In association with
S M L

गुजरात चुनाव: पहले दौर की वोटिंग के बाद क्या है बीजेपी की रणनीति

बीजेपी पहले दौर की वोटिंग के बाद काफी मुखर होकर प्रचार कर रही है

Sanjay Singh Updated On: Dec 11, 2017 10:46 AM IST

0
गुजरात चुनाव: पहले दौर की वोटिंग के बाद क्या है बीजेपी की रणनीति

सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के इलाके के पहले चरण के चुनाव के बारे में मीडिया के एक हिस्से में शोर मचा कि ‘हार्दिक पटेल का हाथ कांग्रेस के साथ’ और ‘जीएसटी की बात’. माना जा रहा था कि ए दो बातें बीजेपी को नुकसान पहुंचा रही हैं.

बड़ी वजह यही रही जो कांग्रेस ने चुनाव से पहले नारा गढ़ा ‘कांग्रेस आवे छे’. राहुल गांधी ने उधार का नारा ‘विकास गांडो थयो छे’(विकास पागल हो गया है) को चुनाव-अभियान के बीच में ही छोड़ दिया. उन्हें लग गया था कि इस नारे से गुजराती के उद्यमी समुदाय की भावनाओं को चोट लग रही है.

मतदान का प्रतिशत (68%) पिछली बार की तुलना में थोड़ा कम रहा लेकिन अंतिम गणना के बाद यह आंकड़ा कुछ ऊपर जा सकता है. चूंकि 182 में 89 यानी लगभग 50 प्रतिशत सीटों के लिए मतदान हो चुका है और उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में लिखी जा चुकी है, सो अब बड़ा सवाल ए बनता है कि क्या दूसरे चरण के चुनाव के लिए मोदी के करिश्मे ने बीजेपी को सही गति और आत्मविश्वास दिया है या फिर हार्दिक पटेल से हाथ मिलाने का फायदा कांग्रेस को होगा, वह 27 सालों बाद गुजरात में सत्ता में लौटेगी और इस तरह कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर राहुल की ताजपोशी एक अहम घटना साबित होगी?

इसमें कोई शक नहीं कि व्यापारी और व्यावसायी समुदाय के एक हिस्से में नाराजगी का भाव बहुत ज्यादा है, खासकर सूरत में. सौराष्ट्र के इलाके में पाटीदार भी गुस्से में है. लेकिन बीजेपी के खिलाफ इनके गुस्से को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर आंका गया है.

टूट गया है पाटीदार वोट

ऐसा नहीं मान सकते कि इस बार सभी पाटीदारों ने बीजेपी के खिलाफ वोट किया है. वोट के मामले में पाटीदारों में साफ-साफ टूट देखी जा सकती है. सभी के सभी पाटीदारों तो खैर बीजेपी को एकमुश्त वोट कभी नहीं करते. पाटीदारों में ज्यादातर बीजेपी को वोट डालते हैं और मोटा अनुमान है कि पाटीदारों के 20-30 फीसद वोट बीजेपी के खिलाफ पड़ते हैं. इस बार बीजेपी के खिलाफ गए पाटीदार वोटों का आंकड़ा 50 फीसद से ऊपर जा सकता है, किसी जगह यह 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है तो किसी जगह 70 प्रतिशत तक.

सूबे के अलग-अलग इलाकों में लोगों से बातचीत करने पर फर्स्टपोस्ट को पता चला है कि पाटीदारों के आक्रामक चुनाव-अभियान के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के ज्यादातर तबके बीजेपी के पाले में चले गए हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के गैर-पाटीदार तबके के मतदाताओं का बीजेपी के पाले में जाना उस हद तक तो नहीं हुआ है, जितना 2017 के फरवरी में हुए यूपी के चुनावों में हुआ था जब जाटों ने बीजेपी के खिलाफ जोर-शोर से अभियान चलाना शुरु किया. फिर भी, गुजरात में एक हद तक ऐसा हुआ जरुर है.

इस बात के भी संकेत मिले हैं कि जीएसटी की दरों पर नए सिरे से विचार होने के बाद कपड़े और हीरे के व्यापारियों के कड़े तेवर में कुछ नरमी आयी है और सरकार के ऊंचे पदों पर मौजूद बीजेपी के कुछ प्रभावशाली नेताओं के साथ व्यापारियों की कुछ गुपचुप बैठकें भी हुई हैं.

एक बाद और कही जा रही है और इसके कारण भी बीजेपी के खेमे में उत्साह का माहौल है भले ही ऐसी खबरें आ रही हों कि परंपरागत रुप से बीजेपी के समर्थक रहे कुछ तबके और समूह इस बार उसके खिलाफ हैं. यह बात तो बिल्कुल जानी-पहचानी है कि शहरों इलाकों में बीजेपी मजबूत रहती आई है.

शहरी इलाके पार लगा सकते हैं बीजेपी की नैया

A supporter of India's main opposition Bharatiya Janata Party (BJP) holds a mask of Hindu nationalist Narendra Modi, prime ministerial candidate for BJP and Gujarat's chief minister during a rally being addressed by Modi in New Delhi September 29, 2013. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA - Tags: POLITICS) - GM1E99T1JWW01

गुजरात एक ऐसा सूबा है जहां 45 फीसद आबादी शहरी इलाकों में रहती है. सूबे में विधानसभा की 70 सीटें ऐसी हैं जहां ज्यादातर आबादी शहरी इलाके में रहती है. शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की जीत का अन्तर बड़ा (10 हजार से 60 हजार के बीच) रहा है. इसलिए सोचा जा सकता है कि कुछ समर्थक बीजेपी के पाले से हट जाएं तो भी पार्टी के उम्मीदवार जीत जाएंगे. हां, उनकी जीत वोटों के ज्यादा बड़े अन्तर से नहीं होगी.

