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राहुल मांगे 22 साल का हिसाब, मोदी बोले-मैं ही हूं विकास

गुजरात में पहले दौर की 89 सीटों के लिए प्रचार थम गया है. एग्रेशन और इमोशन से भरे कैंपेन ने इस चुनाव को एक ब्लॉक बस्टर शो बना दिया है.

Rakesh Kayasth Updated On: Dec 07, 2017 05:17 PM IST

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राहुल मांगे 22 साल का हिसाब, मोदी बोले-मैं ही हूं विकास

आपको हाल के दिनों का ऐसा कौन सा चुनाव याद आता है, जहां लड़ाई सीधे तौर पर देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक शख्सियतों के बीच रही हो? बिहार से लेकर यूपी तक हर चुनाव मल्टी स्टारर रहा है. लेकिन गुजरात का इलेक्शन इस मामले में अलग है. यहां मामला सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी है. इससे बड़ी बात यह है कि यह शेर और बकरी की लड़ाई नहीं लग रही है. जोर-आजमाइश दोनों तरफ से लगभग एक जैसी है. यही बातें इस चुनाव को सबसे अलग बनाती हैं.

बीजेपी के छोटे-बड़े नेता कल तक राहुल गांधी का नाम सुनकर मुस्कुराते थे. लेकिन गुजरात का कैंपेन शुरू होने के बाद हालत यह हो गई कि किलेबंदी के लिए मोदी और अमित शाह को एक-दो नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्रियों की फौज उतारनी पड़ी है. अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि 21वीं सदी के सबसे ताकतवर नेता नरेंद्र मोदी अपना अभेद्य किला बचाने को लेकर किस तरह का दबाव महसूस कर रहे हैं.

'पप्पू' पास हो गया

पहले राउंड के कैंपेन से कई कहानियां निकलकर सामने आई हैं. सबसे बड़ी कहानी यह है कि राहुल गांधी ने गांधी ने उन लोगों को नए सिरे से सोचने को मजबूर किया है, जो अब तक उन्हें पप्पू करार देते आए थे. कांग्रेस सही जातीय समीकरण बिठाकर गुजरात में 22 साल से राज कर रही बीजेपी को टक्कर दे सकती है, यह बात तो राजनीति के तमाम जानकार मान रहे थे, लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस के कैंपेन की अगुआई इस आक्रमकता से करेंगे, इसका अंदाजा ज्यादातर लोगों को नहीं था.

राहुल गांधी को फायर ब्रैंड नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश कांग्रेस ने पहले भी की थी. लेकिन ऐसी कोशिशें नाकाम रही थीं. राहुल का बार-बार आस्तीन चढ़ाना और विरोधी दल के घोषणापत्र से लेकर अपनी ही सरकार का अध्यादेश तक फाड़ना भला किसे याद नहीं होगा! यह अलग बात है कि उन तेवरों से हासिल कुछ नहीं हुआ, सिर्फ मजाक ही उड़ा था.

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लेकिन गुजरात कैंपेन के दौरान राहुल ने जो आक्रमकता दिखाई है, वह पहले के मुकाबले एकदम अलग है. इसमें ना तो नौसखियापन है और ना ही किसी तरह का उतवलापन. ऐसा लगता है कि राहुल अच्छी तरह होमवर्क करके आए हैं. सोशल मीडिया से लेकर जनसंपर्क तक हर स्तर पर तैयारी पूरी है. रैलियों में भीड़ जुट रही है और राहुल सिर्फ कामकाज के आधार पर बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं.

rahul gandhi

पहले राउंड के कैंपेन में राहुल ने बार-बार नोटबंदी और जीएसटी को लेकर गुजरात के व्यापारियों की नाराजगी को भुनाने की कोशिश की. गुजरात में शिक्षा के निजीकरण, घटते रोजगार, कॉन्ट्रेक्ट लेबर, किसानों के कर्ज और स्वास्थ्य सेवाओं के हाल तक राहुल ने बहुत से ऐसे मुद्धे बार-बार उठाए हैं, जो नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल पर सवालिया निशान लगाते हैं.

मुद्धे उठाने से ज्यादा बड़ी बात राहुल गांधी के संवाद शैली में आया बदलाव है. कम्युनिकेटर के तौर पर नरेंद्र मोदी असाधारण प्रतिभा के धनी माने जाते हैं, दूसरी तरफ राहुल गांधी की छवि लिखा भाषण पढ़ने वाले नेता की रही है. लेकिन गुजरात के अब तक कैंपेन में राहुल ने इस धारणा को बदलकर रख दिया है. जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताने से लेकर अमित शाह के बेटे पर 'शाह जादा खा गया' जैसे इल्जाम मढ़ने तक राहुल गांधी के अंदाज में गजब का चुटीलापन दिखाई दिया है.

आमतौर पर मोदी अपने विरोधियो को वन लाइनर से धराशायी करते हैं. लेकिन राउंड वन के कैंपेन में यह काम राहुल गांधी करते नजर आए. उन्होंने प्रधानमंत्री की मिमिक्री की और उन्हें लेकर कई ऐसे लतीफे सुनाए जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. क्या यह कमाल किसी नए स्क्रिप्ट राइटर का है? जो भी हो, लेकिन क्रेडिट राहुल गांधी को देना पड़ेगा. अगर आत्मविश्वास ना हो तो स्क्रिप्ट भी बेकार है.

गुजरात मॉडल नहीं गुजराती अस्मिता मोदी का हथियार

2014 में नरेंद्र मोदी के अहमदाबाद से दिल्ली जाने के बाद से गुजरात के हालात काफी बदल गए हैं. गुजरात एकमात्र ऐसा बीजेपी शासित राज्य है, जहां के मुख्यमंत्री को बदलना पड़ा है. आनंदीबेन पटेल से लेकर विजय रूपाणी तक मोदी के दोनो उत्तराधिकारी उनकी जगह भरने में नाकाम रहे हैं. जाहिर सी बात है, जीत दिलाने की पूरी जिम्मेदारी एक बार फिर मोदी पर है.

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नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के कैंपेन में कदम रखा तो एक वायरल हो चुके नारे 'विकास पागल हो गया है' ने उनका स्वागत किया. मोदी ने कांग्रेस के इस कैंपेन की काट ढूंढने के लिए 'मैं विकास हूं' का नारा दिया. लेकिन शायद बीजेपी और खुद मोदी को भी पक्का भरोसा नहीं है कि जीएसटी और नोटबंदी से उपजी नाराजगी इस नारे से दूर हो सकती है. लिहाजा पार्टी अब गुजरात के विकास के मॉडल से हटकर गुजराती अस्मिता के सवाल पर आ गई है.

NARENDRAMODI

नरेंद्र मोदी अब हर रैली में खुद को गुजरात के सम्मान के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं. वे बार-बार कह रहे हैं कि भारत के प्रधानमंत्री के रूप में पूरी दुनिया में उन्होंने गुजरातियों का नाम रौशन किया है. लेकिन कुछ बाहर लोग यहां आकर उनके नाम पर कीचड़ उछालने की कोशिश कर रहे हैं और गुजरात के वोटरों को ऐेसे लोगो को सबक सिखाना चाहिए.

पहले दौर के पूरे कैंपेन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार कांग्रेस को गुजरातियों के दुश्मन के तौर पर पेश किया और उसे सरदार पटेल का अपमान करने वाला बताया. चुनाव में उतरी कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी आमतौर पर रक्षात्मक ही होती है. लेकिन डिफेंसिव होना मोदी की राजनीतिक कार्यशैली नहीं है.

जाहिर है, उनकी आक्रामकता बार-बार सामने आ रही है. मोदी ने यहां तक कहा डाला कि विकास का विरोध करने वाली किसी भी राज्य सरकार को केंद्र की तरफ से एक फूटी कौड़ी तक नहीं मिलेगी. देखा जाए तो यह एक तरह की परोक्ष धमकी है कि अगर गुजरात में कांग्रेस की सरकार बनी तो उसे केंद्र से कोई सहयोग नहीं मिलेगा.

सॉफ्ट हिंदुत्व बनाम कट्टर हिंदुत्व

उत्तर प्रदेश के चुनाव कैंपेन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि अगर कब्रिस्तान के लिए जमीन दी जाती है तो श्मशान के लिए भी दी जानी चाहिए. कई लोगों का मानना है कि कब्रिस्तान बनाम श्मशान के इस डिबेट ने अचानक यूपी की चुनावी हवा बदल दी. कांग्रेस यह जानती है कि अगर गुजरात में भी धार्मिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण हुआ तो उसकी उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो जाएंगी.

इसलिए कांग्रेस के किसी भी नेता ने अब तक एक बार भी ना तो गुजरात दंगों का नाम लिया है और ना मुसलमानों का. उल्टे राहुल गांधी मंदिरों के चक्कर काट रहे हैं. पहले राउंड का कैंपेन खत्म होने तक राहुल सोमनाथ समेत गुजरात के दर्जन भर मंदिरों में माथा टेक आए हैं. इतना ही नहीं कुछ जगहों पर तो उन्होंने बकायदा स्टेज पर पूजा के साथ अपनी रैली शुरू की. मामला बहुत साफ है. इस बार कांग्रेस लड़ाई को सेक्यूलर बनाम कम्युनल नहीं बनाना चाहती बल्कि पार्टी खुद को हिंदुत्व के उदार चेहरे के रूप में पेश कर रही है.

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दूसरी तरफ विकास से गुजराती अस्मिता तक आई बीजेपी इस बात के साफ संकेत दे रही है कि वह धीरे-धीरे इस लड़ाई को धर्म के अखाड़े में ले जाएगी. राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर में दर्शन के फौरन बाद प्रधानमंत्री ने छींटाकशी करते हुए पूछा-क्या मंदिर आपके नाना ने बनवाया था? इसके बाद बीजेपी ने राहुल के हिंदू होने पर ही सवाल उठा दिए. जवाब में कांग्रेस ने दावा किया कि राहुल कोई मामूली हिंदू नहीं बल्कि जनेऊधारी हिंदू हैं. गुजरात में घूम रहे हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राहुल गांधी मंदिर में कुछ इस तरह बैठते हैं, जैसे नमाज पढ़ रहे हों.

इससे कदम आगे बढ़ते हुए विवादित बयानों के लिए मशहूर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने दावा किया कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री मुसलमान अहमद पटेल होंगे. मामला बहुत साफ है, कम हो या ज्यादा लेकिन हिंदू-मुस्लिम गुजरात के चुनाव में आगे भी बिहार और यूपी के चुनाव की तरह नजर आएगा.

साइड हीरो भी कुछ कम नहीं

राहुल गांधी अपनी पार्टी की इकलौते सुपर स्टार हैं. दूसरी तरफ बीजेपी के पास स्टार कैंपेनर्स की फौज है. लेकिन राहुल गांधी पूरी तरह अकेले हों ऐसा भी नहीं है. गुजरात का चुनाव कई साइड हीरोज की वजह से भी रोमांचक हो गया है पिछले तीन साल में राज्य की राजनीति में रातों-रात उभरे तीन बड़े युवा नेता कांग्रेस के साथ हैं.

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राहुल गांधी के साथ दलित नेता अल्पेश ठाकोर

ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर बकायदा कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं. उनके पास अच्छा-खासा जनाधार है और वे कैंपेन में रात-दिन जुटे हैं. दलितों के ऊना आंदोलन से चर्चा में आए जिग्नेश मेवाणी निर्दलीय के तौर पर बीजेपी विरोधी पार्टियों के समर्थन से चुनाव लड़ रहे हैं और पूरे राज्य में घूम-घूमकर मोदी विरोधी माहौल बना रहे हैं. लेकिन चुनावी ब्लॉक बस्टर के साइड हीरोज में सबसे ज्यादा चर्चा हार्दिक पटेल की है.

पाटीदारों के सबसे लोकप्रिय नेता हार्दिक आखिरी वक्त तक कांग्रेस से सीटों की सौदेबाजी करते रहे. वे कांग्रेस में शामिल तो नहीं हुए लेकिन उनके कई लोगो को पार्टी ने टिकट दिया है. हार्दिक एक तरह से बीजेपी के दुश्मन नंबर वन हैं. 25 किलोमीटर लंबे रोड शो और दो लाख से ज्यादा लोगो की शिरकत वाली रैलियों से उन्होने बीजेपी की नींद उड़ा रखी है. यह दावा किया जा रहा है कि उनकी रैलियों में प्रधानमंत्री की रैली भी से ज्यादा भीड़ जुट रही है.

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चुनावी सरगर्मी शुरू होते हुए एक ऐसी सेक्स सीडी भी उजागर हुई जिसे हार्दिक का बताया जा रहा है. लेकिन उन्होने बेपरवाही से जवाब दिया है-सीडी मेरी नहीं है. फिर भी अगर विजय भाई रूपाणी ने देखी है, तो मौज लें और खुश रहें. शायद हार्दिक भी जानते हैं कि अब राजनीति बहुत बदल चुकी है. सीडी और एमएमएस क्लिप किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. गुजरात का चुनाव खत्म होने में अब सिर्फ एक हफ्ते का वक्त रह गया है. दूसरे राउंड के कैंपेन के लिए भी ज्यादा समय बचा नहीं है. अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमलों की धार किस तरह तेज होगी और नई तिकड़में किस तरह नजर आएंगी.

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