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मणिशंकर के बयान से घिरी कांग्रेस को बड़े मुद्दों पर फोकस करना चाहिए

गुजरात चुनाव में मीडिया के फुलाए मुद्दों से वोटर्स का रुख मोड़ने वाले मुद्दे कुछ अलग हैं

Aakar Patel Updated On: Jan 02, 2018 03:41 PM IST

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मणिशंकर के बयान से घिरी कांग्रेस को बड़े मुद्दों पर फोकस करना चाहिए

कौन सोच सकता था कि मणिशंकर अय्यर जैसे शख्स का कुछ कहा एक मुद्दा बन जाएगा, और वो भी गुजरात चुनाव का शायद ‘मुख्य’ मुद्दा? मैंने तो बिल्कुल नहीं सोचा था और अब भी नहीं समझता कि ये गुजरात के लिए इतना बड़ा मुद्दा था,

जब मैंने उस हाहाकारी टिप्पणी के बारे में सुना तो मैंने अपना गुजराती शब्दकोश खंगाला, जिसमें ‘नीच’ का मतलब ‘दुष्ट’ बताया गया है. अंग्रेजी शब्दकोश में इसके अनुवाद ‘wicked’, ‘vile’ and ‘mean’ हैं. क्या अय्यर को ये शब्द इस्तेमाल करने चाहिए थे? नहीं. राजनीतिक चर्चा और सभी चर्चाएं हर हाल में सभ्य होनी चाहिए. लेकिन क्या इस शब्द का अर्थ जाति से जुड़ा है? नहीं.

दूसरा मुद्दा है मोदी की जाति का. प्रधानमंत्री एक बहुत ही संपन्न समुदाय से आते हैं, जिसे घांची कहते हैं. आमतौर पर ये लोग किराना स्टोर्स चलाते हैं और तेल निकालने के अलावा दुकानों पर अनाज (और चाय) बेचते हैं. खुद मोदी शब्द का मतलब है- एक ऐसा शख्स जो पड़ोस के किराना स्टोर का मालिक है और इसे चलाता है. इसका भी वही अर्थ है जो गांधी का है.

घांची समुदाय को गुजराती समुदाय में पिछड़ी जाति नहीं माना जाता और इसे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय 1999 में ओबीसी में शामिल किया गया. इसलिए बहुत से गुजरातियों के लिए ‘नीच’ शब्द प्रधानमंत्री को दी गई जातिगत गाली के आरोप से मेल नहीं खाता है.

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यह वजह है कि मैं समझता हूं कि इस मुद्दे को बहुत ज्यादा तूल दिया गया और यह चुनाव प्रचार में प्रभावी हथियार नहीं है. समय बताएगा, हालांकि फिर भी हमारे पास जानने का कोई तरीका नहीं है कि किस मुद्दे ने बीजेपी को जीत दिलाई (और मेरा अनुमान है कि बीजेपी जीतेगी, जैसा कि मैंने पिछले कॉलम में लिखा था) और कौन सिर्फ मीडिया का फुलाया गुब्बारा था.

एक विवाद जिसके बारे में जब मैंने सुना तो सोचा कि यह नुकसान पहुंचाने वाला हो सकता है, यह था सोमनाथ रजिस्टर विवाद. बाद की रिपोर्टों से पता चला कि यह घटना वैसी नहीं थी, जैसी पेश की गई थी, लेकिन इसने निश्चय ही बहुत से गुजरातियों का ध्यान खींचा और उन्होंने सोचा होगा कि राहुल गांधी ने गैर-रजिस्टर हिंदू का इस्तेमाल किया होगा (जो कि उन्होंने नहीं किया था). लेकिन वह स्टोरी अब इतिहास बन चुकी है और इसमें मीडिया की दिलचस्पी भी खत्म हो चुकी है.