दूसरे चरण के चुनाव में हार्दिक उत्तरी गुजरात में बीजेपी को नुकसान पहुंचाने और कांग्रेस को आगे ले जाने की स्थिति में हैं, यह बात खासतौर पर मेहसाणा इलाके के बारे में कही जा सकती है. लेकिन ऐसा होने पर एक सीमा तक दूसरी जातियों के मतदाता बीजेपी की तरफ गोलबंद होंगे जबकि पिछले चुनाव में वे बीजेपी के लिए ज्यादा मददगार साबित नहीं हुए थे. मध्य गुजरात में 61 सीटें हैं. यहां हार्दिक का कोई असर नहीं है, वे इस इलाके के लिए अनजान हैं.

आदिवासी और ओबीसी तबके का वोट अपने पाले में खिंचने के लिए राहुल गांधी ने जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकौर पर ज्यादा भरोसा करने की रणनीति अपनायी लेकिन उनका यह आयडिया काम करता नहीं दिखता. दरअसल मेवाणी और ठाकोर अपने चुनाव-क्षेत्र क्रमशः वडगाम और राधानगर में बड़ी लचर हालत में हैं. कांग्रेस का अपना आकलन ही कह रहा है कि अल्पेश ठाकौर की सलाह पर जो 10 लोग उम्मीदवार बने हैं, चुनाव में उनकी हालत पतली है. पांच सीटें आदिवासी नेता छोटू वासवा को दी गई हैं. वासवा जद(यू) के बागी नेता हैं और अब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को इन पांच सीटों के लिए भी चिन्ता सता रही है.

रविवार के दिन एक रैली में मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने राज्यसभा में ज्यादा तादाद में रहकर क्या किया ? उसने ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिए जाने में अड़ंगा लगाया.”

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग में लिखा : “ कांग्रेस के चुनाव-अभियान की एक जाहिर सी खासियत है कि उसने सूबे में अपने नेतृवर्ग को एकदम ही किनारे कर दिया है, नेतृत्व और मुद्दे दोनों उसने दूसरे के कंधों पर डाल दिए हैं जबकि उन लोगों का परंपरागत रुप से कांग्रेस पार्टी से कुछ लेना-देना नहीं रहा. सूबे की कांग्रेस का कोई भी नेता ऐसा नहीं जो चुनाव-अभियान में दौरा कर रहा हो.”

मुखर हुए हैं बीजेपी प्रचारक

Amit Shah

अहमदाबाद, आणंद, बड़ौदा तथा आसपास की जगहों पर लोगों से बातचीत के जरिए फर्स्टपोस्ट को पता लगा कि बीते तीन दिनों में प्रधानमंत्री ने जनसभाओं में भावनाओं की लहर उठायी है. उन्होंने अपनी छवि और गुजरात के गौरव को आगे करते हुए जनसभाओं में कांग्रेस के वैसे दर्जनों नेताओं के नाम गिनाए हैं जिन्होंने 2014 के चुनाव के दौरान उनपर ताने कसे. प्रधानमंत्री ने जनसभाओं में याद दिलाया कि कांग्रेस मानती है कि देश पर शासन करने का अधिकार एक खास कांग्रेसी परिवार को है. इन बातों ने मोदी समर्थक सामाजिक तबके के मतदाताओं के दिल पर असर किया है. जो मतदाता अभी तक तमाशबीन बने बैठे थे उनमें इस बात से जोश जगा है और समर्थक पहले के दिनों की तुलना में ज्यादा मुखर होकर बोल रहे हैं.

शनिवार के दिन मोदी ने एक कांग्रेस नेता सलमान निजामी का ट्वीट खोज निकाला और उसे चुनावी मुद्दा बनाया. निजामी ने गुजरात के कुछ इलाकों में कांग्रेस का चुनाव प्रचार किया है. निजामी के ट्वीट पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री ने कहा: " कांग्रेस पूछ रही है कि मेरे माता-पिता कौन हैं. भाइयो और बहनो, मैं आपसे पूछता हूं, क्या हमलोग दुश्मन से भी ऐसी भाषा में बात करते हैं? एक जिम्मेवार कांग्रेस नेता ने मुझसे पूछा है कि... राहुल गांधी की पार्टी मुझसे पूछ रही है कि तुम्हारे माता-पिता कौन हैं. देश की जनता मेरी मां-बाप है. मैं इस मिट्टी का बेटा हूं.

माना जाता है कि निजामी ने भारतीय फौज को बलात्कारी कहा था, यानि एक ऐसी बात जिसे लोग जाहिरा तौर पर नापसंद करेंगे. अब जबकि चुनाव दूसरे चरण की ओर बढ़ चला है तो विकास पर होने वाली बहस एकदम पीछे हो गई है और भावनात्मक मुद्दे एकदम से आगे चले आए हैं या कह लें बीजेपी बातों को इस तरफ मोड़ने में कामयाब रही है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
गणतंंत्र दिवस पर बेटियां दिखाएंगी कमाल!

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi