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गुजरात चुनाव ने राहुल को राजनीति सिखा दी और मनमोहन की चुप्पी तोड़ दी

गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे चाहे जो रहें, इस चुनाव ने राहुल को मंदिर जाना ही नहीं राजनीति करना भी सिखा दिया. जबकि अपनी चुप्पी के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री ने बाकायदा लिखकर अपनी बात कही

Updated On: Dec 12, 2017 09:16 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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गुजरात चुनाव ने राहुल को राजनीति सिखा दी और मनमोहन की चुप्पी तोड़ दी

गुजरात में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बोले,' इस चुनाव में गुजरात की जनता ने दो काम अच्छे से करा दिया. डॉ. मनमोहन सिंह जी का मुंह खुलवा दिया और दूसरा राहुल गांधी को मंदिर जाना सिखा दिया.’ देखा जाए तो योगी आदित्यनाथ की बात सही मालूम पड़ती है. न मनमोहन सिंह को पहले इतने गुस्से में देखा गया और न ही राहुल गांधी को इतने मंदिरों की यात्रा पर.

फर्क बस इतना है कि ये सब गुजरात की जनता की बदौलत नहीं हुआ है. इसके पीछे गुजरात की उस राजनीति का हाथ है, जिसने मनमोहन सिंह की चुप्पी तोड़ने से लेकर राहुल के मंदिर-मंदिर भटकने की जमीन तैयार की. लेकिन सिर्फ यही नहीं है जो इस बार के गुजरात चुनाव में पहली बार हुआ.

पहले योगी के बयान से ही बात शुरू करें तो इसके पहले मनमोहन सिंह इतने तल्ख लहजे में नहीं दिखे हैं. मौके बेमौके डिफेंसिव मोड में रहते हुए उन्होंने कभी दार्शनिक तो कभी शायराना अंदाज जरूर दिखाया है. लेकिन कभी अटैकिंग मोड में नजर नहीं आए. लेकिन पीएम मोदी के लगाए आरोपों ने उन्हें गुस्से में इतना भर दिया कि जो बोल नहीं पाए उन्हें लिखकर जारी कर दिया.

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सोमवार को मनमोहन सिंह ने एक बयान जारी कर कहा, 'हार को सामने देखकर बौखलाहट में झूठ और अफवाहों का सहारा ले रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी. मोदी के आचरण और शब्दों से मुझे अत्यंत पीड़ा और क्षोभ है. एक निराश और हताश प्रधानमंत्री अपशब्दों का सहारा लेकर और झूठ के तिनके को पकड़ कर अपनी डूबती हुई चुनावी नैया को पार कराने का विफल प्रयास कर रहे हैं. खेदजनक और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि मोदी जी पूर्व प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष सहित सभी संस्थागत पदों को बदनाम करने की कोशिश में एक आपत्तिजनक उदाहरण स्थापित कर रहे हैं.’

manmohan singh

यूपीए 2 के शासन के दौरान भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों पर मनमोहन सिंह कुछ नहीं बोले. राहुल गांधी ने सरकारी अध्यादेश के पन्ने को भरी सभा में फाड़कर फेंक दिया लेकिन मनमोहन सिंह चुप रहे. उनके नेतृत्व वाली सरकार को रिमोट से चलने वाली सरकार बताया गया लेकिन मनमोहन सिंह खामोश रहे. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों-सभाओं में यूपीए सरकार और कांग्रेस की धज्जियां उड़ा दीं लेकिन मनमोहन सिंह से बोलते नहीं बना.

2017 के गुजरात चुनावों ने ‘हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी' कहकर अपनी चुप्पी को हाईप्रोफाइल बना देने वाले मनमोहन सिंह भी बोलने पर मजबूर हो गए. वक्त कितना बदल चुका है वो इस चुप्पी के टूटने से समझा जा सकता है.

2017 का गुजरात चुनाव याद रखा जाएगा क्योंकि जितने बेआबरू होकर सवाल पूछे गए उतने ही बेइज्जत करने वाले जवाब दिए गए. जितने ऊंचे ओहदे पर बैठकर कीचड़ उछाले गए उतने ही निचले स्तर तक उसकी गदंगी फैली. यही वो चुनाव है जिसमें राजनीतिक लांछनों का ऐसा दौर चला जिसे आने वाले लंबे वक्त तक याद रखा जाएगा.

योगी आदित्यनाथ की बात सही है कि राहुल गांधी ने मंदिर जाना सीख लिया लेकिन ये गुजरात की जनता की वजह से नहीं हुआ है. वहां की राजनीति की मजबूरी उन्हें मंदिरों की चौखट तक लेकर आई है. ये मजबूरी इतनी बड़ी है कि राहुल गांधी मंदिर में दर्शन के साथ ही चुनाव प्रचार का आगाज करते हैं और मंदिर दर्शन के साथ ही प्रचार का समापन होता है.

