा, अरे, मोदी जीत गए. जिन लोगों ने कांग्रेस की जीत का अनुमान लगाया था उनके लिए इसका एक आसान स्पष्टीकरण था. तत्कालीन कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी ने मोदी को ‘मौत का सौदागर’ बताया था. उन्होंने राज्य में कथित आतंकवादियों और खासतौर पर सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर में मारे जाने के संदर्भ में यह बात कही थी. लोगों के साथ अपने ज्यादा बेहतर जुड़ाव के चलते मोदी ने इस मौके का फायदा उठाया और कई मौकों पर कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा की.

राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क था कि चूंकि केंद्र में कांग्रेस मजबूती से काबिज है, ऐसे में वह मोदी को कड़ी टक्कर देगी. इन लोगों को राहत मिली क्योंकि इन्होंने कांग्रेस की हार का ठीकरा सोनिया गांधी के सिर मढ़ दिया. कांग्रेस जीत रही थी, लेकिन सोनिया के बयान ने राज्य को फिर से ध्रुवीकरण के शिकंजे में कस दिया.

अब ऐसा दिखता है कि राजनीतिक टिप्पणीकारों की यह आदत सी बन गई है. पहले वजहें गिनाओ कि मोदी इस बार हार रहे हैं- यह गुजरात के चुनावों को वोटों के गिने जाने तक पहेली और रहस्य बनाता है. जब नतीजे आते हैं तो पता चलता है कि कहीं कोई रहस्य या पहेली नहीं थी. 2002, 2007, 2012 और 2014 के नतीजे इस बात को बखूबी साबित करते हैं.

2002 के चुनावों से लेकर 2014 तक के चुनावों से एक और बात साबित हुई है कि पूरी बहस मोदी केंद्रित रही है. यहां तक कि 2017 में जब वह मुख्यमंत्री नहीं हैं, तब भी बहस के केंद्र में वह ही हैं. इससे पता चलता है कि विपक्ष किस तरह से एक प्रतिद्वंद्वी बहस खड़ी करने में नाकाम रहा है.

विश्लेषकों और बुद्धिजीवियों का एक तबका अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता के चलते यह मानने के लिए के लिए तैयार नहीं होता कि मोदी अपने अलग और प्रभावी गवर्नेंस के तरीके के चलते जीत रहे हैं. मोदी विरोध को अपना पेशा बना चुका बुद्धिजीवियों का तबका कहता है, ‘मोदी ने कुछ भी महान नहीं किया है और वह केवल अपने पूर्ववर्तियों के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. गुजरात हमेशा से विकास आधारित राज्य रहा है.’

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

मोदी को नीचे धकेलने के लिए विरोधियों ने हर चाल का सहारा लिया है. लेकिन मोदी ने हर बार काउंटर अटैक के इनोवेटिव तरीके ढूंढ लिए. उन्होंने जीत के लिए निचले स्तर तक जाने में कोई गुरेज नहीं किया. वह जानते हैं कि युद्ध और चुनाव में सब जायज है और सबसे अहम वोटों का आंकड़ा है. ऐसे में पाकिस्तान का संदर्भ देना वोटरों को ध्रुवीकृत करने का उनका एक चालाकी भरा कदम था.

निश्चित तौर पर उनके बयान में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था क्योंकि वह एक ऐसे देश के बारे में बात कर रहे थे जिसे दुश्मन मुल्क समझा जाता है. साथ ही वह इस बात को लेकर सतर्क भी थे कि उनके विरोधी हिंदुओं और जातियों के आधार पर विभाजन की कोशिशें कर सकते हैं. कांग्रेस ने अलग-अलग जाति समूहों को साथ जोड़ने और सॉफ्ट-हिंदुत्व का सहारा लेने की कोशिश की ताकि मोदी को चुनौती देने वाला एक सामाजिक गठजोड़ तैयार किया जा सके.

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इस तरह की तिकड़मों में राहुल की चुनावी तरकीबों को नैतिक और मोदी के तरीकों को अवैध नहीं ठहराया जा सकता. राजनीतिक टिप्पणीकार इस चीज को भी समझने में नाकाम रहे. धर्म के आधार पर विभाजन खतरनाक और निंदनीय है, लेकिन जातियों के आधार पर विभाजन एक चतुर राजनीति है.

गुजरात चुनाव राहुल के लिए एक बड़ा दांव बन गए हैं क्योंकि वह चुनावी नतीजों से ठीक पहले पार्टी की कमान अपने हाथ ले रहे हैं. मोदी के लिए भी चीजें दांव पर हैं क्योंकि इसके नतीजे 2019 तक उनके शासन के बचे वक्त के लिए उनका प्रदर्शन तय करेंगे. इसे देखते हुए दोनों के लिए ही यह चुनाव बेहद निर्णायक है.

हर चुनाव अपने संदर्भ के साथ आता है और पिछले तीन चुनावों के मुकाबले इस बार चीजें ज्यादा जटिल हैं. मैंने जमीन पर इन चीजों को पकड़ने की कोशिश की है. मुझे ऐसा कुछ भी नहीं लगा कि मोदी के नीचे से जमीन खिसक रही है. यही चीज एग्जिट पोल्स से भी दिख रही है.

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि चंद लोगों के साथ मिलने और बात करने से चुनावी नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. बेहतर यही होगा कि इसके लिए यात्रा वृतांत पढ़े जाएं जिनमें कहीं ज्यादा विषयनिष्ठता होती है.

( यह लेख गवर्नेंस नाउ के आने वाले अंक में प्रकाशित होगा )

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