गढ़ी हुई कहानियां

इसके बाद फिर एक विवाद आया जिसमें मणि शंकर अय्यर राहुल गांधी की ताजपोशी की शाहजहां और औरंगजेब से तुलना कर बैठे. जाहिर तौर पर उनका पूरा बयान नहीं दिखाया गया, और तमाम लोग इस पर टिप्पणी करने लगे, जिनमें मैं भी एक था. लेकिन उन्हें पता होना चाहिए था, जिसमें राहुल और औरंगजेब को एक साथ लाया जाएगा, उसका मोदी जरूर इस्तेमाल करेंगे, और जैसा कि उन्होंने किया भी. यह कितना असरदार था? एक बार फिर मेरा कहना है कि मैं नहीं समझता कि लोग इससे तय करेंगे कि किसे वोट देना है, लेकिन इसने बीजेपी को मौका दे दिया कि वह जिस राज्य में दो दशक तक शासन कर चुकी है, उसके बजाय कांग्रेस के बारे में बात कर सके.

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इससे पहले बीजेपी ने एक अस्पताल के बारे में एक रिपोर्ट लीक की जिसमें अहमद पटेल एक ट्रस्टी थे, जिसमें बताया गया था कि अस्पताल का एक कर्मचारी या पूर्व कर्मचारी एक आतंकवादी मामले से जुड़ा था. यह इन मायनों में एक गढ़ी हुई कहानी थी, कि पटेल और उस शख्स के बीच कोई संबंध नहीं था. फिर भी इस स्टोरी को बेचा गया, क्योंकि बीजेपी को हमेशा यह बताने से फायदा मिलता है कि कांग्रेस आतंकवाद पर नरम रुख रखती है, हालांकि इतिहास और आंकड़े कुछ और कहानी बयान करते हैं. फिर कुछ दिन पहले कपिल सिब्बल के बारे में एक कहानी आ गई.

सिब्बल जो कांग्रेस नेता होने के साथ ही एक वकील भी हैं, ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि बाबरी मस्जिद मामले में 2019 के लोकसभा आम चुनाव से पहले फैसला नहीं दे. मोदी को इससे रेडिमेड मटीरियल से खबरों का तूफान पैदा करने का एक और मौका मिल गया. अयोध्या मसला, जिसने बीजेपी को एक राष्ट्रीय पार्टी बना दिया था और अब राजनीतिक रूप से मर चुका था, जानबूझकर इसे फिर से जिंदा कर दिया गया.

नकारात्मक चुनाव प्रचार का दौर

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 13 वर्षों तक सरकार चलाई है

हेडलाइन बनाने वाली नई स्टोरी में प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया है कि मणिशंकर अय्यर ने, जो खुद भी कुबूल करते हैं कि उनमें अपना मुंह बंद रखने की सलाहियत जीरो है, पाकिस्तानियों को मोदी की ‘सुपारी’ दी है. यह, बेशक, सच नहीं है. या तो यह ऐसा मामला है कि प्रधानमंत्री सच में इस पर यकीन करते हैं, जो कि डरावना है; या फिर वह इसे इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि वह मानते हैं कि इससे उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिलती है, और यह भी डरावना है.

अब जैसा कि हम देख सकते हैं, सभी या अधिकांश बड़े मुद्दे जो खबरों में घूम रहे हैं, उन्हें बीजेपी ने मीडिया की मदद से कांग्रेस के खिलाफ खड़ा किया है. यह लांक्षनों और भयादोहन का एक नकारात्मक चुनाव प्रचार है. सबसे बड़ी बात यह कि बीजेपी की सकारात्मक चुनाव प्रचार से लड़ने की कोई इच्छा भी नहीं है, जैसा कि इसने 2014 में सुशासन और अच्छे दिन के मुद्दे पर लड़ा था.

यह दुर्भाग्य की बात है, लेकिन भारतीय उपहाद्वीप में ऐसे ही चुनाव लड़े जाते हैं. बीजेपी जहां भी यह रणनीति इस्तेमाल कर सकती है, करेगी ही. अब यह तो कांग्रेस को देखना है कि वह अपने मुद्दों के बारे में सोचे, जो इतना आकर्षक हो कि मीडिया उसे खुद हाथों-हाथ ले. और यह तो कांग्रेस के लिए बहुत जरूरी है कि इस चुनाव में सेल्फ गोल ना मारे.

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