गुरुवार को प्रचार के आखिरी दिन राहुल गांधी अहमदाबाद के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे. भगवान की पूजा अर्चना की. इन चुनावों में शायद एक दिन भी ऐसा नहीं गया होगा, जिसमें राहुल गांधी ने किसी मंदिर में दर्शन न किए हों. उन्होंने मंदिर दर्शन की शुरुआत द्वाराकाधीश मंदिर से की थी और समापन जगन्नाथ मंदिर में दर्शन करके किए.

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अपने क्षेत्र में अतिक्रमण होता देख बीच में बीजेपी ने उनकी आस्था पर सवाल भी खड़े किए. सोमनाथ मंदिर में राहुल गांधी के दर्शन पर विवाद खड़ा हुआ. जब बोला गया कि राहुल ने गैर हिंदू दर्शनार्थियों के लिए रखे रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाया. हालांकि इस पर कांग्रेस पार्टी ने सफाई देते हुए कहा था कि किसी और ने वहां उनका नाम लिख दिया.

PM Modi on Seaplane

राहुल गांधी भी मंदिर जाते हैं और प्रधानमंत्री मोदी भी. गुरुवार को राहुल गांधी जगन्नाथ मंदिर में थे तो प्रधानमंत्री मोदी सी-प्लेन में सवार होकर अंबाजी के दर्शन करने पहुंचे थे. लेकिन सवाल राहुल गांधी से पूछा गया. केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह ने कहा, ‘धर्म और आस्था का सवाल व्यक्ति से जुड़ा मसला है. हमारे प्रधानमंत्री के लिए ये जिंदगी का हिस्सा है जबकि राहुल गांधी गुजरात की धरती छूने के बाद मंदिर-मंदिर दर्शन को निकलते हैं. जबकि दिल्ली में वो अपने घर के पिछवाड़े वाले मंदिर में कभी गए भी नहीं होंगे.’

राहुल गांधी से ऐसे सवाल पूछे जाएंगे क्योंकि कांग्रेस ने जिस राजनीति के बूते इतने वर्षों तक देश पर राज किया है, उसका वक्त अब चला गया है. हालांकि राहुल गांधी ऐसे सवालों के जवाब भी देते हैं. गुरुवार को अपनी पीसी में इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं, ‘जब भी मौका मिलता है मैं मंदिर जाता रहता हूं. पिछले दिनों केदारनाथ मंदिर भी गया था. क्या वो गुजरात में है?’

राहुल गांधी मंदिर जाते रहते हैं लेकिन ऐसा गुजरात चुनाव 2017 में ही हुआ है कि उन्होंने इतने मंदिरों के दर्शन किए. अक्षरधाम मंदिर, चामुण्डा देवी मंदिर, अंबाजी मंदिर, वीर मेघ माया मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, इन चुनावों के दौरान उन्होंने दर्जनों मंदिर के दर्शन कर लिए.

गुजरात चुनाव 2017 को याद रखा जाएगा क्योंकि यही वो चुनाव है जिसमें हिंदूवादी राजनीति की लहर इतनी तीखी हुई कि पगड़ी-तिलक से बात होते हुए जनेऊ तक पहुंच गई. राहुल गांधी के हिंदू होने का सबूत दिया गया, उनके जनेऊधारी तस्वीरों को मीडिया में जारी किया गया.

ये चुनाव याद रखा जाएगा मणिशंकर अय्यर के प्रधानमंत्री मोदी पर दिए बेहद अपमानजनक बयान के लिए जिसमें उन्होंने मोदी को नीच आदमी तक कह डाला था. ये चुनाव याद रखा जाएगा हार्दिक पटेल की लड़कियों के साथ फिल्माए गए उन दर्जनों सीडी के लिए जो ऐन चुनावों के दौरान जारी किए गए.

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लेकिन इन छोटी और ओझी चीजों के अलावे भी कुछ बातों के लिए गुजरात चुनाव याद रहेगा. याद कीजिए ऐसा पहली बार हुआ है कि राहुल गांधी ने बिना अटके और बिना भटके अपने भाषण दिए. इससे पहले वो इतने कॉन्फिडेंट कभी नहीं दिखे.

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पहली बार राहुल गांधी के आत्मविश्वास के आगे बीजेपी के बड़े नेता कमजोर दिखे. राहुल गांधी पूरे वक्त चुनावों में लगे रहे, छुट्टी पर नहीं निकले. कांग्रेस पार्टी के एकलौते स्टार प्रचारक रहे. पूरे गुजरात में घूम-घूम कर प्रचार किया. गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे चाहे जो रहें, इस चुनाव ने राहुल को मंदिर जाना ही नहीं राजनीति करना भी सिखा दिया.

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